
पटना। बिहार की राजनीति में इन दिनों वह सब कुछ घटित हो रहा है जिसकी कल्पना शायद ही किसी ने चुनावी परिणामों के समय की थी। राजधानी पटना की सड़कों पर इस समय केवल धूल नहीं, बल्कि सत्ता परिवर्तन की भारी सुगबुगाहट उड़ रही है। बिहार इस समय एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ दशकों से सत्ता की धुरी रहे नीतीश कुमार अब मुख्यमंत्री की कुर्सी पर महज चंद घंटों के मेहमान रह गए हैं। कयासों और प्रशासनिक हलचलों के बीच यह लगभग साफ हो चुका है कि अगले दो दिनों में बिहार की कमान भारतीय जनता पार्टी के किसी कद्दावर नेता के पास होगी, जिसमें उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का नाम सबसे ऊपर चल रहा है। लेकिन इस ‘पावर शिफ्ट’ के बीच पटना के वीरचंद पटेल पथ स्थित जनता दल यूनाइटेड (जदयू) के प्रदेश कार्यालय से एक ऐसी तस्वीर सामने आई जिसने बिहार की राजनीति में भूचाल ला दिया है। जदयू दफ्तर के बाहर लगे वे तमाम बड़े और महत्वपूर्ण पोस्टर हटा दिए गए हैं, जो पिछले विधानसभा चुनाव में एनडीए की जीत का मुख्य आधार थे। विशेष रूप से वह पोस्टर जिसमें नारा दिया गया था— ’25 से 30, फिर से नीतीश’। इसी नारे के दम पर बिहार की जनता ने एनडीए को 202 सीटों का प्रचंड बहुमत सौंपा था, लेकिन आज वही चेहरा और वही नारा पार्टी के अपने ही दफ्तर से गायब है। इस घटनाक्रम ने विपक्षी खेमे को बैठे-बिठाए एक बड़ा मुद्दा दे दिया है और प्रहार की शुरुआत की है विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) के प्रमुख मुकेश सहनी ने।
पोस्टर हटाए जाने पर गरमाई सियासत: क्या वजूद खो रही है जदयू?
पटना में जदयू कार्यालय के बाहर से नीतीश कुमार के पोस्टरों का हटाया जाना केवल एक प्रशासनिक फेरबदल नहीं, बल्कि एक बड़े राजनीतिक संकेत के रूप में देखा जा रहा है। वह पोस्टर जो 2030 तक के लिए नीतीश कुमार के नेतृत्व की गारंटी देता था, उसका हटाया जाना यह बताता है कि गठबंधन के भीतर अब नीतीश की भूमिका ‘अपरिहार्य’ से ‘अतीत’ की ओर बढ़ रही है। जैसे ही ये पोस्टर उतारे गए, विपक्षी दलों ने इसे नीतीश कुमार का अपमान और बीजेपी का ‘हिडन एजेंडा’ बताना शुरू कर दिया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जेडीयू कार्यालय से इन पोस्टरों का हटना इस बात की पुष्टि करता है कि अब पार्टी के भीतर भी यह स्वीकार कर लिया गया है कि नेतृत्व का केंद्र बदल चुका है।
मुकेश सहनी ने इस मुद्दे पर हमला बोलते हुए कहा कि यह बिहार की जनता के साथ सबसे बड़ा विश्वासघात है। सहनी के अनुसार, नीतीश कुमार ने अभी इस्तीफा दिया भी नहीं है, लेकिन उनके अपने ही कार्यालय में उनके नाम की पट्टियां और पोस्टर साफ किए जाने लगे हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि सत्ता की भूख में लोग कितनी जल्दी अपने पुराने ‘सारथी’ को भूल जाते हैं। सहनी ने दावा किया कि जो लोग आज तक नीतीश कुमार की तारीफों के पुल बांधते थे, वे अब उन्हें इतिहास का हिस्सा बनाने पर तुले हुए हैं।
मुकेश सहनी का बड़ा दावा: ‘बीजेपी की प्लानिंग सफल हुई’
बिहार के पूर्व मंत्री और वीआईपी सुप्रीमो मुकेश सहनी ने इस पूरे घटनाक्रम को बीजेपी की एक सुनियोजित साजिश करार दिया। सहनी ने कड़े शब्दों में कहा कि बीजेपी की मंशा कभी भी नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाए रखने की नहीं थी। उनके मुताबिक, 2025-30 के नारे पर वोट केवल इसलिए लिए गए थे क्योंकि बीजेपी को पता था कि नीतीश के बिना बिहार की वैतरणी पार करना मुश्किल है। “मजबूरी में उन्हें चेहरा बनाया गया, क्योंकि जनता का भरोसा उनके साथ था। लेकिन जैसे ही बहुमत मिला, बीजेपी ने अपनी उस गुप्त योजना पर काम करना शुरू कर दिया जिसका लक्ष्य नीतीश कुमार को रास्ते से हटाना था,” सहनी ने आरोप लगाया।
सहनी का यह हमला सीधे तौर पर बीजेपी की कार्यशैली पर सवाल उठाता है। उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार को जिस तरह से ‘जबरन’ राज्यसभा भेजने की तैयारी की गई है, वह एक बड़े राजनीतिक रसूख वाले नेता को दरकिनार करने जैसा है। सहनी के अनुसार, बीजेपी ने पहले जदयू को कमजोर किया, उसके भीतर फूट डाली और अब जब पार्टी पूरी तरह से बीजेपी के प्रभाव में आ गई है, तो उसके सर्वमान्य नेता के पोस्टर भी हटाए जा रहे हैं।
बर्बाद होता बिहार और अपराधियों का वर्चस्व: विपक्ष का आरोप
मुकेश सहनी ने केवल सत्ता परिवर्तन पर ही नहीं, बल्कि बिहार की वर्तमान प्रशासनिक स्थिति पर भी गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने आरोप लगाया कि जब से बीजेपी ने सत्ता में अपनी पकड़ मजबूत की है, बिहार के बुनियादी ढांचे की कमर टूट गई है। सहनी ने कहा, “आज राज्य में शिक्षा और स्वास्थ्य की व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है। अस्पतालों में दवाएं नहीं हैं और स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा गायब है। सरकार चलाने वाले लोग केवल इस जोड़-तोड़ में लगे हैं कि कौन अगला मुख्यमंत्री बनेगा और किसे कौन सा विभाग मिलेगा।”
अपराध के बढ़ते ग्राफ पर निशाना साधते हुए वीआईपी प्रमुख ने कहा कि आज बिहार के हर जिले में अपराधियों का वर्चस्व कायम हो गया है। जब पुलिस और प्रशासन का ध्यान केवल सत्ता बचाने और पोस्टर बदलने पर होगा, तो अपराधियों के हौसले बुलंद होना स्वाभाविक है। उन्होंने आरोप लगाया कि सत्ताधारी दल के नेता बिहार की जनता की सुरक्षा के बजाय ‘सरकार-सरकार’ का खेल खेल रहे हैं। सहनी का यह बयान उन आम नागरिकों की भावनाओं को स्वर दे रहा है जो सड़कों पर बढ़ती असुरक्षा से डरे हुए हैं।
जनादेश का अपमान और ‘हथकंडों’ की राजनीति
मुकेश सहनी ने अपने संबोधन में बार-बार ‘जनादेश’ शब्द का इस्तेमाल किया। उनका तर्क है कि 202 सीटों का जो मैंडेट एनडीए को मिला था, वह नीतीश कुमार के चेहरे और उनके विकास कार्यों के नाम पर था। अब उस चेहरे को हटाकर बीजेपी जिस तरह से सत्ता पर काबिज होने की कोशिश कर रही है, वह लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। “जनता ने वोट दिया था ‘नीतीश के लिए’, लेकिन उन्हें मिल रहा है ‘बीजेपी का शासन’। यह जनता की परवाह न करने वाली राजनीति है,” सहनी ने तल्ख लहजे में कहा।
पूर्व मंत्री ने यह भी दावा किया कि एनडीए ने चुनाव के दौरान जो वादे किए थे—चाहे वह रोजगार का मुद्दा हो या विशेष राज्य के दर्जे का—वे आज भी ठंडे बस्ते में पड़े हैं। सरकार बनने के समय से ही बीजेपी ने नीतीश कुमार को घेरना शुरू कर दिया था और अंततः उन्हें दिल्ली (राज्यसभा) भेजने के लिए मजबूर कर दिया गया ताकि बिहार की गद्दी पर ‘भगवा’ परचम लहरा सके। सहनी के अनुसार, बीजेपी ने नीतीश कुमार को उनके ही घर में कमजोर कर दिया है और अब जदयू एक स्वतंत्र पार्टी के रूप में अपना अस्तित्व खो चुकी है।
क्या जदयू का अस्तित्व खतरे में है?
सहनी के आरोपों का सबसे गंभीर हिस्सा वह था जहाँ उन्होंने कहा कि “जदयू अब पार्टी ही नहीं रही।” उनका मानना है कि पोस्टर हटाए जाने की घटना इस बात का प्रतीक है कि जदयू का विलय अब केवल औपचारिक बाकी है, वैचारिक रूप से वह बीजेपी में समाहित हो चुकी है। सहनी ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि जो हस्तियां आज नीतीश कुमार के साथ खड़ी होने का नाटक कर रही हैं, वे सबसे पहले पाला बदलेंगी।
यह राजनीतिक मोड़ बिहार के लिए बेहद संवेदनशील है। एक तरफ बीजेपी अपनी पहली पूर्ण सरकार बनाने के उत्साह में है, वहीं दूसरी तरफ नीतीश कुमार के वफादार और विपक्षी दल इसे एक बड़े नेता के ‘राजनीतिक सूर्यास्त’ के रूप में देख रहे हैं। सहनी का यह बयान महागठबंधन की उस रणनीति का हिस्सा है जिसके तहत वे एनडीए के भीतर चल रही खींचतान को जनता के सामने लाना चाहते हैं। पोस्टर का हटना भले ही एक छोटी घटना लगे, लेकिन मुकेश सहनी ने इसे बिहार की अस्मिता और जनादेश के साथ जोड़कर एक बड़ी बहस छेड़ दी है। आने वाले 48 घंटे यह तय करेंगे कि सहनी के ये दावे कितने सच साबित होते हैं और बिहार की जनता इस ‘पोस्टर पॉलिटिक्स’ को किस तरह से लेती है।


