‘काले कोट’ की आड़ में सफेदपोश जालसाजी: फर्जी मौत दिखा बीमा कंपनी से ठगे 10 लाख; मधुबनी का वकील गिरफ्तार, ‘मुर्दा’ भी निकला जिंदा

पटना। बिहार की राजधानी में धोखाधड़ी और जालसाजी का एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने कानूनी पेशे की मर्यादा और बीमा कंपनियों के सुरक्षा तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पटना की गांधी मैदान थाना पुलिस ने एक ऐसे शातिर वकील को गिरफ्तार किया है, जिसने कागजों पर एक जीवित व्यक्ति को ‘मुर्दा’ घोषित कर बीमा कंपनी से लाखों रुपये डकार लिए। मधुबनी निवासी इस वकील ने न केवल सड़क दुर्घटना की झूठी कहानी रची, बल्कि पुलिस विभाग और न्यायालय के फर्जी दस्तावेज तैयार कर बीमा कंपनी की आंखों में धूल झोंक दी। बुधवार, 06 मई 2026 की रात मधुबनी से हुई इस गिरफ्तारी ने एक बड़े बीमा घोटाले का पर्दाफाश किया है। पुलिस के अनुसार, आरोपी वकील की पहचान आशुतोष कुमार झा के रूप में हुई है, जो लंबे समय से पुलिस की पकड़ से बचने के लिए ठिकाने बदल रहा था। इस गिरफ्तारी के बाद अब पटना पुलिस आरोपी के अन्य कारनामों की भी पड़ताल कर रही है, क्योंकि जांच में यह भी सामने आया है कि उसके खिलाफ इसी तरह के मामले अन्य थानों में भी दर्ज हैं।

15 अगस्त की वो ‘फर्जी’ दुर्घटना और 10 लाख का खेल

​जालसाजी की यह पटकथा साल 2023 में लिखी गई थी। वकील आशुतोष कुमार झा ने श्रीराम फाइनेंस की इकाई श्रीराम लाइफ इंश्योरेंस में एक बीमा राशि का दावा (Claim) पेश किया था। वकील ने कंपनी को दिए अपने आवेदन में दावा किया कि 15 अगस्त 2023 को मधुबनी में एक सड़क दुर्घटना हुई थी, जिसमें संजय शशि नाम के व्यक्ति की मौत हो गई थी। इस दावे को असली साबित करने के लिए वकील ने झूठ का ऐसा जाल बुना कि शुरुआती दौर में कंपनी के अधिकारी भी धोखा खा गए।

​आरोपी ने दावे के साथ निम्नलिखित फर्जी दस्तावेज सौंपे थे:

  • फर्जी एफआईआर (FIR): मधुबनी के सहारघाट थाना में दर्ज केस की जाली कॉपी।
  • पोस्टमार्टम रिपोर्ट: मृतक की फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट, जिसे अस्पताल के दस्तावेजों के साथ छेड़छाड़ कर बनाया गया था।
  • न्यायालय के दस्तावेज: कोर्ट की फर्जी आदेशिकाएं और अन्य कानूनी कागजात।

​शुरुआत में श्रीराम लाइफ इंश्योरेंस ने इन दस्तावेजों को सही मान लिया और 10 लाख रुपये की बीमा राशि स्वीकृत कर दी। यह राशि वकील द्वारा बताए गए खाते में हस्तांतरित भी कर दी गई।

लालच ने डुबोई लुटिया: 11 लाख की अतिरिक्त मांग से खुला राज

​10 लाख रुपये हड़पने के बाद आशुतोष कुमार झा का हौसला और बढ़ गया। उसने सोचा कि जब पहली बार में सफलता मिल गई है, तो क्यों न और बड़ी राशि वसूली जाए। इसी लालच में उसने कंपनी के सामने 11 लाख रुपये और देने का नया दावा पेश कर दिया। जब एक ही मामले में इतनी बड़ी अतिरिक्त राशि की मांग की गई, तो बीमा कंपनी के सतर्कता विभाग (Vigilance Department) को शक हुआ।

​कंपनी ने आंतरिक जांच शुरू की और मधुबनी के सहारघाट थाना से उस कथित दुर्घटना की जानकारी मांगी। जांच में जो सच सामने आया, उसने सबके होश उड़ा दिए। पुलिस रिकॉर्ड में उस तारीख को ऐसी किसी दुर्घटना का कोई जिक्र नहीं था और न ही संजय शशि नाम के किसी व्यक्ति की मौत हुई थी। जिस व्यक्ति को कागजों पर ‘मुर्दा’ बताकर पैसे लिए गए थे, वह असल में जीवित था। मामला पूरी तरह से फर्जी पाए जाने पर श्रीराम फाइनेंस के अधिकारी केके शर्मा की शिकायत पर वर्ष 2024 में गांधी मैदान थाना में प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी।

गिरफ्तारी का घटनाक्रम: इश्तेहार से लेकर रिमांड तक

​गांधी मैदान थाना पुलिस पिछले कई महीनों से आशुतोष कुमार झा की तलाश में छापेमारी कर रही थी, लेकिन वह लगातार अपना ठिकाना बदलकर पुलिस को चकमा दे रहा था। दबाव बनाने के लिए पुलिस ने एक महीना पहले मधुबनी स्थित उसके घर पर इश्तेहार (Proclamation Notice) भी चस्पा किया था। इसी बीच पुलिस को सूचना मिली कि आरोपी मधुबनी में अपने पैतृक निवास के आसपास देखा गया है।

​गांधी मैदान थानेदार अखिलेश मिश्र के नेतृत्व में एक विशेष टीम ने बुधवार की रात मधुबनी में छापेमारी की और वकील को धर दबोचा। गिरफ्तारी के बाद उसे पटना लाया गया और आवश्यक कागजी कार्रवाई पूरी करने के बाद गुरुवार को जेल भेज दिया गया।

पुलिस स्टेशन

केस की स्थिति

गांधी मैदान थाना

वर्तमान गिरफ्तारी इसी केस में हुई है।

कोतवाली थाना

इसी प्रकार की धोखाधड़ी का एक अन्य मामला दर्ज है।

कोतवाली पुलिस अब आरोपी वकील को रिमांड पर लेकर पूछताछ करने की तैयारी कर रही है। पुलिस को अंदेशा है कि आशुतोष कुमार झा ने इस तरह के कई अन्य फर्जी क्लेम के जरिए विभिन्न बीमा कंपनियों को करोड़ों का चूना लगाया होगा।

कानूनी पेशे पर दाग और सुरक्षा तंत्र की विफलता

​एक वकील द्वारा इस तरह की जालसाजी को अंजाम देना कानूनी जगत के लिए भी चिंता का विषय है। आशुतोष कुमार झा को कानूनों की बारीकियों का पता था, जिसका फायदा उसने फर्जी दस्तावेज तैयार करने में किया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट और पुलिस की एफआईआर जैसे संवेदनशील दस्तावेजों का फर्जीवाड़ा यह भी दर्शाता है कि इस खेल में कुछ अन्य लोगों की संलिप्तता से इनकार नहीं किया जा सकता। पुलिस अब उन कड़ियों को जोड़ने में जुटी है जिनसे आरोपी को ये फर्जी दस्तावेज प्राप्त हुए या उसने स्वयं इन्हें तैयार किया।

​बीमा कंपनियों के लिए भी यह मामला एक सबक है। 10 लाख रुपये की पहली किश्त बिना पूर्ण सत्यापन के जारी कर देना प्रबंधन की चूक को दर्शाता है। यदि दूसरी बार 11 लाख की मांग नहीं की गई होती, तो शायद यह घोटाला कभी सामने ही नहीं आता। पटना पुलिस अब आरोपी के बैंक खातों और अन्य संपत्तियों की भी जांच कर रही है ताकि धोखाधड़ी से कमाई गई राशि को रिकवर किया जा सके। फिलहाल, ‘मुर्दे’ के नाम पर लाखों डकारने वाला यह ‘कानून का जानकार’ अब खुद सलाखों के पीछे अपने किए की सजा भुगत रहा है।

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