फाइलेरिया उन्मूलन अभियान में बिहार की बड़ी उपलब्धि, संयुक्त राष्ट्र और WHO ने की सराहना, चार जिले पहुंचे निगरानी चरण में

पटना। बिहार ने फाइलेरिया (लिम्फेटिक फाइलेरिया/हाथीपांव) उन्मूलन अभियान में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। राज्य के स्वास्थ्य विभाग के अनुसार पहली बार अररिया, मधेपुरा, सुपौल और किशनगंज जिलों ने ट्रांसमिशन असेसमेंट सर्वे (टीएएस-1) के सभी आवश्यक मानकों को सफलतापूर्वक पूरा किया है। इस उपलब्धि के साथ ये जिले अब सामूहिक दवा वितरण (एमडीए) अभियान के अगले चरण में पहुंच गए हैं और फाइलेरिया उन्मूलन कार्यक्रम के निगरानी चरण में प्रवेश करेंगे। इस सफलता को संयुक्त राष्ट्र (यूएन) और विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने भी सराहा है, जिसे बिहार की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।

स्वास्थ्य विभाग के अनुसार यह उपलब्धि केवल एक स्वास्थ्य कार्यक्रम की सफलता नहीं है, बल्कि लंबे समय से चल रहे योजनाबद्ध प्रयासों, जनभागीदारी, वैज्ञानिक रणनीति और स्वास्थ्यकर्मियों के निरंतर परिश्रम का परिणाम है। राज्य सरकार का कहना है कि इस उपलब्धि से भारत को वर्ष 2027 तक फाइलेरिया मुक्त बनाने के राष्ट्रीय लक्ष्य को हासिल करने में भी महत्वपूर्ण सहायता मिलेगी।

फाइलेरिया एक परजीवी संक्रमण से होने वाला रोग है, जो मच्छरों के माध्यम से फैलता है। लंबे समय तक संक्रमण रहने पर यह हाथ, पैर या शरीर के अन्य अंगों में असामान्य सूजन का कारण बन सकता है। इस बीमारी की रोकथाम के लिए नियमित सामूहिक दवा सेवन (एमडीए) अभियान और संक्रमण की निगरानी को सबसे प्रभावी रणनीति माना जाता है।

बिहार स्वास्थ्य विभाग ने बताया कि वर्ष 2026 के एमडीए अभियान के दौरान राज्य को एक दिन में एक करोड़ लोगों को फाइलेरिया रोधी दवा खिलाने का लक्ष्य दिया गया था। हालांकि राज्य ने इस लक्ष्य को पार करते हुए 11 फरवरी 2026 को एक ही दिन में लगभग एक करोड़ 35 लाख लोगों को दवा का सेवन कराया। यह निर्धारित लक्ष्य से लगभग 35 प्रतिशत अधिक उपलब्धि रही, जिसे अभियान की बड़ी सफलता माना गया।

स्वास्थ्य मंत्री निशांत ने कहा कि यह उपलब्धि बिहार सरकार की जनकेंद्रित स्वास्थ्य नीतियों और मजबूत स्वास्थ्य प्रणाली का प्रमाण है। उन्होंने कहा कि इस अभियान में केवल दवाओं का वितरण नहीं किया गया, बल्कि डायरेक्टली ऑब्जर्व्ड ट्रीटमेंट (डीओटी) प्रणाली के तहत प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की मौजूदगी में लोगों को दवा का सेवन भी कराया गया। इससे यह सुनिश्चित हुआ कि दवाएं वास्तव में लोगों द्वारा खाई जाएं और अभियान का अपेक्षित परिणाम प्राप्त हो।

स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि इस अभियान की सफलता का सबसे बड़ा श्रेय राज्य की आशा कार्यकर्ताओं, एएनएम, चिकित्सकों, स्वास्थ्यकर्मियों, जिला एवं प्रखंड स्तर के अधिकारियों और विकास सहयोगी संस्थाओं को जाता है। उन्होंने कहा कि लाखों स्वास्थ्यकर्मियों ने गांव-गांव जाकर लोगों को जागरूक किया और दवा सेवन सुनिश्चित किया। इसी जनसहभागिता के कारण अभियान को व्यापक सफलता मिली।

स्वास्थ्य विभाग के अनुसार वर्तमान में बिहार के 11 जिलों के कुल 89 इम्प्लीमेंटेशन यूनिट्स में फाइलेरिया संक्रमण की दर एक प्रतिशत से नीचे पहुंच चुकी है। इनमें अररिया, अरवल, किशनगंज, मधेपुरा, मधुबनी, सुपौल, गया, कैमूर, नालंदा, जहानाबाद और पटना शामिल हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार संक्रमण दर एक प्रतिशत से नीचे आना किसी भी क्षेत्र में फाइलेरिया नियंत्रण की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जाती है।

हाल ही में अररिया, किशनगंज, मधेपुरा और सुपौल जिलों के कुल 37 इम्प्लीमेंटेशन यूनिट्स में ट्रांसमिशन असेसमेंट सर्वे-1 (टीएएस-1) कराया गया। इस सर्वे का उद्देश्य यह आकलन करना था कि संबंधित क्षेत्र में फाइलेरिया का संक्रमण अब भी सक्रिय रूप से फैल रहा है या नहीं। सर्वे के परिणामों में 35 इम्प्लीमेंटेशन यूनिट्स ने पहली बार सभी निर्धारित मानकों को सफलतापूर्वक पूरा किया।

स्वास्थ्य विभाग के अनुसार अररिया और मधेपुरा जिले पूरी तरह टीएएस-1 में सफल घोषित किए गए हैं और अब इन्हें टीएएस-2 के लिए चयनित किया गया है। वहीं सुपौल जिले के सभी इम्प्लीमेंटेशन यूनिट्स भी सफलतापूर्वक निगरानी चरण में प्रवेश कर रहे हैं। यह संकेत है कि इन क्षेत्रों में फाइलेरिया संक्रमण का प्रसार काफी हद तक नियंत्रित हो चुका है।

स्वास्थ्य विभाग ने बताया कि जुलाई महीने में राज्य के 25 जिलों के 107 इम्प्लीमेंटेशन यूनिट्स में प्री-ट्रांसमिशन असेसमेंट सर्वे (प्री-टीएएस) संचालित किया जाएगा। इस सर्वे के दौरान प्रत्येक चयनित प्रखंड में तीन स्थानों से रात्रिकालीन रक्त नमूने एकत्र किए जाएंगे। इन नमूनों की वैज्ञानिक जांच के आधार पर यह निर्धारित किया जाएगा कि संबंधित क्षेत्र में संक्रमण की दर एक प्रतिशत से कम है या नहीं। इसके बाद ही आगे के टीएएस सर्वे के लिए पात्रता तय की जाएगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि प्री-टीएएस और टीएएस जैसी प्रक्रियाएं किसी भी राज्य में फाइलेरिया उन्मूलन कार्यक्रम की सफलता का वैज्ञानिक आधार होती हैं। इन सर्वे के माध्यम से यह सुनिश्चित किया जाता है कि संक्रमण वास्तव में नियंत्रित हुआ है और सामूहिक दवा वितरण अभियान को कब समाप्त कर निगरानी चरण में प्रवेश किया जा सकता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा निर्धारित दिशा-निर्देशों के अनुसार जब किसी क्षेत्र में लगातार निर्धारित मानकों के अनुसार संक्रमण दर कम पाई जाती है और टीएएस सफल होता है, तब उस क्षेत्र को दवा वितरण अभियान से आगे बढ़ाकर निगरानी चरण में लाया जाता है। इस दौरान भी संक्रमण की नियमित निगरानी जारी रहती है ताकि बीमारी दोबारा फैलने की संभावना न रहे।

स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि बिहार सरकार फाइलेरिया उन्मूलन के साथ-साथ अन्य संक्रामक रोगों की रोकथाम पर भी समान रूप से ध्यान दे रही है। उन्होंने कहा कि राज्य में जनजागरूकता, समय पर दवा वितरण, नियमित सर्वेक्षण और प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों के माध्यम से स्वास्थ्य सेवाओं को और मजबूत बनाया जा रहा है।

स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि आने वाले महीनों में भी फाइलेरिया उन्मूलन अभियान पूरी गंभीरता के साथ जारी रहेगा। जिन क्षेत्रों में अभी संक्रमण पूरी तरह नियंत्रित नहीं हुआ है, वहां विशेष अभियान चलाकर लोगों को दवा उपलब्ध कराई जाएगी और जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि बिहार की यह उपलब्धि देश के अन्य राज्यों के लिए भी एक प्रेरणादायक मॉडल बन सकती है। बड़े पैमाने पर जनभागीदारी, प्रभावी स्वास्थ्य प्रबंधन और वैज्ञानिक निगरानी के माध्यम से संक्रामक रोगों पर नियंत्रण पाने की दिशा में यह अभियान एक महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है।

कुल मिलाकर, फाइलेरिया उन्मूलन कार्यक्रम में बिहार की इस सफलता ने राज्य की सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाई है। संयुक्त राष्ट्र और विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा मिली सराहना इस बात का संकेत है कि राज्य ने जनस्वास्थ्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। आने वाले समय में यदि इसी प्रकार अभियान जारी रहता है, तो बिहार वर्ष 2027 तक भारत को फाइलेरिया मुक्त बनाने के राष्ट्रीय लक्ष्य में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले अग्रणी राज्यों में शामिल हो सकता है।

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