
पटना। बिहार के उन दुर्गम इलाकों में, जहाँ कभी बंदूकों की गूँज और बारूद की गंध हवाओं में घुली रहती थी, अब वहां विकास की नई इबारत लिखी जा रही है। बिहार की प्रशासनिक मशीनरी ने राज्य के उन 4 जिलों—औरंगाबाद, गया, जमुई और लखीसराय—को लेकर एक नई और सकारात्मक घोषणा की है, जिन्हें कभी ‘वामपंथी उग्रवाद’ का गढ़ माना जाता था। 17 अप्रैल 2026 को मंत्रिमंडल सचिवालय विभाग के मुख्य सचिव कोषांग में आयोजित एक उच्च स्तरीय बैठक ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बिहार अब पूरी तरह से नक्सल मुक्त हो चुका है। मुख्य सचिव प्रत्यय अमृत की अध्यक्षता में हुई इस समीक्षा बैठक में न केवल सुरक्षा के मोर्चे पर मिली सफलताओं का जश्न मनाया गया, बल्कि इन ‘लिगेसी एंड थ्रस्ट’ (L&T) जिलों में चल रहे बुनियादी ढाँचे, शिक्षा, स्वास्थ्य और वित्तीय समावेशन के कार्यों का बारीकी से मूल्यांकन भी किया गया। प्रत्यय अमृत ने अधिकारियों को दो टूक शब्दों में निर्देश दिया कि इन क्षेत्रों में अब विकास की गति ऐसी होनी चाहिए कि अतीत का अंधेरा भविष्य की रोशनी में पूरी तरह विलीन हो जाए।
सुरक्षा का नया अध्याय: हिंसा का अंत और पुलिस की बढ़ती धमक
बिहार की सुरक्षा एजेंसियों और पुलिस बल के लिए पिछले छह साल किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं रहे हैं। समीक्षा बैठक के दौरान जो सबसे सुखद तथ्य सामने आया, वह यह है कि वर्ष 2020 के बाद से इन उग्रवाद प्रभावित जिलों में नक्सलियों द्वारा पुलिस पर एक भी हिंसक हमला नहीं किया गया है। यह सुरक्षा बलों की उस रणनीतिक बढ़त और खुफिया तंत्र की मजबूती का परिणाम है, जिसने नक्सलियों को बैकफुट पर धकेल दिया है।
आंकड़ों की बात करें तो जनवरी 2025 से मार्च 2026 के बीच चलाए गए सघन ऑपरेशनों के तहत 256 उग्रवादियों को गिरफ्तार किया गया है। यह केवल गिरफ्तारी नहीं है, बल्कि उस विचारधारा की हार है जो समाज के विकास में बाधा बनी हुई थी। प्रत्यय अमृत ने इस सफलता का श्रेय पुलिस के स्थानीय संवाद और सुरक्षा बलों की मुस्तैदी को दिया। उन्होंने कहा कि जब पुलिस केवल डर का नहीं बल्कि भरोसे का नाम बन जाती है, तो उग्रवाद की जड़ें अपने आप सूखने लगती हैं। अब इन जिलों में लोग बिना किसी डर के रात में भी सड़कों पर निकल रहे हैं, जो इस ‘नक्सल मुक्त’ बिहार की सबसे बड़ी गवाही है।
सड़कों का जाल और डिजिटल क्रांति: टूट रही है भौगोलिक बाधा
किसी भी पिछड़े क्षेत्र के विकास के लिए कनेक्टिविटी (संपर्क) पहली शर्त होती है। RCPLWEA योजना के तहत इन 4 जिलों में सड़कों का ऐसा जाल बिछाया गया है जिसने पहाड़ियों और जंगलों के बीच बसे गाँवों को मुख्यधारा से जोड़ दिया है। बैठक में दी गई जानकारी के अनुसार, स्वीकृत 153 सड़कों (1980.8 किमी) में से 132 सड़कों (1825.12 किमी) का निर्माण पूरा हो चुका है। इसके साथ ही 74 पुलों का निर्माण कर नदियों और नालों की बाधा को भी खत्म कर दिया गया है।
सड़कों के साथ-साथ ‘डिजिटल संपर्क’ पर भी विशेष जोर दिया जा रहा है। पहाड़ी इलाकों में मोबाइल टावर लगाने के लिए वन विभाग की स्वीकृतियों (Forest Clearance) के मुद्दों का समाधान अब अंतिम चरण में है। प्रत्यय अमृत ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि पर्यावरण और वन स्वीकृति की प्रक्रिया को इतना सरल और पारदर्शी बनाया जाए कि कोई भी परियोजना समय सीमा से बाहर न जाए। उन्होंने कहा कि मोबाइल टावर केवल संचार का माध्यम नहीं हैं, बल्कि ये गाँवों तक ऑनलाइन बैंकिंग, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को पहुँचाने की जीवनरेखा हैं।
शिक्षा और बैंकिंग: गाँवों तक पहुँची उम्मीद की किरण
नक्सलवाद के खात्मे के साथ ही अब शिक्षा और वित्तीय समावेशन पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है। पश्चिम चंपारण और जमुई में संचालित एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय (EMRS) अनुसूचित जाति और जनजाति के बच्चों के लिए आधुनिक शिक्षा के केंद्र बन चुके हैं। बैठक में इन विद्यालयों को बिहार विद्यालय परीक्षा समिति (BSEB) से संबद्ध करने पर जोर दिया गया, ताकि यहाँ पढ़ने वाले छात्रों को भविष्य की प्रतियोगी परीक्षाओं और उच्च शिक्षा में कोई बाधा न आए।
वित्तीय समावेशन के मामले में भी ये 4 जिले अब राज्य के अन्य जिलों को टक्कर दे रहे हैं। इन जिलों में वर्तमान में 782 बैंक शाखाएं कार्यरत हैं, जो पूरे बिहार की बैंकिंग नेटवर्क का 10 प्रतिशत है। बैंकिंग सेवाओं को और अधिक सुलभ बनाने के लिए बिहार सरकार ने एक क्रांतिकारी निर्णय लिया है। अब पंचायत सरकार भवनों में बैंक शाखाएं खोलने के लिए सरकार बैंक प्रबंधन को किराया-मुक्त स्थान उपलब्ध करा रही है। प्रत्यय अमृत का मानना है कि जब बैंक गाँव के दरवाजे पर होगा, तो बिचौलियों का अंत होगा और सरकारी योजनाओं का पैसा सीधे लाभार्थी के खाते में पहुँचेगा।
स्वास्थ्य सेवाओं का कायाकल्प: औरंगाबाद और जमुई ने पेश की मिसाल
नक्सलवाद के प्रभाव के कारण कभी इन जिलों के कई हिस्से ‘शैडो जोन’ (जहाँ स्वास्थ्य सेवाएं नहीं पहुँच पाती थीं) में गिने जाते थे। आज वह स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। पूर्ण टीकाकरण के मामले में इन जिलों ने जो प्रगति की है, वह चौंकाने वाली है। औरंगाबाद 94%, जमुई 91%, गया 90% और लखीसराय 85% टीकाकरण कवरेज के साथ राज्य के अग्रणी जिलों में शामिल हो गए हैं।
इसके साथ ही, आयुष्मान आरोग्य मंदिर (HSC-AAMs) अब इन दुर्गम क्षेत्रों में प्राथमिक उपचार और मातृत्व सेवाओं का केंद्र बन गए हैं। नक्सलियों के हटने के बाद अब डॉक्टर और एएनएम बिना किसी डर के इन ‘शैडो जोन’ में जा रहे हैं। मुख्य सचिव ने स्वास्थ्य विभाग को निर्देश दिया कि इन आरोग्य मंदिरों में दवाओं की उपलब्धता और डॉक्टरों की उपस्थिति की डिजिटल मॉनिटरिंग की जाए, ताकि किसी भी ग्रामीण को शहर की ओर भागने की जरूरत न पड़े।
पर्यटन और रोजगार: भीमबांध और छकरबंधा की पहाड़ियाँ बनेंगी आकर्षण का केंद्र
गया का छकरबंधा और मुंगेर, लखीसराय व जमुई की सीमाओं पर फैला भीमबांध क्षेत्र कभी नक्सलियों की पनाहगाह हुआ करता था। लेकिन अब सरकार यहाँ पर्यटन की संभावनाएं तलाश रही है। प्रत्यय अमृत ने निर्देश दिया है कि इन पहाड़ी क्षेत्रों में आवश्यक बुनियादी ढांचा विकसित किया जाए ताकि यहाँ ईको-टूरिज्म को बढ़ावा मिले। जब सैलानी इन क्षेत्रों में पहुँचेंगे, तो स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।
रोजगार की दिशा में एक और बड़ा कदम स्थानीय युवाओं को सरकारी नौकरियों से जोड़ना है। सरकार “मेडल लाओ, नौकरी पाओ” योजना के तहत खेल संस्कृति को बढ़ावा दे रही है, ताकि युवा हथियारों के बजाय खेल के मैदान में अपनी ऊर्जा लगाएं। मुख्य सचिव ने कहा कि स्थानीय ठेकेदारों को छोटे निर्माण कार्यों में नियमों में उचित ढील देकर प्राथमिकता दी जानी चाहिए, ताकि क्षेत्र का पैसा क्षेत्र में ही रहे और आर्थिक खुशहाली आए।
मुख्य सचिव का स्पष्ट संदेश: ‘सरल प्रक्रिया और पारदर्शी सुशासन’
समीक्षा बैठक के अंत में प्रत्यय अमृत ने प्रशासनिक तंत्र को एक कड़ा और स्पष्ट संदेश दिया। उन्होंने कहा कि अब जबकि नक्सलवाद का बहाना खत्म हो चुका है, तो विकास कार्यों में कोई भी देरी स्वीकार्य नहीं होगी। उन्होंने पर्यावरण और वन विभाग को निर्देशित किया कि वे सड़क और टावर निर्माण की फाइलों को लटकाने के बजाय उनका त्वरित समाधान निकालें।
प्रत्यय अमृत ने अधिकारियों से कहा कि इन क्षेत्रों में काम कर रहे स्थानीय युवाओं और ठेकेदारों को नियमों के दायरे में रहकर हर संभव सहयोग दिया जाए। उनका विजन है कि औरंगाबाद, गया, जमुई और लखीसराय की पहचान अब ‘नक्सल प्रभावित’ के रूप में नहीं, बल्कि ‘विकास के मॉडल’ के रूप में होनी चाहिए। उन्होंने अंत में दोहराया कि सरकार की हर कल्याणकारी योजना का लाभ अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक बिना किसी बाधा के पहुँचना चाहिए। 17 अप्रैल की यह समीक्षा बैठक बिहार के इन 4 जिलों के लिए एक नए युग के प्रवेश द्वार की तरह है, जहाँ बंदूकों की जगह अब लैपटॉप और मशीनों की आवाज़ सुनाई देगी।


