देशरत्न डॉ. राजेन्द्र प्रसाद का 63वां निर्वाण दिवस: पटना के महाप्रयाण घाट पर उमड़ा राष्ट्र; CM नीतीश सहित दिग्गजों ने दी श्रद्धांजलि

पटना | 28 फरवरी, 2026: भारत के प्रथम राष्ट्रपति और सादगी की प्रतिमूर्ति देशरत्न डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के 63वें निर्वाण दिवस के अवसर पर आज पूरा देश उन्हें नमन कर रहा है। राजधानी पटना के महाप्रयाण घाट (बांस घाट) स्थित उनकी समाधि पर मुख्य राजकीय समारोह का आयोजन किया गया, जहाँ मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पुष्प-चक्र अर्पित कर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी।

राष्ट्रीय सम्मान: राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की ओर से पुष्पांजलि

​राजेंद्र बाबू का कद राष्ट्रीय राजनीति में कितना विशाल है, इसकी झलक आज समारोह में भी दिखी। देश के शीर्ष नेतृत्व की ओर से उनके प्रतिनिधि अधिकारियों ने समाधि पर श्रद्धा सुमन अर्पित किए:

  • राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू की ओर से: अपर सचिव, बिहार लोक भवन सचिवालय।
  • उपराष्ट्रपति श्री सी.पी. राधाकृष्णन की ओर से: जिला दंडाधिकारी, पटना।
  • प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की ओर से: आयुक्त, पटना प्रमंडल।

राजकीय सम्मान और शोक सलामी

​समारोह के दौरान माहौल गमगीन और गौरवपूर्ण रहा। बिहार सैन्य पुलिस (BMP) द्वारा शोक सलामी दी गई। इसके पश्चात मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उपस्थित तमाम गणमान्य व्यक्तियों ने दो मिनट का मौन रखकर महान स्वाधीनता सेनानी और राष्ट्र निर्माता को याद किया। मुख्यमंत्री ने समाधि की परिक्रमा कर उन्हें शत्-शत् नमन किया।

समारोह में उपस्थित प्रमुख गणमान्य

​समारोह में राजनीति और प्रशासन के कई बड़े चेहरे शामिल हुए:

  • राजनीतिक नेतृत्व: उप मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, सांसद व जदयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा, विधायक श्याम रजक और पूर्व विधायक अरूण कुमार सिन्हा।
  • प्रशासनिक अमला: मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव दीपक कुमार, सचिव कुमार रवि, डॉ. चन्द्रशेखर सिंह, प्रमंडलीय आयुक्त अनिमेष पराशर, जिलाधिकारी डॉ. त्यागराजन एस.एम. और एसएसपी कार्तिकेय के. शर्मा।

VOB का नजरिया: ‘देशरत्न’ की विरासत और आज का बिहार

​डॉ. राजेन्द्र प्रसाद केवल भारत के पहले राष्ट्रपति नहीं थे, वे उस नैतिक उच्चता के प्रतीक थे जिसे ‘बिहारी अस्मिता’ का गौरव माना जाता है। आज जब राजनीति में मूल्यों के क्षरण की बात होती है, तब राजेंद्र बाबू की सादगी और विद्वता हमें सही रास्ता दिखाती है। महाप्रयाण घाट पर दी गई यह श्रद्धांजलि केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि उनके विचारों को जीवंत रखने का एक सामूहिक संकल्प है।

ब्यूरो रिपोर्ट, द वॉयस ऑफ बिहार (VOB)।

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