‘पढ़ेगा बिहार’ के नारों के बीच भागलपुर में छात्रों का चीखता सच: अपने ही स्कूल में दाखिले को तरसे छात्र, नामांकन के लिए जिलाधिकारी की चौखट पर पहुंचे सैकड़ों बच्चे

मुख्य बिंदु:

  • स्थान: तुलसीपुर जमुनिया इंटर स्तरीय विद्यालय, नाथनगर, भागलपुर।
  • विवाद: इसी विद्यालय से आठवीं कक्षा पास करने के बावजूद छात्रों को नौवीं में नामांकन देने से इनकार।
  • प्रशासनिक अड़चन: प्रभारी प्रधानाचार्य का दावा कि विभाग से केवल 76 छात्रों की सूची प्राप्त हुई है।
  • पक्षपात का आरोप: स्थानीय बच्चों को छोड़कर बाहरी छात्रों को प्राथमिकता देने का स्कूल प्रबंधन पर आरोप।
  • छात्रों का प्रदर्शन: सैकड़ों छात्र-छात्राएं अपनी शिकायत लेकर जिलाधिकारी के जनता दरबार पहुंचे।
  • अभिभावकों की चिंता: गांव के स्कूल में नामांकन नहीं होने पर बच्चों की पढ़ाई छूटने का मंडरा रहा खतरा।

​शिक्षा किसी भी समाज की रीढ़ होती है, लेकिन जब वही शिक्षा व्यवस्था अपनी ही संतानों के लिए दरवाजे बंद कर ले, तो विद्रोह और आक्रोश का पनपना स्वाभाविक है। भागलपुर जिले के नाथनगर प्रखंड अंतर्गत तुलसीपुर जमुनिया इंटर स्तरीय विद्यालय में इन दिनों एक अजीबोगरीब विरोधाभास देखने को मिल रहा है, जिसने न केवल छात्रों के भविष्य पर सवालिया निशान लगा दिया है, बल्कि सरकारी तंत्र की संवेदनहीनता को भी उजागर किया है। शुक्रवार को भागलपुर के जिलाधिकारी के जनता दरबार में एक ऐसा मंजर दिखा, जिसने हर किसी को सोचने पर मजबूर कर दिया। सैकड़ों की संख्या में छात्र-छात्राएं, अपनी किताबों के बजाय हाथों में शिकायत की अर्जियां लेकर जिलाधिकारी के पास पहुँचे थे। उनका गुनाह बस इतना है कि उन्होंने इसी विद्यालय से आठवीं कक्षा पास की है, लेकिन अब उन्हें नौवीं कक्षा में दाखिला देने से साफ़ मना किया जा रहा है। ‘पढ़ेगा बिहार, बढ़ेगा बिहार’ जैसे लुभावने नारों के बीच भागलपुर की यह तस्वीर शिक्षा विभाग के दावों की पोल खोलती नजर आ रही है।

जब अपना ही स्कूल बन गया ‘पराया’: नामांकन की एक अनकही जंग

​तुलसीपुर जमुनिया विद्यालय के छात्रों की समस्या जितनी साधारण दिखती है, उतनी ही पेचीदा प्रशासनिक स्तर पर बना दी गई है। नियमतः, जो छात्र जिस विद्यालय से आठवीं कक्षा उत्तीर्ण करते हैं, उसी विद्यालय में उनका नौवीं में नामांकन होना लगभग तय माना जाता है। इसे ‘इन-हाउस एडमिशन’ की प्रक्रिया कहा जाता है ताकि छात्रों को नए वातावरण में ढलने की समस्या न हो और उनकी पढ़ाई निर्बाध रूप से चलती रहे। लेकिन यहाँ कहानी पूरी तरह पलट गई है।

​छात्रों का आरोप है कि विद्यालय प्रशासन ने उन्हें यह कहकर वापस भेज दिया कि उनके लिए स्कूल में जगह नहीं है। यह सुनकर न केवल छात्र बल्कि उनके अभिभावक भी सन्न हैं। अभिभावकों का तर्क है कि अगर उनके बच्चे इसी स्कूल से पढ़कर आगे बढ़े हैं, तो वे अब शिक्षा के लिए कहाँ भटकेंगे? क्या शिक्षा का अधिकार केवल कागजों तक सीमित है? ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा का स्तर सुधारने के लिए सरकार करोड़ों खर्च करती है, लेकिन जब नामांकन जैसे बुनियादी मुद्दे पर ही बच्चों को सड़कों पर उतरना पड़े, तो व्यवस्था की विफलता स्पष्ट हो जाती है।

प्रभारी प्रधानाचार्य का तर्क: व्यवस्था का दोष या सीटों का संकट?

​इस पूरे विवाद के केंद्र में विद्यालय के प्रभारी प्रधानाचार्य का वह बयान है, जिसने आग में घी डालने का काम किया है। प्रधानाचार्य का कहना है कि उन्हें उच्चाधिकारियों से केवल 76 छात्रों के नामांकन की एक आधिकारिक सूची प्राप्त हुई है। वे इसी सूची के आधार पर दाखिला लेने के लिए बाध्य हैं। अब सवाल यह उठता है कि अगर आठवीं कक्षा पास करने वाले स्थानीय छात्रों की संख्या 76 से कहीं अधिक है, तो बाकी छात्र कहाँ जाएंगे?

​क्या विद्यालय प्रशासन ने पहले से ही सीटों की कमी के बारे में शिक्षा विभाग को अवगत नहीं कराया था? 76 छात्रों की इस सूची को तैयार करने का मापदंड क्या है और इसमें उन बच्चों को प्राथमिकता क्यों नहीं दी गई जो पहले से इसी स्कूल का हिस्सा हैं? हैरानी की बात यह है कि इस सूची में स्थानीय गांव के बच्चों के बजाय बाहरी क्षेत्रों के छात्रों के नाम शामिल होने की बात कही जा रही है। इसी बिंदु ने ग्रामीणों और अभिभावकों के आक्रोश को बढ़ा दिया है। उनका कहना है कि प्राथमिकता स्थानीय बच्चों को मिलनी चाहिए, ताकि उन्हें शिक्षा के लिए मीलों दूर न जाना पड़े।

स्थानीय बनाम बाहरी: प्राथमिकता के नियम पर छिड़ा विवाद

​अभिभावकों ने विद्यालय प्रशासन पर मनमानी और पक्षपात का सीधा आरोप लगाया है। ग्रामीण परिवेश में विद्यालय और समुदाय के बीच एक गहरा जुड़ाव होता है। सरकारी गाइडलाइंस के अनुसार, किसी भी सरकारी स्कूल में पहली प्राथमिकता उसी गांव या पोषक क्षेत्र के बच्चों को दी जाती है। लेकिन तुलसीपुर जमुनिया स्कूल में इस नियम को कथित रूप से ताक पर रख दिया गया है।

​अभिभावकों का कहना है कि अगर उनके गांव के बच्चों को इसी स्कूल में जगह नहीं मिली, तो उन्हें 5 से 10 किलोमीटर दूर दूसरे स्कूलों में जाना होगा। दूर के स्कूलों में जाने के लिए परिवहन का खर्च बढ़ेगा, जिसे कई गरीब परिवार वहन करने में असमर्थ हैं। सबसे बड़ा खतरा छात्राओं की पढ़ाई पर है; लंबी दूरी तय करने की मजबूरी के कारण कई माता-पिता अपनी बेटियों की पढ़ाई छुड़वा सकते हैं, जो सरकार के ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ अभियान को बड़ा झटका होगा।

जिलाधिकारी के दरबार में न्याय की गुहार: “हमें पढ़ने दो”

​शुक्रवार को भागलपुर के जिलाधिकारी का जनता दरबार उम्मीदों का केंद्र बना रहा। सैकड़ों की संख्या में छात्र-छात्राएं, जिनमें लड़कियों की संख्या काफी अधिक थी, चिलचिलाती धूप में कतारबद्ध खड़े रहे। उनकी आँखों में गुस्सा भी था और भविष्य को लेकर डर भी। जनता दरबार में पहुँचे छात्रों ने अपनी आपबीती सुनाते हुए कहा कि उन्होंने सालों इसी स्कूल की मिट्टी में पढ़ाई की है और अब उन्हें ही वहां से बाहर निकाला जा रहा है।

​छात्रों का यह दर्द उन तमाम दावों पर भारी पड़ता दिखा जो शिक्षा विभाग अक्सर डिजिटल नामांकन और सुलभ शिक्षा को लेकर करता है। अभिभावकों ने जिलाधिकारी को सौंपे ज्ञापन में स्पष्ट किया है कि यदि स्थानीय बच्चों का नामांकन सुनिश्चित नहीं किया गया, तो वे उग्र आंदोलन करने को बाध्य होंगे। छात्रों ने साफ़ शब्दों में कहा कि वे किसी दूसरे स्कूल में नहीं जाना चाहते क्योंकि वहां जाने का मतलब है अपनी जड़ों से कटना और पढ़ाई के खर्च में बेतहाशा वृद्धि।

शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर सुलगते सवाल

​भागलपुर में हुई यह घटना बिहार के शिक्षा विभाग की नियोजन प्रक्रिया पर बड़े सवाल खड़े करती है। जब हर साल मार्च-अप्रैल में नामांकन की प्रक्रिया शुरू होती है, तो विभाग को यह पता क्यों नहीं होता कि किस स्कूल से कितने छात्र पास होकर अगले ग्रेड में जा रहे हैं? क्या विभाग को यह जानकारी नहीं थी कि तुलसीपुर जमुनिया स्कूल में आठवीं पास करने वाले छात्रों की संख्या कितनी है? सीटों का निर्धारण और ‘मैपिंग’ पहले क्यों नहीं की गई ताकि ऐसी स्थिति न आए? जब छात्र और अभिभावक बार-बार स्कूल प्रबंधन से मिल रहे थे, तब जिला शिक्षा पदाधिकारी ने इस मामले में हस्तक्षेप क्यों नहीं किया?

​यह स्थिति केवल एक स्कूल की नहीं है, बल्कि बिहार के कई ग्रामीण स्कूलों में बुनियादी ढांचे और सीटों की कमी के कारण नामांकन की ऐसी समस्याएं अक्सर सामने आती रहती हैं। लेकिन तुलसीपुर जमुनिया का मामला इसलिए अधिक गंभीर है क्योंकि यहाँ स्कूल के अपने ही छात्रों को बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है।

क्या सुलझेगी नामांकन की यह गुत्थी?

​तुलसीपुर जमुनिया स्कूल के छात्रों का यह विरोध केवल एक प्रशासनिक शिकायत नहीं है, बल्कि यह अपने हक की लड़ाई है। जिलाधिकारी ने छात्रों की समस्याओं को गंभीरता से सुना है और संबंधित अधिकारियों को इस मामले की जांच कर तत्काल समाधान के निर्देश दिए हैं। उम्मीद की जा रही है कि जिलाधिकारी के हस्तक्षेप के बाद सीटों की संख्या बढ़ाई जाएगी या नामांकन प्रक्रिया को संशोधित कर स्थानीय छात्रों को प्राथमिकता दी जाएगी।

​यदि ऐसा नहीं होता है, तो सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों के इन सैकड़ों बच्चों का भविष्य अंधेरे में चला जाएगा। शिक्षा की राह में आने वाली ये प्रशासनिक दीवारें जितनी जल्दी ढहेंगी, बिहार का भविष्य उतना ही उज्ज्वल होगा। फिलहाल, भागलपुर के ये मासूम छात्र अपने न्याय के इंतज़ार में जिलाधिकारी के अगले आदेश की ओर टकटकी लगाए देख रहे हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि शिक्षा विभाग अपनी गलती सुधारता है या इन बच्चों को सड़कों पर ही छोड़ दिया जाता है।

  • ये भी पढ़े..

    बिहार में चीनी उद्योग को मिलेगी नई रफ्तार, बंद चीनी मिलों के पुनर्जीवन और 25 नई मिलों की तैयारी तेज

    Share Add as a preferred…

    भागलपुर में स्वाद का नया ठिकाना बना ‘जायका मटन’, तिलकामांझी में भव्य उद्घाटन के साथ शुरू हुई खास फूड डेस्टिनेशन

    Share Add as a preferred…