
भागलपुर/सुल्तानगंज। बिहार की प्रशासनिक व्यवस्था आज गहरे शोक और उबलते हुए आक्रोश के सैलाब में डूबी हुई है। भागलपुर जिले के सुल्तानगंज नगर परिषद कार्यालय में मंगलवार, 28 अप्रैल 2026 की शाम जो रक्तचरित्र लिखा गया, उसने न केवल सुशासन के दावों की धज्जियां उड़ाई हैं, बल्कि सूबे के अधिकारियों के भीतर असुरक्षा का एक भयावह मनोविज्ञान भी पैदा कर दिया है। नगर परिषद के कार्यपालक पदाधिकारी (ईओ) कृष्ण भूषण कुमार की हत्या और सभापति राजकुमार उर्फ गुड्डू पर हुए कातिलाना हमले ने सचिवालय से लेकर नगर निकायों तक एक ऐसी आग लगा दी है, जिसे शांत करना सम्राट सरकार के लिए अब कड़ी चुनौती बन गया है। बिहार नगर सेवा संघ ने इस जघन्य हत्याकांड के विरोध में सरकार के खिलाफ सीधा मोर्चा खोल दिया है। संघ ने स्पष्ट शब्दों में 48 घंटे का अल्टीमेटम जारी करते हुए चेतावनी दी है कि यदि अपराधियों पर कठोरतम प्रहार और अधिकारियों की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नहीं हुए, तो पूरे बिहार के नगर निकायों का पहिया जाम कर दिया जाएगा।
शहादत की दास्तान: निहत्थे ही ‘काल’ से टकरा गए कृष्ण भूषण
सुल्तानगंज नगर परिषद कार्यालय में मंगलवार की शाम करीब 4:00 बजे का वह मंजर किसी डरावनी फिल्म से कम नहीं था। कार्यालय में सामान्य कामकाज चल रहा था, तभी तीन नकाबपोश अपराधी अत्याधुनिक हथियारों से लैस होकर सभापति राजकुमार उर्फ गुड्डू के चैंबर में दाखिल हुए। सीसीटीवी फुटेज और चश्मदीदों के बयानों से जो तस्वीर साफ हुई है, वह रोंगटे खड़े कर देने वाली है। अपराधी सीधे सभापति को निशाना बनाने आए थे और उन्होंने उन पर अंधाधुंध गोलियां बरसाना शुरू कर दिया।
इसी बीच, वहां मौजूद कार्यपालक पदाधिकारी कृष्ण भूषण कुमार ने वह साहस दिखाया जो विरले ही प्रशासनिक अधिकारियों में देखने को मिलता है। वे निहत्थे थे, लेकिन अपने सहकर्मी और सभापति की जान बचाने के लिए वे जान की बाजी लगाकर उन हथियारबंद बदमाशों से भिड़ गए। कृष्ण भूषण ने अपराधियों को रोकने की हरसंभव कोशिश की, जिससे अपराधियों की बौखलाहट बढ़ गई। हाथापाई और गहमागहमी के बीच, एक अपराधी ने बेहद करीब से कृष्ण भूषण के माथे पर गोली दाग दी। गोली सीधे उनके सिर में लगी, जिससे वे वहीं ढेर हो गए। इसके बाद अपराधियों ने सभापति के सिर में भी गोली मारी और हथियार लहराते हुए मौके से फरार हो गए। एक होनहार अधिकारी ने अपनी कर्तव्यनिष्ठा और वीरता का परिचय देते हुए शहादत दे दी, लेकिन व्यवस्था के माथे पर एक ऐसा घाव दे दिया जिसकी भरपाई नामुमकिन है।
प्रशासनिक विद्रोह: सम्राट सरकार को अफसरों की खुली चुनौती
इस हत्याकांड की खबर जैसे ही राज्य के अन्य जिलों में पहुँची, नगर सेवा के अधिकारियों का गुस्सा फूट पड़ा। बिहार नगर सेवा संघ ने मंगलवार देर रात ही एक आपातकालीन बैठक बुलाई और सरकार के खिलाफ ‘प्रशासनिक विद्रोह’ का बिगुल फूंक दिया। संघ ने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, नगर विकास विभाग के प्रधान सचिव, डीजीपी और मानवाधिकार आयोग को एक कड़ा ज्ञापन सौंपा है।
संघ की मांगें बेहद स्पष्ट और सख्त हैं:
- दोषियों का त्वरित संहार: हत्या में शामिल शूटरों और इसके पीछे की साजिश रचने वाले ‘सफेदपोश’ माफियाओं की 48 घंटे के भीतर गिरफ्तारी।
- शहीद का सम्मान: पीड़ित परिवार के एक सदस्य को तत्काल सरकारी नौकरी और उचित सम्मानजनक मुआवजा।
- सुरक्षा का कवच: राज्य भर के सभी कार्यपालक पदाधिकारियों को 24 घंटे सशस्त्र सुरक्षा गार्ड मुहैया कराना और कार्यालयों में पुलिस पिकेट की स्थापना।
संघ ने साफ कर दिया है कि 48 घंटे का यह समय सम्राट सरकार के लिए एक ‘डेडलाइन’ है। यदि इस अवधि में संतोषजनक और धरातलीय कार्रवाई नहीं दिखती है, तो बिहार के सभी नगर निगमों, नगर परिषदों और नगर पंचायतों के अधिकारी कलमबंद हड़ताल पर चले जाएंगे। यह अल्टीमेटम राज्य की शहरी व्यवस्था को पूरी तरह ठप करने की क्षमता रखता है, जिससे सरकार पर भारी दबाव बन गया है।
मधुबनी का लाल, सुल्तानगंज की शान: एक असाधारण व्यक्तित्व
कृष्ण भूषण कुमार कोई साधारण सरकारी कर्मचारी नहीं थे, वे बिहार नगर सेवा के एक ऐसे चमकते सितारे थे जिन्होंने बहुत कम समय में राष्ट्रीय स्तर पर बिहार का मान बढ़ाया था। मूल रूप से मधुबनी जिले के रहने वाले कृष्ण भूषण बीपीएससी 59वें बैच के अधिकारी थे। उनकी मुख्य तैनाती भागलपुर के ही कहलगांव नगर पंचायत में थी, लेकिन उनकी कार्यकुशलता को देखते हुए उन्हें सुल्तानगंज नगर परिषद का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया था।
वे एक ऐसे अधिकारी थे जिन्होंने सुल्तानगंज को देशभर में ‘बेस्ट अकाउंट्स प्रैक्टिस अवॉर्ड’ में पहला स्थान दिलाया था। इसी साल फरवरी में उन्हें दिल्ली में इस उपलब्धि के लिए राष्ट्रीय सम्मान से नवाजा गया था। उनकी पत्नी उत्तर प्रदेश में एडीएम (ADM) के पद पर कार्यरत हैं। एक ऐसे मेधावी और ईमानदार अधिकारी का माफियाओं की गोली का शिकार हो जाना, बिहार की मेधा और ईमानदारी पर गहरा प्रहार है। वे केवल अतिरिक्त प्रभार की जिम्मेदारी निभाने सुल्तानगंज आए थे, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।
अपराधियों का ‘टारगेट’ और पुलिस की तफ्तीश
भागलपुर एसएसपी समेत तमाम वरीय अधिकारियों ने सुल्तानगंज पहुँचकर मामले की बागडोर संभाल ली है। पुलिस की प्रारंभिक जांच और सीसीटीवी फुटेज के विश्लेषण से यह स्पष्ट हो गया है कि अपराधियों का प्राथमिक लक्ष्य सभापति राजकुमार उर्फ गुड्डू ही थे। अपराधियों ने योजनाबद्ध तरीके से सभापति पर हमला किया था, लेकिन ईओ कृष्ण भूषण के बीच में आ जाने और उनके द्वारा किए गए प्रतिरोध ने अपराधियों को और हिंसक बना दिया।
पुलिस की कई विशेष टीमें (SIT) गठित की गई हैं जो भागलपुर, बांका और मुंगेर की सीमाओं पर सघन छापेमारी कर रही हैं। हालांकि हत्या की स्पष्ट वजह अभी सामने नहीं आई है, लेकिन इसे टेंडर विवाद, सैरात की डाक या स्थानीय वर्चस्व की लड़ाई से जोड़कर देखा जा रहा है। सभापति गुड्डू कुमार का भागलपुर के मायागंज अस्पताल में इलाज चल रहा है, उनकी हालत अब भी नाजुक बनी हुई है और वे वेंटिलेटर पर हैं।
कानून-व्यवस्था पर सुलगते सवाल: क्या अधिकारी अब केवल ‘सॉफ्ट टारगेट’ हैं?
सुल्तानगंज की इस घटना ने सुशासन के तमाम दावों पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। जब एक अधिकारी अपने कार्यालय के भीतर, अपने वरिष्ठ सहयोगियों के बीच सुरक्षित नहीं है, तो वह निष्पक्ष होकर विकास कार्य कैसे कर पाएगा? बिहार के नगर निकायों में टेंडर और नीलामी की प्रक्रिया में माफियाओं का बढ़ता दखल अब खूनी रूप ले चुका है।
कृष्ण भूषण की हत्या ने यह साबित कर दिया है कि अपराधी अब प्रशासनिक तंत्र के शीर्ष पर बैठे लोगों को भी ‘सॉफ्ट टारगेट’ मान रहे हैं। यदि एक सम्मानित और पुरस्कृत अधिकारी को सरेआम दफ्तर में गोली मार दी जाती है, तो यह पूरी व्यवस्था के इकबाल पर हमला है। बिहार नगर सेवा संघ का आक्रोश केवल एक मृत्यु पर विलाप नहीं है, बल्कि यह उस सड़ती हुई व्यवस्था के खिलाफ एक सामूहिक गर्जना है जो अपने रक्षकों को सुरक्षा देने में विफल रही है। सम्राट सरकार के लिए अगले 48 घंटे अग्निपरीक्षा के समान हैं, जहाँ उन्हें न केवल अपराधियों को पकड़ना है, बल्कि राज्य के हजारों अधिकारियों के टूटे हुए भरोसे को भी जोड़ना है।
वॉयस ऑफ बिहार (VOB) न्यूज़ डेस्क की विशेष रिपोर्ट।


