प्रवीण सिंह कुशवाहा : एनएसयूआई से एआईसीसी तक की बुलंद आवाज हुई खामोश

भागलपुर। बिहार की राजनीति और विशेषकर कांग्रेस की विचारधारा को चार दशकों तक अपने खून-पसीने से सींचने वाले प्रवीण सिंह कुशवाहा का सफर अचानक बीच रास्ते में ही थम गया। शुक्रवार को उत्तर प्रदेश के कन्नौज में हुए एक भीषण सड़क हादसे ने भागलपुर के उस जुझारू नेता को हमसे छीन लिया, जिसने कभी हारना नहीं सीखा था। शनिवार की रात जैसे ही उनका पार्थिव शरीर पटना से भागलपुर के दीपनगर स्थित कांग्रेस भवन पहुँचा, पूरा वातावरण ‘प्रवीण सिंह अमर रहें’ के नारों और सिसकियों से गूंज उठा। 57 वर्ष की आयु में दुनिया को अलविदा कहने वाले प्रवीण सिंह ने अपने जीवन के 40 साल पूरी तरह से राजनैतिक गलियारों और जनसेवा को समर्पित कर दिए थे। उनका जाना न केवल भागलपुर बल्कि बिहार कांग्रेस के लिए एक ऐसे स्तंभ का गिरना है, जिसकी भरपाई निकट भविष्य में असंभव नजर आती है।

एनएसयूआई से एआईसीसी तक का गौरवशाली सफर

​प्रवीण सिंह कुशवाहा का राजनैतिक उदय किसी विरासत की उपज नहीं था। उनके परिवार का कोई पुराना राजनैतिक बैकग्राउंड नहीं था, इसके बावजूद महज 16 साल की उम्र में उन्होंने कांग्रेस की विचारधारा को आत्मसात कर लिया था। वर्ष 1986 में सिटी कॉलेज भागलपुर में पढ़ाई के दौरान उन्होंने एनएसयूआई (NSUI) का दामन थामा और यहीं से उनके चार दशक लंबे राजनैतिक सफर की नींव पड़ी। उनकी मेहनत और संगठन के प्रति समर्पण का ही परिणाम था कि वे जल्द ही यूथ कांग्रेस के जिलाध्यक्ष बने।

​कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मुजफ्फर अहमद बताते हैं कि यह वह दौर था जब भागलपुर की राजनीति में भागवत झा आजाद का वर्चस्व था और प्रवीण उनके अत्यंत प्रिय पात्रों में से एक थे। जब सदानंद सिंह भागलपुर के जिलाध्यक्ष बने, तब प्रवीण को जिला महासचिव की जिम्मेदारी सौंपी गई। उनकी संगठन क्षमता का लोहा राष्ट्रीय नेतृत्व ने भी माना और वे लगातार 15 वर्षों तक ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी (AICC) के सदस्य बने रहे। पार्टी के प्रति उनकी अटूट निष्ठा का सबसे बड़ा प्रमाण तब मिला जब अशोक चौधरी जैसे बड़े नेताओं ने पार्टी छोड़ दी थी और संगठन में भगदड़ मची थी, उस कठिन समय में भी प्रवीण सिंह कुशवाहा झंडा थामे मजबूती से खड़े रहे।

चुनावी हार भी नहीं डिगा सकी हौसला

​प्रवीण सिंह कुशवाहा उन बिरले नेताओं में से थे जिन्होंने चुनाव की हार को कभी व्यक्तिगत पराजय नहीं माना, बल्कि उसे संगठन को मजबूत करने का अवसर समझा। पार्टी ने उन्हें तीन बार विधानसभा चुनाव के मैदान में उतारा।

  1. 2005 (भागलपुर सदर): पार्टी ने पहली बार उन्हें भागलपुर सीट से मौका दिया। नतीजों में हार मिलने के बाद भी वे विचलित नहीं हुए और उसी ऊर्जा के साथ कार्यकर्ताओं के बीच सक्रिय रहे।
  2. 2020 (पटना सिटी): दूसरी बार उन्हें पटना सिटी जैसे चुनौतीपूर्ण क्षेत्र से मैदान में उतारा गया, जहाँ वे बहुत कम अंतर से पीछे रह गए।
  3. 2025 (कहलगांव): सबसे हालिया चुनाव में उन्हें कहलगांव से महागठबंधन का उम्मीदवार बनाया गया था। हालांकि, यहाँ राजद के प्रत्याशी के भी मैदान में होने के कारण ‘फ्रेंडली फाइट’ की स्थिति बनी और वोटों के बिखराव की वजह से वे चुनावी लड़ाई में पिछड़ गए।

​पूर्व जिलाध्यक्ष परवेज जमाल के अनुसार, चुनाव हारने के बाद भी प्रदेश और राष्ट्रीय नेतृत्व ने उनकी भूमिका की हमेशा सराहना की क्योंकि वे हार के बाद भी पार्टी के भीतर की कलह दूर करने और संगठन को एकजुट करने में लगे रहते थे। उनकी इसी निष्ठा को देखते हुए हाल ही में उन्हें भागलपुर जिलाध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई थी।

दीपनगर कांग्रेस भवन में उमड़ा जनसैलाब

​शनिवार की रात करीब 10.07 बजे जब एम्बुलेंस उनके पार्थिव शरीर को लेकर दीपनगर चौक स्थित कांग्रेस भवन पहुँची, तो वहां मौजूद हजारों समर्थकों की आंखें नम हो गईं। पूर्व नगर विधायक अजीत शर्मा सहित कांग्रेस के पुराने और युवा कार्यकर्ताओं ने अपने नेता को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। रात 10.36 बजे तक शव को अंतिम दर्शन के लिए कांग्रेस भवन में रखा गया, जिसके बाद उसे पटल बाबू रोड स्थित उनके निजी आवास पर ले जाया गया। रविवार की सुबह उनके पार्थिव शरीर को पैतृक गांव जिच्छो ले जाया जाएगा और दोपहर बाद बरारी घाट पर राजकीय सम्मान या धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ उनका अंतिम संस्कार संपन्न होगा।

परिवार का इंतजार अब कभी खत्म नहीं होगा

​प्रवीण सिंह कुशवाहा का जीवन राजनीति के लिए इतना समर्पित था कि वे अक्सर घर से दूर ही रहते थे। परिवार के सदस्य बताते हैं कि पार्टी के कार्यों के सिलसिले में वे कई बार सुबह लौटते थे और रात को फिर किसी दूसरे जिले के लिए निकल जाते थे। घर के लोग हमेशा उनकी सुरक्षित वापसी का इंतजार करते थे, लेकिन इस बार का इंतजार कभी खत्म नहीं होने वाला है।

​उनके परिवार में पत्नी गायत्री सिंह, विवाहित पुत्र सन्नी, विवाहित पुत्री भाव्या, मां और दो बड़े भाइयों का परिवार है। प्रवीण अपने नाती-पोतों के साथ समय बिताने का मौका ढूंढते थे, लेकिन राजनीति की व्यस्तता ने उन्हें हमेशा सड़कों पर ही रखा। जिच्छो स्थित पैतृक आवास पर दुखों का पहाड़ टूटा हुआ है। बड़े भाई दीपक सिंह अपने छोटे भाई को खोने के गम में बदहवास हैं। परिवार अभी एक अन्य त्रासदी से उबरा भी नहीं था—ईरान युद्ध के दौरान अपनी इकलौती भांजी के पति देवनंदन प्रसाद सिंह को खोने के बाद प्रवीण ने ही पूरे परिवार को संबल दिया था, लेकिन अब उन्हें संभालने वाला कोई नहीं रहा।

जीवन परिचय: एक दृष्टि में

  • नाम: प्रवीण सिंह कुशवाहा
  • आयु: 57 वर्ष
  • शिक्षा: 1985 में सीएमएस हाई स्कूल से मैट्रिक, 1987 में सिटी कॉलेज भागलपुर से इंटर और हिन्दी विद्यापीठ देवघर से स्नातक।
  • राजनैतिक शुरुआत: 1986 में एनएसयूआई से।
  • प्रमुख पद: यूथ कांग्रेस अध्यक्ष, जिला महासचिव, प्रदेश उपाध्यक्ष और 15 वर्षों तक एआईसीसी सदस्य।
  • परिवार: पत्नी, एक पुत्र, एक पुत्री, नाती एवं पोता।

​प्रवीण सिंह कुशवाहा का जाना केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं है, बल्कि एक विचारधारा के प्रति अडिग रहने वाले उस जज्बे का अंत है जो आज की राजनीति में दुर्लभ होता जा रहा है। उनकी सादगी और कार्यकर्ताओं के प्रति उनका प्रेम भागलपुर की गलियों में हमेशा याद किया जाएगा।

वॉयस ऑफ बिहार (VOB) न्यूज़ डेस्क की विशेष रिपोर्ट।

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