
जमुई। लोकतंत्र के तीन स्तंभों में न्यायपालिका को सबसे पवित्र और सुरक्षित माना जाता है। न्यायालय वह स्थान है जहाँ अपराधी कानून के डर से कांपते हैं और आम नागरिक न्याय की उम्मीद में निर्भय होकर पहुँचता है। लेकिन शुक्रवार, 10 अप्रैल 2026 की दोपहर जमुई जिला न्यायालय परिसर से जो तस्वीरें और खबरें सामने आईं, उन्होंने न केवल कानून व्यवस्था की धज्जियां उड़ाईं, बल्कि न्याय के मंदिर की गरिमा को भी गंभीर ठेस पहुँचाई है। भारी सुरक्षा व्यवस्था और पुलिस बल की मौजूदगी के दावों के बीच, आधा दर्जन बदमाशों ने कोर्ट परिसर के भीतर घुसकर एक युवक की बेरहमी से पिटाई कर दी। यह घटना केवल एक मारपीट का मामला नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर न्यायिक मर्यादा को दी गई एक खुली चुनौती है।
पेशी के दौरान घात लगाकर हमला: जब न्याय की दहलीज पर बिछी दहशत
घटना शुक्रवार दोपहर की है, जब अदालत की कार्यवाही अपने सामान्य वेग से चल रही थी। टाउन थाना क्षेत्र के चौडीहा निवासी डिंपल रावत एक पुराने मामले में अपनी पेशी के लिए कोर्ट पहुँचे थे। वे कानून की प्रक्रिया का पालन करते हुए अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे कि तभी परिसर का माहौल अचानक बदल गया।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, नंदन यादव, चंदन यादव और मोनू भगत अपने करीब आधा दर्जन साथियों के साथ अचानक कोर्ट परिसर में दाखिल हुए। इन लोगों के इरादे पहले से ही हिंसक नजर आ रहे थे। जैसे ही उनकी नज़र डिंपल रावत पर पड़ी, बदमाशों ने उन पर धावा बोल दिया। आरोपियों ने न केवल डिंपल रावत बल्कि उनके साथ मौजूद मुनेश्वर रावत के साथ भी मारपीट शुरू कर दी। कोर्ट जैसे संवेदनशील स्थान पर, जहाँ हर कोने पर सुरक्षाकर्मियों की तैनाती की बात कही जाती है, वहां इस तरह की सामूहिक हिंसा ने वादियों और अधिवक्ताओं के बीच भगदड़ जैसी स्थिति पैदा कर दी।
मर्यादा तार-तार: न्याय के मंदिर में ‘जंगलराज’ जैसी आहट
न्यायालय की मर्यादा यह कहती है कि वहां ऊँची आवाज में बात करना भी अनुशासनहीनता मानी जाती है। ऐसे में परिसर के भीतर मारपीट और गाली-गलौज होना प्रशासनिक विफलता का सबसे बड़ा उदाहरण है। घायल डिंपल रावत को इस हमले में काफी चोटें आई हैं। सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात यह रही कि सरेआम इस वारदात को अंजाम देने के बाद नंदन यादव और उसके साथी बड़े ही आराम से कोर्ट परिसर से बाहर निकलकर फरार हो गए।
पुलिस और सुरक्षा एजेसियां, जो कोर्ट की एंट्री गेट पर सघन तलाशी का दावा करती हैं, इस बात का जवाब देने में असमर्थ नजर आ रही हैं कि आधा दर्जन हमलावर एक साथ परिसर के भीतर कैसे घुस गए और वारदात के बाद उन्हें पकड़ा क्यों नहीं जा सका? क्या जमुई कोर्ट की सुरक्षा केवल कागजों तक सीमित है? यह सवाल आज हर उस व्यक्ति के मन में है जो न्याय की तलाश में अदालत की चौखट पर खड़ा है।
रंजिश की जड़: सिकंदरा का ‘पिकअप’ कनेक्शन
इस पूरी हिंसा के पीछे की कहानी 24 घंटे पुरानी बताई जा रही है। पीड़ित डिंपल रावत के अनुसार, गुरुवार को सिकंदरा में पुलिस ने मवेशियों से लदे एक पिकअप वाहन को जब्त किया था। हमलावर पक्ष का मानना था कि पुलिस को इस वाहन की गुप्त सूचना डिंपल रावत ने दी थी।
इसी झूठे आरोप और रंजिश को मन में पालकर नंदन यादव और उसके गुर्गों ने डिंपल को निशाना बनाया। डिंपल रावत ने बताया कि उनका उस पुलिसिया कार्रवाई से कोई लेना-देना नहीं था, लेकिन बदमाशों ने केवल शक के आधार पर उन्हें सबक सिखाने के लिए कोर्ट परिसर जैसे सुरक्षित स्थान को चुना। यह दर्शाता है कि अपराधियों के मन में अब न तो पुलिस का खौफ बचा है और न ही अदालत की पवित्रता के प्रति कोई सम्मान। वे जानते थे कि डिंपल रावत पेशी के लिए कोर्ट जरूर आएंगे, और उन्होंने इसी मौके का फायदा उठाकर अपनी निजी दुश्मनी निकालने के लिए न्याय के मंदिर को रणभूमि बना दिया।
अधिवक्ता राजेश रंजन का पक्ष: “वकीलों और वादियों की सुरक्षा खतरे में”
इस घटना के बाद जमुई के अधिवक्ताओं में भी गहरा रोष व्याप्त है। मामले पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए अधिवक्ता राजेश रंजन ने कहा कि यह घटना अत्यंत निंदनीय और न्यायपालिका की सुरक्षा पर बड़ा प्रश्नचिह्न है।
”अदालत परिसर में वादियों और अधिवक्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना प्रशासन की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। अगर लोग पेशी के दौरान खुद को असुरक्षित महसूस करेंगे, तो न्याय प्रक्रिया कैसे सुचारू रूप से चलेगी? पेशी पर आए युवक के साथ जिस तरह की मारपीट हुई है, वह सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोलती है। हम मांग करते हैं कि इस मामले में शामिल सभी आरोपियों की तत्काल गिरफ्तारी हो और कोर्ट परिसर की सुरक्षा को और अधिक पुख्ता किया जाए ताकि भविष्य में कोई भी अपराधी इस तरह का दुस्साहस न कर सके।”
सुरक्षा व्यवस्था पर सुलगते सवाल: कहाँ थी पुलिस?
जमुई कोर्ट परिसर में सुरक्षा के लिए बाकायदा पुलिस चौकी और गेट पर मेटल डिटेक्टर जैसे इंतजामों की बात की जाती है। लेकिन शुक्रवार की घटना ने इन इंतजामों को बौना साबित कर दिया।
- पहला सवाल: क्या गेट पर तैनात पुलिसकर्मियों ने इन आधा दर्जन युवकों की पहचान और उनके आने का कारण पूछने की जहमत उठाई?
- दूसरा सवाल: मारपीट के दौरान जब शोर मचा, तब परिसर के भीतर मौजूद सुरक्षाकर्मी कहाँ थे?
- तीसरा सवाल: जमुई जैसे जिले में, जहाँ अपराध का ग्राफ हमेशा चर्चा में रहता है, वहां कोर्ट के निकास द्वारों पर तत्काल नाकेबंदी क्यों नहीं की गई?
इन सवालों के जवाब फिलहाल प्रशासन के पास नहीं हैं। टाउन थाना पुलिस ने मामले की शिकायत दर्ज कर ली है और जांच का आश्वासन दिया है, लेकिन अपराधियों का आसानी से भाग निकलना पुलिस की कार्यशैली पर एक बड़ा दाग है।
निष्कर्ष: कानून के इकबाल को बहाल करने की चुनौती
जमुई की यह घटना केवल डिंपल रावत और नंदन यादव के बीच की आपसी लड़ाई नहीं है, बल्कि यह कानून के राज बनाम अपराधी की हनक की लड़ाई है। अगर कोर्ट परिसर के भीतर ही आम आदमी की जान और सम्मान सुरक्षित नहीं है, तो न्याय की पूरी अवधारणा ही खतरे में पड़ जाती है। न्यायालय की मर्यादा को बनाए रखने के लिए यह अनिवार्य है कि ऐसे दुस्साहसी अपराधियों के खिलाफ ऐसी कार्रवाई की जाए जो एक मिसाल बने।
डिंपल रावत का घायल होना और न्याय के आंगन में बदमाशों का तांडव करना, बिहार के प्रशासनिक तंत्र के लिए एक अलार्म है। जरूरत इस बात की है कि जमुई पुलिस न केवल इन अपराधियों को सलाखों के पीछे पहुँचाए, बल्कि यह भी सुनिश्चित करे कि भविष्य में किसी भी वादी को अदालत की दहलीज पार करते समय अपनी सुरक्षा की चिंता न करनी पड़े। जब तक अपराधियों के मन में यह विश्वास रहेगा कि वे अदालत के भीतर भी हिंसा कर सकते हैं और बच निकल सकते हैं, तब तक न्याय की देवी की आंखों पर बंधी पट्टी और बोझिल महसूस करेगी। अब सबकी नज़रें जमुई पुलिस की अगली कार्रवाई पर हैं।
घटना का संक्षेप:
- स्थान: जिला न्यायालय परिसर, जमुई।
- समय: शुक्रवार दोपहर (10 अप्रैल, 2026)।
- पीड़ित: डिंपल रावत एवं मुनेश्वर रावत (चौडीहा निवासी)।
- आरोपी: नंदन यादव, चंदन यादव, मोनू भगत एवं अन्य।
- कारण: सिकंदरा में मवेशी लदे वाहन को पकड़े जाने की रंजिश।
- वर्तमान स्थिति: आरोपी फरार, टाउन थाना पुलिस जांच में जुटी।


