
भागलपुर/पटना। सुल्तानगंज की धरती ने मंगलवार की शाम जो रक्तपात देखा, उसने बिहार के शासन और प्रशासन की जड़ों को हिलाकर रख दिया था। एक सरकारी दफ्तर के भीतर, जहाँ विकास की नीतियां बनती हैं, वहां गोलियों की तड़तड़ाहट ने यह संदेश देने की कोशिश की थी कि माफिया का रसूख कानून से ऊपर है। लेकिन इस दुस्साहस का अंत जितनी तेजी से हुआ, वह अपराधियों के लिए एक डरावना सबक बन गया है। मंगलवार शाम 4:05 बजे कार्यपालक पदाधिकारी कृष्ण भूषण कुमार की हत्या से लेकर बुधवार तड़के 3:45 बजे मुख्य आरोपी रामधनी यादव के एनकाउंटर तक की 12 घंटों की यह पटकथा किसी हाई-वोल्टेज ड्रामा से कम नहीं थी। इन 12 घंटों में भागलपुर से लेकर पटना तक का प्रशासनिक अमला सोया नहीं। फाइलें नहीं, बल्कि वायरलेस सेट और मोबाइल फोन गूँजते रहे। यह रिपोर्ट उस खौफनाक रात के एक-एक पल की गवाही देती है, जिसने बिहार में ‘सुशासन’ के इकबाल की नई परिभाषा लिखने की कोशिश की है।
शाम 4:05 बजे: जब सुल्तानगंज में सन्नाटा गोलियों से चीर दिया गया
मंगलवार की वह शाम सुल्तानगंज नगर परिषद कार्यालय के लिए सामान्य थी। चैंबर में नीलामी की प्रक्रिया चल रही थी, हंसी-मजाक और फाइलों का शोर था। तभी सफेद शर्ट और खाकी हाफ पैंट में एक शख्स दाखिल होता है। किसी को अंदाजा नहीं था कि यह शख्स मौत का पैगाम लेकर आया है। मुख्य पार्षद राजकुमार गुड्डू के चैंबर में घुसते ही रामधनी यादव ने अपना आपा खो दिया। उसने अपनी झोली से कट्टा निकाला और ललकारते हुए गोलियां चलानी शुरू कर दीं।
जब राजकुमार गुड्डू को दो गोलियां लगीं, तो बीच-बचाव के लिए निहत्थे कार्यपालक पदाधिकारी कृष्ण भूषण कुमार आगे बढ़े। रामधनी ने बिना एक पल सोचे अधिकारी के सिर को निशाना बनाया और तीन गोलियां उतार दीं। महज दो मिनट के भीतर पूरा दफ्तर खून से लथपथ था। अपराधी भाग निकले और कृष्ण भूषण कुमार ने कर्तव्य की वेदी पर दम तोड़ दिया। यह खबर जैसे ही सुल्तानगंज से बाहर निकली, पूरे बिहार के प्रशासनिक अधिकारियों में आक्रोश और डर की लहर दौड़ गई।
शाम 6:00 बजे: पटना पुलिस मुख्यालय की सक्रियता और चार जिलों में घेराबंदी
घटना के दो घंटे के भीतर पटना स्थित बिहार पुलिस मुख्यालय में आपात बैठक बुलाई गई। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी स्वयं इस मामले पर नजर बनाए हुए थे। पुलिस मुख्यालय से स्पष्ट निर्देश दिए गए कि अपराधी चाहे जमीन के नीचे पाताल में छिपे हों या किसी सफेदपोश के घर में, उन्हें हर हाल में ढूंढ निकाला जाए।
भागलपुर पुलिस ने तुरंत अपनी रणनीति बदली और चार विशेष टीमों का गठन किया गया। पुलिस को शक था कि अपराधी सुल्तानगंज की सीमा लांघकर पड़ोसी जिलों में शरण ले सकते हैं। इसके बाद भागलपुर, नवगछिया, बांका और मुंगेर के दियारा से लेकर शहरी इलाकों तक छापेमारी का जाल बिछा दिया गया। इन चार जिलों के हर चेकपोस्ट को सील कर दिया गया। पुलिस का खुफिया तंत्र सक्रिय हो गया और उन तमाम लोगों को हिरासत में लिया जाने लगा जो रामधनी यादव के करीबी माने जाते थे।
रात 10:00 बजे: सुल्तानगंज में जुटे खाकी के धुरंधर
जैसे-जैसे रात गहराती गई, सुल्तानगंज पुलिस छावनी में तब्दील हो गया। यह केवल स्थानीय थाने का मामला नहीं रह गया था। रेंज आईजी विवेक कुमार, एसएसपी प्रमोद कुमार यादव और एसपी सिटी शैलेंद्र सिंह ने सुल्तानगंज में ही अपना कैंप डाल दिया। पूरी रात ये अधिकारी थाने और घटनास्थल के बीच चक्कर काटते रहे।
पूरी रात वायरलेस पर मैसेज गूँजते रहे—”टार्गेट की लोकेशन क्या है?”, “संदिग्ध वाहन की तलाशी लो।” पुलिस पर भारी दबाव था क्योंकि एक गजटेड अधिकारी की हत्या ने पूरे राज्य के सिस्टम को चुनौती दी थी। पटना से लगातार वरीय अधिकारी मॉनिटरिंग कर रहे थे। आईजी और एसएसपी ने स्थानीय इनफॉर्मर्स के जरिए रामधनी के छिपने के ठिकानों का पता लगाना शुरू किया। पुलिस को जानकारी मिली कि रामधनी अपने कुछ साथियों के साथ भागने की फिराक में है और उसने हथियार कहीं छिपा रखे हैं।
रात 1:00 बजे से 3:00 बजे तक
प्रारंभिक पूछताछ में रामधनी ने पुलिस को गुमराह करने की कोशिश की, लेकिन जब कड़ाई बरती गई तो उसने हत्या में इस्तेमाल किए गए हथियारों के ठिकाने के बारे में बताया।
पुलिस की टीम रामधनी को लेकर हथियार बरामदगी के लिए सुल्तानगंज के बाहरी इलाके में ले गई। पुलिस को लगा कि अब मामला शांत हो जाएगा और हथियार बरामद कर कानूनी प्रक्रिया पूरी की जाएगी। लेकिन रामधनी जैसे शातिर अपराधी के मन में कुछ और ही चल रहा था। उसे लगा कि अंधेरे का फायदा उठाकर वह पुलिस की पकड़ से भाग सकता है।
बुधवार तड़के 3:45 बजे: खूनी एनकाउंटर और आतंक का अंत
समय था सुबह के पौने चार बजे। आसमान में हल्की धुंध थी और चारों तरफ सन्नाटा। पुलिस की टीम जैसे ही हथियार बरामदगी वाले स्थान पर पहुँची, रामधनी और उसके कुछ छिपे हुए साथियों ने अचानक पुलिस टीम पर फायरिंग शुरू कर दी। यह एक ‘अंबुश’ (घात) था जिसे रामधनी ने पुलिस को फंसाने के लिए इस्तेमाल किया था।
जवाबी कार्रवाई में पुलिस ने भी मोर्चा संभाला। दोनों तरफ से गोलियां चलने लगीं। पुलिस के पास अब आत्मरक्षा के अलावा कोई विकल्प नहीं था। मुठभेड़ के दौरान रामधनी यादव को पांच गोलियां लगीं। गोलियों की आवाज से पूरा इलाका दहल उठा। जब फायरिंग थमी, तो पुलिस ने देखा कि रामधनी जमीन पर पड़ा था। उसे तुरंत अस्पताल ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। ईओ की हत्या के ठीक 12 घंटे के भीतर उस अपराधी का अंत हो गया जिसने खुद को सुल्तानगंज का ‘बेताज बादशाह’ समझ रखा था।
सुबह 5:00 बजे: भागलपुर से पटना तक राहत और नई चुनौती
जैसे ही एनकाउंटर की खबर पटना पुलिस मुख्यालय पहुँची, शीर्ष अधिकारियों ने राहत की सांस ली। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को इसकी जानकारी दी गई। 12 घंटों की यह जद्दोजहद सफल रही थी, लेकिन इस सफलता के साथ कई सवाल भी पीछे छूट गए। सुल्तानगंज में सुबह जब लोग सोकर उठे, तो उन्हें पता चला कि अधिकारी की हत्या का मुख्य आरोपी अब इस दुनिया में नहीं है।
अस्पताल में जहाँ ईओ कृष्ण भूषण कुमार का पार्थिव शरीर पड़ा था, वहां प्रशासन ने राजकीय सम्मान की तैयारी शुरू कर दी। वहीं दूसरी ओर, रामधनी के शव के पास उसकी बेटियों के पहुँचने तक सन्नाटा पसरा रहा। इन 12 घंटों ने यह साबित कर दिया कि जब राज्य का नेतृत्व और पुलिस का मनोबल एक साथ मिलता है, तो ‘इंसाफ’ के लिए सालों का इंतजार नहीं करना पड़ता। भागलपुर की सड़कों पर अब खाकी का रौब और अपराधियों के मन में उस रात का खौफ साफ देखा जा सकता है।


