पिछड़ा और अतिपिछड़ा वर्ग कौशल विकास योजना बनी युवाओं के लिए उम्मीद की नई किरण: 8 वर्षों में 5,413 युवाओं को मिला रोजगारोन्मुखी प्रशिक्षण

पटना। बदलते दौर में केवल शैक्षणिक डिग्री ही रोजगार की गारंटी नहीं मानी जाती, बल्कि व्यावहारिक कौशल और तकनीकी दक्षता भी सफलता की महत्वपूर्ण कुंजी बन चुकी है। इसी सोच के साथ बिहार सरकार द्वारा संचालित पिछड़ा एवं अतिपिछड़ा वर्ग कौशल विकास योजना सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के युवाओं को नई दिशा देने का कार्य कर रही है। इस योजना के तहत वर्ष 2018 से अब तक 5,413 युवाओं को विभिन्न रोजगारपरक और उद्योग आधारित ट्रेड्स में प्रशिक्षण प्रदान किया जा चुका है।

सरकार की यह महत्वाकांक्षी योजना विशेष रूप से पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और अतिपिछड़ा वर्ग (ईबीसी) के युवा-युवतियों को ध्यान में रखकर तैयार की गई है। इसका उद्देश्य केवल प्रशिक्षण देना नहीं, बल्कि युवाओं को रोजगार योग्य बनाकर उन्हें आत्मनिर्भर और आर्थिक रूप से सशक्त बनाना है। पिछले आठ वर्षों के आंकड़े इस बात का संकेत देते हैं कि योजना ने हजारों युवाओं के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

बिहार में लंबे समय से रोजगार और कौशल विकास एक बड़ी चुनौती रही है। विशेष रूप से ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों के युवाओं को तकनीकी प्रशिक्षण और आधुनिक रोजगार अवसरों तक पहुंच बनाने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। ऐसे में सरकार ने यह महसूस किया कि यदि युवाओं को बाजार की मांग के अनुरूप कौशल उपलब्ध कराया जाए तो वे न केवल रोजगार प्राप्त कर सकते हैं बल्कि स्वयं का व्यवसाय भी शुरू कर सकते हैं।

इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए कौशल विकास योजना की शुरुआत की गई। योजना के तहत युवाओं को ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रमों से जोड़ा गया जो सीधे रोजगार और स्वरोजगार से जुड़े हुए हैं। प्रशिक्षण के लिए ऐसे ट्रेड्स का चयन किया गया जिनकी मांग वर्तमान औद्योगिक और सेवा क्षेत्र में लगातार बनी हुई है।

योजना के अंतर्गत प्लंबिंग, इलेक्ट्रीशियन, कंप्यूटर एप्लीकेशन, ब्यूटी कल्चर, फैशन डिजाइनिंग, मशीनरी ऑपरेशन, वेल्डिंग और ड्राइविंग जैसे अनेक रोजगारपरक ट्रेड्स शामिल किए गए हैं। इन क्षेत्रों में प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले युवाओं के लिए रोजगार के अवसर अपेक्षाकृत अधिक उपलब्ध रहते हैं। यही कारण है कि इन पाठ्यक्रमों को युवाओं के बीच अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है।

कौशल विकास विशेषज्ञों का मानना है कि केवल सैद्धांतिक शिक्षा से रोजगार की संभावनाएं सीमित हो सकती हैं, लेकिन जब युवाओं को व्यावहारिक प्रशिक्षण मिलता है तो उनकी कार्यक्षमता और रोजगार क्षमता दोनों बढ़ जाती हैं। इसी कारण योजना के तहत केवल कक्षा आधारित प्रशिक्षण पर जोर नहीं दिया गया है, बल्कि व्यावहारिक अनुभव और कार्यस्थल आधारित सीखने की व्यवस्था भी की गई है।

प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके कई युवाओं ने विभिन्न क्षेत्रों में रोजगार हासिल किया है, जबकि कुछ ने स्वयं का व्यवसाय शुरू कर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने की दिशा में कदम बढ़ाया है। सरकार का मानना है कि कौशल आधारित शिक्षा युवाओं को नौकरी खोजने वाला नहीं बल्कि रोजगार सृजन करने वाला भी बना सकती है।

योजना की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों को वास्तविक कार्य परिस्थितियों से भी परिचित कराया जाता है। इसके लिए इंटर्नशिप और प्रायोगिक प्रशिक्षण की व्यवस्था की गई है। इससे युवाओं को उद्योगों की कार्यशैली समझने का अवसर मिलता है और प्रशिक्षण पूरा होने के बाद उन्हें रोजगार पाने में आसानी होती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि वर्तमान समय में उद्योगों और कंपनियों को ऐसे कर्मचारियों की आवश्यकता होती है जो प्रशिक्षण के तुरंत बाद कार्य शुरू कर सकें। इस दृष्टि से कौशल विकास योजना के तहत दिया जा रहा व्यावहारिक प्रशिक्षण काफी उपयोगी साबित हो रहा है। इससे युवाओं में आत्मविश्वास भी बढ़ता है और वे प्रतिस्पर्धी रोजगार बाजार में बेहतर प्रदर्शन कर पाते हैं।

पिछड़ा और अतिपिछड़ा वर्ग के युवाओं के लिए यह योजना सामाजिक परिवर्तन का माध्यम भी बन रही है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के कई युवक और युवतियां इस योजना के माध्यम से प्रशिक्षण प्राप्त कर अपने परिवार की आय बढ़ाने में योगदान दे रहे हैं। इससे उनके जीवन स्तर में सुधार आया है और समाज में उनकी भागीदारी भी बढ़ी है।

सरकारी अधिकारियों के अनुसार योजना को लेकर युवाओं की रुचि लगातार बढ़ रही है। ग्रामीण क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में युवा प्रशिक्षण कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए आगे आ रहे हैं। इसका एक प्रमुख कारण यह है कि प्रशिक्षण के बाद रोजगार प्राप्त करने की संभावनाएं अधिक होती हैं और युवाओं को अपने भविष्य के प्रति नई उम्मीद दिखाई देती है।

महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में भी यह योजना महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। ब्यूटी कल्चर, फैशन डिजाइनिंग और कंप्यूटर प्रशिक्षण जैसे पाठ्यक्रमों में बड़ी संख्या में युवतियां भाग ले रही हैं। इससे महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने का अवसर मिल रहा है और वे अपने परिवार की आय बढ़ाने में योगदान दे रही हैं।

कौशल विकास कार्यक्रमों की सफलता को देखते हुए सरकार अब इसे और व्यापक बनाने की दिशा में काम कर रही है। विभागीय अधिकारियों का कहना है कि आने वाले समय में प्रशिक्षण केंद्रों की संख्या बढ़ाई जाएगी ताकि अधिक से अधिक युवाओं तक योजना का लाभ पहुंचाया जा सके। इसके अलावा आधुनिक उद्योगों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए नए ट्रेड्स भी शामिल किए जाएंगे।

विशेषज्ञों का मानना है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल तकनीक, ई-कॉमर्स, सोलर एनर्जी, इलेक्ट्रिक वाहन और अन्य उभरते क्षेत्रों में भी कौशल प्रशिक्षण की मांग बढ़ रही है। ऐसे में यदि भविष्य में इन क्षेत्रों को भी योजना से जोड़ा जाता है तो युवाओं को और अधिक अवसर प्राप्त हो सकते हैं।

राज्य सरकार का लक्ष्य केवल प्रशिक्षण देना नहीं बल्कि रोजगार सृजन और सामाजिक सशक्तिकरण को बढ़ावा देना है। यही कारण है कि योजना को रोजगार, उद्यमिता और आत्मनिर्भरता से जोड़कर देखा जा रहा है। पिछले आठ वर्षों में 5,413 युवाओं का प्रशिक्षण इस दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।

बिहार जैसे राज्य में जहां बड़ी युवा आबादी रोजगार की तलाश में है, वहां इस प्रकार की योजनाएं आर्थिक और सामाजिक बदलाव का आधार बन सकती हैं। कौशल विकास के माध्यम से युवाओं को आत्मनिर्भर बनाकर न केवल बेरोजगारी कम की जा सकती है, बल्कि राज्य के समग्र विकास को भी नई गति दी जा सकती है। पिछड़ा एवं अतिपिछड़ा वर्ग कौशल विकास योजना इसी सोच को साकार करने की दिशा में एक प्रभावी कदम साबित हो रही है और आने वाले वर्षों में इसके और व्यापक परिणाम सामने आने की उम्मीद की जा रही है।

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