
पटना। भारतीय राजनीति के अखाड़े में बयानों के बाण अब मर्यादाओं की सीमाओं को लांघने लगे हैं। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे द्वारा अल्पसंख्यक समुदाय को लेकर दिए गए एक कथित विवादास्पद बयान ने बिहार की सियासत में जबरदस्त भूचाल ला दिया है। भाजपा ने इस मुद्दे पर कांग्रेस को घेरते हुए हमलावर रुख अख्तियार कर लिया है। बिहार भाजपा की प्रवक्ता प्रीति शेखर ने इस मामले में कांग्रेस की कार्यशैली और विचारधारा पर कड़ा प्रहार किया है। प्रीति शेखर ने मल्लिकार्जुन खड़गे के उस कथित आह्वान पर तीखी प्रतिक्रिया दी है, जिसमें उन्होंने अल्पसंख्यक समुदाय से नवाज पढ़ने की जगह भाजपा और आरएसएस के लोगों को ‘कुचलने’ की अपील की थी। भाजपा प्रवक्ता ने इसे न केवल उकसावे वाला बयान बताया, बल्कि कांग्रेस को ‘नफरत की दुकान’ चलाने वाली पार्टी करार देते हुए कांग्रेसी नेतृत्व पर ‘बेशर्मी’ का आरोप भी मढ़ा है।
इस राजनीतिक घमासान की आंच अब गांधी परिवार तक पहुंच गई है, क्योंकि प्रीति शेखर ने सीधे तौर पर राहुल गांधी और प्रियंका गांधी से मल्लिकार्जुन खड़गे को उनके पद से तुरंत बर्खास्त करने की मांग कर डाली है। भाजपा का तर्क है कि इस तरह की भाषा लोकतंत्र के लिए घातक है और यह समाज में वैमनस्य फैलाने की एक सोची-समझी साजिश का हिस्सा है।
खड़गे का कथित आह्वान और भाजपा की तीखी जवाबी कार्रवाई
राजनीतिक गलियारों में इस चर्चा ने तब जोर पकड़ा जब मल्लिकार्जुन खड़गे के एक बयान को भाजपा ने मुद्दा बनाया। भाजपा का आरोप है कि खड़गे ने अल्पसंख्यकों से अपील की है कि वे अपनी धार्मिक क्रियाओं से ऊपर उठकर भाजपा और आरएसएस के कार्यकर्ताओं के खिलाफ हिंसक या आक्रामक रुख अपनाएं। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए प्रीति शेखर ने कहा कि एक राष्ट्रीय पार्टी के अध्यक्ष से इस तरह के गैर-जिम्मेदाराना और हिंसक मानसिकता वाले बयान की उम्मीद नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा कि यह बयान दर्शाता है कि कांग्रेस अब वैचारिक रूप से पूरी तरह दिवालिया हो चुकी है और वह सत्ता पाने के लिए किसी भी हद तक गिर सकती है।
प्रीति शेखर ने कहा कि मल्लिकार्जुन खड़गे जैसे अनुभवी नेता का इस तरह की भाषा का उपयोग करना यह बताता है कि कांग्रेस के भीतर लोकतंत्र और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की कोई जगह नहीं बची है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या कांग्रेस अब खुलेआम हिंसा को बढ़ावा देने वाली पार्टी बन गई है? भाजपा नेत्री ने खड़गे के इस कथित बयान को समाज के ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने वाला करार दिया।
’मोहब्बत की दुकान’ के पीछे ‘नफरत का शोरूम’
राहुल गांधी अक्सर अपनी यात्राओं और भाषणों में ‘नफरत के बाजार में मोहब्बत की दुकान’ खोलने का दावा करते रहे हैं। प्रीति शेखर ने इसी नारे पर कटाक्ष करते हुए कहा कि कांग्रेस असल में नफरत की सबसे बड़ी दुकान चला रही है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस का असली चेहरा अब जनता के सामने बेनकाब हो गया है। एक तरफ राहुल गांधी भाईचारे की बात करते हैं, तो दूसरी तरफ उनकी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष लोगों को एक-दूसरे के खिलाफ हिंसा के लिए उकसाते हैं।
प्रीति शेखर ने कांग्रेस को ‘बेशर्म’ बताते हुए कहा कि कांग्रेसी नेताओं में नैतिकता का पूरी तरह लोप हो चुका है। उन्होंने कहा कि तुष्टीकरण की राजनीति की पराकाष्ठा है कि वोट बैंक को साधने के लिए एक विशेष समुदाय को संवैधानिक संस्थाओं और विचारधाराओं के खिलाफ भड़काया जा रहा है। भाजपा प्रवक्ता ने आरोप लगाया कि कांग्रेस हमेशा से ही फूट डालो और राज करो की नीति पर चलती आई है और खड़गे का यह बयान उसी पुरानी मानसिकता का आधुनिक संस्करण है।
राहुल और प्रियंका गांधी से इस्तीफे की सीधी मांग
इस विवाद को एक कदम और आगे ले जाते हुए प्रीति शेखर ने कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व यानी राहुल गांधी और प्रियंका गांधी को निशाने पर लिया। उन्होंने मांग की कि यदि गांधी परिवार वास्तव में नफरत के खिलाफ है, तो उन्हें तुरंत मल्लिकार्जुन खड़गे को अध्यक्ष पद से हटा देना चाहिए। भाजपा नेत्री ने कहा कि खड़गे को पद पर बनाए रखना यह साबित करता है कि उनके बयानों को राहुल और प्रियंका गांधी का मौन समर्थन प्राप्त है।
प्रीति शेखर ने कहा कि राहुल गांधी को देश को जवाब देना चाहिए कि क्या उनके अध्यक्ष की भाषा उनके विजन से मेल खाती है? उन्होंने चेतावनी दी कि यदि कांग्रेस ने इस पर कार्रवाई नहीं की, तो यह माना जाएगा कि पूरी पार्टी ही हिंसा और नफरत के एजेंडे पर काम कर रही है। भाजपा का मानना है कि खड़गे का यह बयान केवल एक व्यक्ति की राय नहीं है, बल्कि यह कांग्रेस की उस हताशा को दर्शाता है जो लगातार चुनावी हार के बाद उनके भीतर घर कर गई है।
भाजपा और आरएसएस को ‘कुचलने’ की मानसिकता पर प्रहार
प्रीति शेखर ने खड़गे के ‘कुचलने’ वाले शब्द पर विशेष आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि भाजपा और आरएसएस दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक संगठन हैं, जो राष्ट्र निर्माण के कार्य में लगे हुए हैं। इन संगठनों को कुचलने की बात करना भारतीय लोकतंत्र की मूल आत्मा पर हमला है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस और उनके सहयोगी दल इस बात को पचा नहीं पा रहे हैं कि देश की जनता ने भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों पर अटूट विश्वास जताया है।
भाजपा प्रवक्ता ने कहा कि लोकतंत्र में विरोध का तरीका मतदान होता है, न कि हिंसा या शारीरिक रूप से कुचलने की धमकी। उन्होंने कहा कि कांग्रेसी नेताओं को यह समझ लेना चाहिए कि देश अब उनकी डराने वाली राजनीति से दबने वाला नहीं है। आरएसएस जैसे राष्ट्रवादी संगठन को निशाना बनाना कांग्रेस की उस कुंठा को उजागर करता है जो भारतीय संस्कृति और राष्ट्रवाद के प्रति उनकी नफरत से पैदा हुई है।
बिहार की सियासत पर इस विवाद का गहरा असर
बिहार जैसे राजनीतिक रूप से सक्रिय राज्य में प्रीति शेखर का यह बयान केवल एक प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि यह आगामी चुनावी बिसात का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भी है। बिहार में भाजपा और महागठबंधन (जिसमें कांग्रेस शामिल है) के बीच हमेशा से ही वैचारिक जंग तेज रही है। प्रीति शेखर द्वारा कांग्रेस अध्यक्ष को ‘बेशर्म’ कहना और उन्हें हटाने की मांग करना बिहार की राजनीति में ध्रुवीकरण को और तेज कर सकता है।
बिहार के राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा इस मुद्दे को जनता के बीच ले जाकर कांग्रेस की छवि को ‘राष्ट्रविरोधी’ और ‘हिंसक’ के रूप में पेश करने की कोशिश करेगी। वहीं, प्रीति शेखर ने साफ कर दिया है कि भाजपा चुप बैठने वाली नहीं है और वह गांव-गांव जाकर कांग्रेस के इस ‘नफरत वाले चेहरे’ को उजागर करेगी।
निष्कर्ष: जवाबदेही और लोकतंत्र का सवाल
मल्लिकार्जुन खड़गे के कथित बयान और उस पर प्रीति शेखर की तल्ख टिप्पणी ने भारतीय राजनीति के गिरते स्तर और बढ़ती कड़वाहट को एक बार फिर सामने ला दिया है। प्रीति शेखर ने जिस कठोरता के साथ कांग्रेस को आईना दिखाया है, वह भाजपा की आक्रामक रणनीति का हिस्सा है। अब गेंद कांग्रेस के पाले में है कि वह अपने अध्यक्ष के बयान पर क्या सफाई देती है या क्या राहुल और प्रियंका गांधी भाजपा की इस मांग पर कोई प्रतिक्रिया देते हैं।
सच्चाई जो भी हो, लेकिन इस तरह की बयानबाजी ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि सत्ता की लड़ाई अब केवल विकास और नीतियों पर नहीं, बल्कि एक-दूसरे को ‘कुचलने’ और ‘नफरत’ के आरोपों-प्रत्यारोपों तक सिमट गई है। प्रीति शेखर का यह प्रहार आने वाले दिनों में कांग्रेस के लिए बड़ी मुश्किलें खड़ी कर सकता है, खासकर तब जब भाजपा इसे सामाजिक सुरक्षा और अखंडता के साथ जोड़कर पेश कर रही है। कांग्रेस को अब यह तय करना होगा कि वह ‘मोहब्बत की दुकान’ के अपने नारे को कैसे बचाती है, जबकि उनके अपने ही शीर्ष नेता के बोल उन पर भारी पड़ रहे हैं।
भाजपा की इस आक्रामक प्रतिक्रिया ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह राष्ट्रवाद और सामाजिक समरसता के मुद्दे पर कांग्रेस को कोई ‘वॉकओवर’ नहीं देने वाली है। प्रीति शेखर की यह मांग और उनके शब्द आने वाले समय में बिहार की सभाओं और रैलियों में प्रमुखता से गूंजेंगे।


