मामूली टक्कर ने ली बांका के चालक की जान, देवघर-गोड्डा रोड पर बाइक सवार युवकों ने हेलमेट और पत्थरों से कूची संवेदनाएं

देवघर/बांका। मानवीय संवेदनाओं के पतन और ‘रोड रेज’ की बढ़ती हिंसक प्रवृत्ति ने एक और हंसते-खेलते परिवार की खुशियों को मातम में बदल दिया है। देवघर-गोड्डा मुख्य मार्ग पर शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026 की देर रात जो कुछ भी हुआ, वह सभ्य समाज के माथे पर एक गहरा कलंक है। बांका जिले के जयपुर निवासी 50 वर्षीय कार चालक अनिल कुमार मंडल, जो अपनों के बीच खुशियां बांटकर घर लौट रहे थे, उन्हें रास्ते में तीन ‘इंसानी भेड़ियों’ ने घेरकर मौत के घाट उतार दिया। एक छोटी सी टक्कर, जिस पर बातचीत कर मामला सुलझाया जा सकता था, उसे तीन अज्ञात युवकों ने अपनी झूठी शान और गुस्से का मुद्दा बना लिया। हेलमेट और पत्थरों से किए गए प्रहार इतने भीषण थे कि एक स्वस्थ व्यक्ति ने अस्पताल पहुँचते-पहुँचते दम तोड़ दिया। रविवार, 19 अप्रैल 2026 की यह रिपोर्ट न केवल एक जघन्य हत्याकांड की जानकारी देती है, बल्कि यह भी सवाल खड़ा करती है कि आखिर हमारी सड़कों पर ‘इंसानियत’ इतनी सस्ती क्यों हो गई है?

खुशियों के घर से मौत की ओर: वह आखिरी सफर

​मृतक अनिल कुमार मंडल बांका के जयपुर थाना क्षेत्र के रहने वाले थे और पेशे से एक अनुभवी कार चालक थे। शुक्रवार को वे अपने किसी संबंधी के घर देवघर जिले के मोहनपुर स्थित बाराकोला गांव गए हुए थे। वहां एक ‘छठी’ (नवजात के जन्म का उत्सव) का कार्यक्रम था। घर में खुशियों का माहौल था, अनिल ने भी अपनों के साथ वक्त बिताया और देर रात अपनी कार से वापस बांका लौटने के लिए रवाना हुए। वे शायद सोच रहे होंगे कि कुछ घंटों में अपने घर पहुँचकर विश्राम करेंगे, लेकिन नियति ने मोहनपुर के डुमरिया मोड़ के पास उनके लिए मौत का जाल बिछा रखा था।

​रात का सन्नाटा पसरा हुआ था और सड़कों पर वाहनों की आवाजाही कम थी। तभी डुमरिया मोड़ के समीप एक मोटरसाइकिल पर सवार तीन युवक उनकी कार के सामने आ गए। अंधेरे या तेज रफ्तार की वजह से कार और बाइक के बीच एक मामूली टक्कर हो गई। यह एक ऐसा हादसा था जिसमें किसी को गंभीर चोट नहीं आई थी, लेकिन बाइक सवार युवकों का अहंकार इस टक्कर से चोटिल हो गया। यही वह क्षण था जहाँ से एक साधारण सड़क दुर्घटना, एक खूनी वारदात में तब्दील होने लगी।

हेलमेट और पत्थरों से दरिंदगी: सरेराह ‘लिंचिंग’ का खौफनाक मंजर

​टक्कर के बाद अनिल कुमार मंडल ने अपनी कार रोकी। वे एक प्रौढ़ व्यक्ति थे और शायद मामले को सुलझाना चाहते थे, लेकिन सामने खड़े तीन युवक गुस्से में पागल थे। चश्मदीदों और भाई सुनील कुमार मंडल के बयानों के अनुसार, बाइक सवार युवकों ने अनिल को कार से बाहर खींचा और गाली-गलौज शुरू कर दी। अनिल ने समझाने की कोशिश की, लेकिन तीनों युवकों ने उन पर हमला बोल दिया।

​आरोपियों ने सुरक्षा के लिए पहने जाने वाले हेलमेट को ही हथियार बना लिया और अनिल के सिर और चेहरे पर ताबड़तोड़ प्रहार किए। जब इतने से भी मन नहीं भरा, तो पास में पड़े भारी पत्थरों से उनके शरीर को लहूलुहान कर दिया गया। 50 साल के अनिल तीन नौजवानों की सामूहिक ताकत और उनकी बर्बरता का मुकाबला नहीं कर सके। उन्हें अधमरी हालत में सड़क किनारे फेंक कर तीनों बदमाश अपनी मोटरसाइकिल पर सवार होकर अंधेरे में गायब हो गए। यह घटना दर्शाती है कि उन युवकों के मन में न तो कानून का भय था और न ही एक तड़पते हुए इंसान के प्रति कोई दया।

राहगीर की संवेदनशीलता और पुलिस की दौड़

​जब अनिल कुमार मंडल सड़क किनारे खून से लथपथ तड़प रहे थे, तब वहां से गुजर रहे एक अन्य वाहन चालक की नजर उन पर पड़ी। उस राहगीर ने संवेदनशीलता दिखाते हुए तुरंत टोल फ्री नंबर 112 पर पुलिस को सूचना दी। यह उस रात की एकमात्र सकारात्मक कड़ी थी कि किसी ने मदद के लिए हाथ बढ़ाया। सूचना मिलते ही मोहनपुर पुलिस की टीम मौके पर पहुँची।

​पुलिस ने अनिल की गंभीर स्थिति को देखते हुए उन्हें बिना समय गंवाए सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) पहुँचाया। वहां प्राथमिक उपचार के दौरान डॉक्टरों ने पाया कि अंदरूनी चोटें काफी गहरी हैं और सिर में काफी खून बह चुका है। उन्हें बेहतर इलाज के लिए तुरंत सदर अस्पताल देवघर रेफर कर दिया गया। देवघर सदर अस्पताल में डॉक्टरों की टीम ने अनिल को बचाने की हरसंभव कोशिश की, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। इलाज के दौरान शनिवार को अनिल कुमार मंडल ने दम तोड़ दिया। उनकी मौत की खबर जैसे ही बांका पहुँची, वहां के जयपुर इलाके में शोक की लहर दौड़ गई।

भाई सुनील कुमार मंडल की व्यथा: “इंसाफ की पुकार”

​मृतक के भाई सुनील कुमार मंडल ने रोते हुए बताया कि उनके भाई एक सीधे-साधे इंसान थे और वर्षों से ड्राइविंग कर रहे थे। उन्होंने कभी किसी से झगड़ा नहीं किया था। सुनील के अनुसार, “मेरे भाई बाराकोला से खुश होकर लौट रहे थे। उन लड़कों ने महज एक बाइक की टक्कर के लिए मेरे भाई को जान से मार दिया। वे तीन थे और मेरा भाई अकेला, उन्होंने पत्थरों से कुचल-कुचल कर उनकी जान ले ली।”

​सुनील ने पुलिस प्रशासन से मांग की है कि हत्यारों की पहचान जल्द से जल्द की जाए और उन्हें कड़ी से कड़ी सजा मिले। परिवार का रो-रोकर बुरा हाल है। अनिल अपने पीछे भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं, जिनके लिए वे एकमात्र सहारा थे। बांका के जयपुर से आए ग्रामीण भी देवघर अस्पताल के बाहर जमे रहे और इस जघन्य कृत्य के खिलाफ अपना आक्रोश व्यक्त किया। ग्रामीणों का कहना है कि अगर सड़कों पर ऐसे ही हत्यारे घूमते रहेंगे, तो कोई भी व्यक्ति रात के समय सफर करने की हिम्मत नहीं जुटा पाएगा।

मोहनपुर पुलिस की तफ्तीश: सीसीटीवी और हुलिए की तलाश

​मोहनपुर पुलिस ने इस मामले को हत्या की श्रेणी में रखते हुए गहन छानबीन शुरू कर दी है। पुलिस की टीम डुमरिया मोड़ और उसके आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाल रही है ताकि उस संदिग्ध मोटरसाइकिल और तीनों युवकों की पहचान की जा सके। चूंकि घटना रात के समय हुई थी, इसलिए फुटेज में स्पष्टता एक बड़ी चुनौती है, लेकिन पुलिस को उम्मीद है कि किसी न किसी ढाबे या पेट्रोल पंप के कैमरे में आरोपियों का सुराग जरूर मिलेगा।

​थानाध्यक्ष ने बताया कि अज्ञात बदमाशों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर ली गई है। पुलिस की एक विशेष टीम गठित की गई है जो गोड्डा और देवघर के सीमावर्ती इलाकों में छापेमारी कर रही है। पुलिस उन स्थानीय युवकों का रिकॉर्ड भी खंगाल रही है जो क्षेत्र में अक्सर बाइक पर हुड़दंग मचाते पाए जाते हैं। पुलिस का मानना है कि जिस तरह से हेलमेट और पत्थर का उपयोग हुआ है, वह आरोपियों के अचानक उपजे हिंसक आक्रोश को दर्शाता है। आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए तकनीकी इनपुट और मोबाइल टावर लोकेशन की भी मदद ली जा रही है।

राजमार्गों पर सुरक्षा और रोड रेज की बढ़ती चुनौतियां

​देवघर-गोड्डा रोड पर हुई यह वारदात एक बार फिर राजमार्गों पर सुरक्षा व्यवस्था पर सवालिया निशान खड़े करती है। रात के समय गश्त की कमी और असामाजिक तत्वों का जमावड़ा ऐसी घटनाओं को बढ़ावा देता है। ‘रोड रेज’ यानी सड़क पर छोटी सी बात पर होने वाला झगड़ा अब बिहार और झारखंड के सीमावर्ती इलाकों में जानलेवा होता जा रहा है। मनोचिकित्सकों का मानना है कि युवाओं में बढ़ती असहनशीलता और कानून का खौफ न होना उन्हें ऐसी क्रूर वारदातों के लिए उकसाता है।

​इस घटना ने बांका के जयपुर वासियों के बीच एक गहरा डर पैदा कर दिया है। लोग मांग कर रहे हैं कि डुमरिया मोड़ जैसे संवेदनशील स्थानों पर पुलिस की पिकेट या कम से कम हाई-वे पेट्रोलिंग की व्यवस्था और पुख्ता होनी चाहिए। अनिल मंडल की मौत केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं है, बल्कि यह उस भरोसे की हत्या है जो एक नागरिक राज्य की सड़कों पर सुरक्षित सफर करने के लिए करता है। अब सबकी निगाहें मोहनपुर पुलिस पर टिकी हैं कि वे कब इन ‘सड़क के हत्यारों’ को सलाखों के पीछे पहुँचाते हैं।

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