पीएम पर टिप्पणी मामला: कांग्रेस का आयोग को जवाब; नोटिस को बताया ‘दुर्भावनापूर्ण’; विस्तार से सफाई देने के लिए मांगा एक हफ्ते का समय

नई दिल्ली। चुनावी समर के बीच शब्दों की मर्यादा और संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता को लेकर एक बार फिर तलवारें खिंच गई हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर की गई कथित अपमानजनक टिप्पणी के मामले में निर्वाचन आयोग द्वारा जारी नोटिस पर मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने कड़ा रुख अख्तियार किया है। गुरुवार, 23 अप्रैल 2026 को कांग्रेस ने आयोग को एक संक्षिप्त लेकिन बेहद तल्ख जवाब भेजा है। पार्टी ने न केवल अपने ऊपर लगे आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है, बल्कि निर्वाचन आयोग की कार्यशैली और उसकी भाषा पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं। कांग्रेस ने आयोग को आईना दिखाते हुए कहा है कि इस पूरे घटनाक्रम में ‘छिपे हुए राजनैतिक इरादों’ की बू आ रही है। पार्टी का मानना है कि आदर्श आचार संहिता (MCC) का कोई उल्लंघन नहीं हुआ है, फिर भी जिस तरह से आनन-फानन में नोटिस जारी किया गया, वह लोकतांत्रिक मर्यादाओं के खिलाफ है। पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की ओर से भेजे गए इस जवाब ने अब गेंद वापस चुनाव आयोग के पाले में डाल दी है।

24 घंटे का अल्टीमेटम और कांग्रेस की नाराजगी: “विवेक का अभाव”

​कांग्रेस ने अपने जवाब में सबसे ज्यादा आपत्ति आयोग द्वारा दिए गए बेहद कम समय पर जताई है। निर्वाचन आयोग ने मल्लिकार्जुन खरगे को दिए गए नोटिस का जवाब देने के लिए महज 24 घंटे की मोहलत दी थी। कांग्रेस ने इसे ‘विवेक का अभाव’ करार देते हुए कहा कि चुनाव के इस चरम दौर में, जब राष्ट्रीय पार्टियों के अध्यक्ष व्यस्त चुनावी दौरों और रैलियों में व्यस्त होते हैं, तब उनसे एक दिन के भीतर विस्तृत कानूनी सफाई की उम्मीद करना तर्कसंगत नहीं है।

​पार्टी ने अपने जवाब में स्पष्ट लिखा है कि आयोग को खरगे के व्यस्त कार्यक्रमों की पूरी जानकारी है, इसके बावजूद 24 घंटे की समयसीमा तय करना यह दर्शाता है कि संस्थान किसी दबाव में या किसी विशेष एजेंडे के तहत काम कर रहा है। कांग्रेस ने इस समयसीमा को ‘राजनैतिक घेराबंदी’ का हिस्सा बताते हुए निर्वाचन आयोग से एक सप्ताह का अतिरिक्त समय मांगा है ताकि वे हर बिंदु पर साक्ष्यों के साथ अपना विस्तृत पक्ष रख सकें।

‘छिपे हुए इरादे’ और ‘आपत्तिजनक भाषा’: आयोग पर सीधा हमला

​कांग्रेस का जवाब केवल समयसीमा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने निर्वाचन आयोग के अधिकारियों की भाषा पर भी प्रहार किया है। पार्टी ने आयोग को भेजे पत्र में साफ तौर पर कहा है कि नोटिस में इस्तेमाल की गई शब्दावली ‘आपत्तिजनक’ है। कांग्रेस के अनुसार, आयोग की भाषा किसी निष्पक्ष नियामक जैसी न होकर किसी ऐसी संस्था जैसी लग रही है जो ‘कार्रवाई की धमकी’ देने पर उतारू है।

​जवाब में कहा गया है कि नोटिस में जिस तरह के ‘छिपे हुए इरादों’ का संकेत मिलता है, वह चुनावी निष्पक्षता के लिए घातक है। कांग्रेस ने दावा किया कि पार्टी अध्यक्ष या किसी भी नेता द्वारा दिए गए भाषण में न तो आचार संहिता की किसी धारा का उल्लंघन हुआ है और न ही किसी प्रचलित कानून की अवमानना की गई है। पार्टी का तर्क है कि प्रधानमंत्री पर की गई टिप्पणी राजनैतिक आलोचना के दायरे में आती है, जिसे व्यक्तिगत अपमान का रंग देकर आयोग विपक्ष की आवाज को दबाने की कोशिश कर रहा है।

आचार संहिता बनाम राजनैतिक आलोचना: कहाँ है लक्ष्मण रेखा?

​यह पूरा विवाद उस समय शुरू हुआ जब निर्वाचन आयोग ने मल्लिकार्जुन खरगे को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ कथित रूप से ‘अपमानजनक शब्दों’ के इस्तेमाल के लिए नोटिस थमाया। भाजपा ने इस संबंध में आयोग से शिकायत की थी कि कांग्रेस अध्यक्ष के बोल चुनावी माहौल को खराब करने वाले और गरिमा के खिलाफ हैं। हालांकि, कांग्रेस ने अपने संक्षिप्त जवाब में इस ‘लक्ष्मण रेखा’ की अपनी व्याख्या पेश की है।

​पार्टी का कहना है कि लोकतंत्र में सत्ता पक्ष की नीतियों और उनके नेतृत्व की आलोचना करना विपक्ष का मौलिक अधिकार है। यदि इसे ही आचार संहिता का उल्लंघन मान लिया जाएगा, तो स्वतंत्र चुनाव का विचार ही समाप्त हो जाएगा। कांग्रेस ने आयोग को याद दिलाया कि उन्हें उन शिकायतों पर भी उतनी ही तत्परता दिखानी चाहिए जो विपक्ष द्वारा सत्ता पक्ष के नेताओं के खिलाफ दर्ज कराई गई हैं। इस संक्षिप्त जवाब के जरिए कांग्रेस ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि वह किसी भी दबाव में झुकने वाली नहीं है और कानूनी रूप से इसका कड़ा मुकाबला करेगी।

विस्तृत जवाब के लिए एक सप्ताह की मांग: क्या झुकेगा आयोग?

​कांग्रेस ने निर्वाचन आयोग से स्पष्ट मांग की है कि उन्हें इस पूरे मामले पर अपना पक्ष रखने के लिए कम से कम एक सप्ताह का समय दिया जाए। पार्टी का कहना है कि वे अपने भाषणों के संदर्भ (Context) और पूर्व में अदालतों द्वारा राजनैतिक आलोचना पर दी गई व्यवस्थाओं का संकलन कर रहे हैं। बिना विस्तृत अध्ययन के जवाब देना मामले के साथ न्याय नहीं होगा।

​राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस की यह मांग आयोग के लिए एक परीक्षा की तरह है। यदि आयोग समय बढ़ा देता है, तो उस पर नरम होने का आरोप लग सकता है, और यदि वह इनकार करता है, तो कांग्रेस इसे ‘पूर्वाग्रह’ और ‘एकतरफा कार्रवाई’ बताकर जनता के बीच ले जाएगी। फिलहाल, आयोग ने कांग्रेस की इस मांग पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन दिल्ली के राजनैतिक गलियारों में इस संक्षिप्त जवाब ने चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया है।

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