सबौर कृषि विश्वविद्यालय का ‘कचरे से कंचन’ आविष्कार: मंदिरों के फूलों से बना ‘हर्बल गुलाल’; 3 साल तक नहीं होगा खराब, अरोमा थेरेपी का भी मिलेगा लाभ

सबौर (भागलपुर) | 28 फरवरी, 2026: इस बार की होली में रंगों के साथ ‘श्रद्धा’ और ‘सेहत’ का भी मेल होगा। बिहार कृषि विश्वविद्यालय (BAU), सबौर ने एक क्रांतिकारी पहल करते हुए मंदिरों में चढ़ाए गए फूलों के अवशेषों (फ्लावर वेस्ट) से प्राकृतिक और त्वचा-अनुकूल गुलाल तैयार किया है। “गॉड टू गॉड” (God to God) थीम पर आधारित यह पहल न केवल पर्यावरण संरक्षण का संदेश दे रही है, बल्कि बाजार में मिलने वाले जहरीले रासायनिक रंगों का एक सुरक्षित विकल्प भी पेश कर रही है।

नेचुरल गुलाल: खूबसूरती के साथ सेहत भी

​कुलपति डॉ. डी. आर. सिंह के नेतृत्व में तैयार यह गुलाल आम रंगों से बिल्कुल अलग है:

  • त्वचा के लिए वरदान: यह पूर्णतः रसायनों से मुक्त है, जिससे एलर्जी या त्वचा खराब होने का डर नहीं है।
  • 3 साल की शेल्फ लाइफ: आमतौर पर हर्बल गुलाल जल्दी खराब हो जाते हैं, लेकिन सबौर के इस उत्पाद को 3 वर्षों तक सुरक्षित रखा जा सकता है।
  • अरोमा थेरेपी: इसमें शुद्ध फूलों के ‘एसेंशियल ऑयल’ मिलाए गए हैं, जिससे इसकी खुशबू शरीर और मन को शांति प्रदान करती है।
  • विविध रंग: डॉ. दीप्ति सिंह (पुष्प विज्ञान विभाग) के मार्गदर्शन में गेंदा, गुलाब, मोगरा, अपराजिता, गुड़हल और पलाश जैसे फूलों से 10 से अधिक आकर्षक रंगों का निर्माण किया गया है।

“गॉड टू गॉड” थीम: श्रद्धा का सम्मान

​विश्वविद्यालय की इस अनूठी सोच के पीछे एक गहरा सामाजिक और आध्यात्मिक उद्देश्य है:

  1. वेस्ट मैनेजमेंट: मंदिरों में चढ़ाए गए फूल अक्सर नदियों में प्रवाहित कर दिए जाते हैं या कचरे में फेंक दिए जाते हैं।
  2. पुनः अर्पण: विश्वविद्यालय इन फूलों को एकत्रित कर गुलाल बनाता है और फिर इसे पुनः मंदिरों को समर्पित करता है, जिससे ‘अपशिष्ट’ को ‘आशीर्वाद’ में बदला जा रहा है।

सिर्फ गुलाल ही नहीं, बने और भी शानदार उत्पाद

​BAU की फ्लावर प्रोसेसिंग प्रयोगशाला में ‘वेस्ट फ्लावर’ से कई अन्य कलाकृतियां और उपयोगी वस्तुएं भी तैयार की जा रही हैं:

    • सजावटी सामान: टेबल टॉप, वॉल क्विल्ट और प्राकृतिक दृश्यों की कलाकृतियाँ।
    • स्टेशनरी और गिफ्ट्स: ग्रीटिंग कार्ड, बुकमार्क, पेन स्टैंड और कोस्टर सेट।
    • टेबल एक्सेसरीज: टेबल मैट और डाइनिंग सेट्स।

VOB का नजरिया: आत्मनिर्भर बिहार का ‘महकता’ उदाहरण

सबौर कृषि विश्वविद्यालय की यह पहल ‘स्टार्टअप’ और ‘स्वरोजगार’ की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकती है। “कचरे से कंचन” की यह अवधारणा न केवल भागलपुर बल्कि पूरे बिहार के लिए प्रेरणादायक है। जब तकनीक में संवेदनशीलता और पर्यावरण का ध्यान रखा जाता है, तो परिणाम ऐसे ही सुखद होते हैं। अब जरूरत है इसे व्यापक स्तर पर ब्रांडिंग कर आम लोगों तक पहुँचाने की।

ब्यूरो रिपोर्ट, द वॉयस ऑफ बिहार (VOB)।

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