
भागलपुर। सिल्क सिटी भागलपुर की नगर सरकार और उसके सेवानिवृत्त कर्मचारियों के बीच का संघर्ष अब सड़कों पर उतर आया है। मंगलवार, 21 अप्रैल 2026 को भागलपुर नगर निगम परिसर एक बार फिर नारों और विरोध प्रदर्शनों से गूँज उठा। अपने जीवन का स्वर्ण काल शहर की सेवा में लगाने वाले बुजुर्ग पेंशनरों का धैर्य अब जवाब दे गया है। महीनों से लंबित वेतन और सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाले अन्य लाभों के भुगतान न होने से आक्रोशित पेंशनर नगर आयुक्त के खिलाफ अनिश्चितकालीन धरने पर बैठ गए हैं। प्रदर्शनकारियों का स्पष्ट कहना है कि नगर प्रशासन उन्हें केवल ‘तारीख’ और ‘आश्वासन’ दे रहा है, जबकि उनके घरों में आर्थिक तंगी के कारण चूल्हा जलना मुश्किल हो गया है। भीषण गर्मी की परवाह किए बिना अपनी लाठियों और मांगों के साथ बैठे इन बुजुर्गों ने नगर आयुक्त की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। यह विरोध प्रदर्शन उस समय शुरू हुआ जब 6 अप्रैल को हुई वार्ता के बाद भी कोई ठोस कार्रवाई धरातल पर नजर नहीं आई।
आश्वासन की पोटली और खाली हाथ: पेंशनरों की व्यथा
नगर निगम परिसर में धरने पर बैठे पेंशनरों के तेवर काफी तल्ख थे। प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे सेवानिवृत्त कर्मचारी संघ के नेताओं ने बताया कि यह कोई पहली बार नहीं है जब वे अपने हक के लिए गुहार लगा रहे हैं। इससे पूर्व, 06 अप्रैल 2026 को एक निर्धारित कार्यक्रम के तहत संघ का एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल नगर आयुक्त से मिला था। उस शिष्टाचार मुलाकात का उद्देश्य केवल संवाद करना नहीं, बल्कि प्रशासन को यह याद दिलाना था कि सैकड़ों परिवारों का भविष्य इन फाइलों में दबा हुआ है।
शैलेंद्र पाठक के नेतृत्व में गए उस प्रतिनिधिमंडल में सचिव राजेंद्र ओझा, शंकराचार्य उपाध्याय और जवाहर तांती जैसे वरिष्ठ सदस्य शामिल थे। उस समय नगर आयुक्त ने सकारात्मक रुख दिखाते हुए आश्वासन दिया था कि नगर विकास विभाग, पटना से कुछ दस्तावेजों के सत्यापन की प्रक्रिया चल रही है। उन्होंने स्थापना शाखा को निर्देश भी दिए थे कि जैसे ही पटना से सत्यापित कागजात उपलब्ध होंगे, भुगतान में तेजी लाई जाएगी। लेकिन 15 दिन बीत जाने के बाद भी स्थिति जस की तकी बनी हुई है। पेंशनरों का आरोप है कि ‘पटना’ और ‘सत्यापन’ केवल बहानेबाजी है, ताकि उनकी वाजिब मांगों को और अधिक समय तक टाला जा सके।
आर्थिक तंगी और स्वास्थ्य का संकट
संघ के सचिव राजेंद्र ओझा ने प्रदर्शन के दौरान नगर आयुक्त की वादाखिलाफी पर कड़ा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि पेंशनरों को समय पर भुगतान नहीं मिलने से उनके सामने जीवन और मौत का संकट खड़ा हो गया है। सेवानिवृत्त होने के बाद अधिकांश कर्मचारियों की आय का एकमात्र स्रोत उनकी पेंशन और ग्रेच्युटी की राशि होती है। कई पेंशनर गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं जिनके इलाज और दवाओं का मासिक खर्च हजारों में है।
राजेंद्र ओझा ने दर्द साझा करते हुए बताया कि “प्रशासन को शायद यह अहसास नहीं है कि एक बुजुर्ग के लिए अपनी ही गाढ़ी कमाई के लिए भीख मांगना कितना अपमानजनक है। हमारे बच्चों की पढ़ाई, शादियाँ और यहाँ तक कि रोजमर्रा का राशन भी इसी भुगतान पर टिका है।” प्रदर्शनकारियों का कहना है कि वे शिष्टाचार का पालन करते हुए कई बार मिल चुके हैं, लेकिन जब ‘शिष्टाचार’ को ‘कमजोरी’ समझा जाने लगे, तो आंदोलन ही एकमात्र रास्ता बचता है। नगर निगम परिसर में हुई नारेबाजी ने यह साफ कर दिया कि अब पेंशनर किसी भी नए आश्वासन पर तब तक भरोसा नहीं करेंगे, जब तक उनके बैंक खातों में राशि क्रेडिट नहीं हो जाती।
नगर आयुक्त की कार्यशैली पर उठते सवाल
धरना प्रदर्शन के दौरान नगर आयुक्त के विरुद्ध व्यक्तिगत और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर नारेबाजी की गई। पेंशनरों का कहना है कि स्थापना शाखा की ढुलमुल कार्यप्रणाली के कारण फाइलें एक मेज से दूसरी मेज तक पहुँचने में हफ्तों लगा देती हैं। नगर आयुक्त ने पूर्व में जो निर्देश दिए थे, उनकी धरातल पर मॉनिटरिंग क्यों नहीं की गई? यदि पटना से सत्यापन में देरी हो रही थी, तो इसके लिए किसी अधिकारी को विशेष रूप से जिम्मेदारी क्यों नहीं सौंपी गई?
प्रदर्शनकारियों का एक प्रमुख आरोप यह भी है कि नगर निगम में अन्य फिजूलखर्चों पर रोक नहीं है, लेकिन जब बात उन लोगों की आती है जिन्होंने अपनी जवानी इस संस्थान को दी, तो खजाना खाली होने का रोना रोया जाता है। पेंशनरों ने मांग की है कि स्थापना शाखा के उन बाबुओं पर भी कार्रवाई होनी चाहिए जो जानबूझकर कागजातों को अटका कर रखते हैं। नगर निगम की इस आंतरिक खींचतान और प्रशासनिक सुस्ती ने भागलपुर नगर सरकार की छवि को धूमिल किया है।
आंदोलन की रणनीति: अब आर-पार की लड़ाई
नगर निगम परिसर में जुटे पेंशनरों ने साफ कर दिया है कि यह प्रदर्शन केवल एक दिन का सांकेतिक विरोध नहीं है। यदि नगर आयुक्त तुरंत कोई ठोस समय-सीमा निर्धारित नहीं करते हैं और भुगतान की प्रक्रिया शुरू नहीं होती है, तो यह आंदोलन और भी उग्र रूप लेगा। संघ के सदस्यों ने चेतावनी दी है कि वे नगर निगम के कामकाज को भी ठप कर सकते हैं।
शैलेंद्र पाठक ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि “हम शांतिप्रिय लोग हैं, हमने कानून का हमेशा सम्मान किया है। लेकिन जब हमें भूखा मरने पर मजबूर किया जाएगा, तो हम चुप नहीं रहेंगे।” धरने पर बैठे कई बुजुर्गों की आँखों में आंसू थे, तो कई की आवाज़ में व्यवस्था के प्रति आक्रोश। भागलपुर की चिलचिलाती धूप में नगर निगम के मुख्य द्वार पर बैठे ये बुजुर्ग प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती बन गए हैं। सुरक्षा की दृष्टि से पुलिस बल की भी तैनाती देखी गई, लेकिन पेंशनरों का संकल्प किसी भी दबाव के आगे झुकने वाला नजर नहीं आ रहा था।
क्या कहता है नगर निगम प्रशासन?
हालांकि, इस पूरे हंगामे के बीच नगर आयुक्त या नगर निगम के किसी वरीय अधिकारी ने आधिकारिक रूप से मीडिया के सामने आकर कोई नया बयान जारी नहीं किया है, लेकिन विभागीय सूत्रों का कहना है कि कागजी प्रक्रिया अपने अंतिम चरण में है। नगर विकास विभाग, पटना से तालमेल बिठाने की कोशिश की जा रही है। स्थापना शाखा के अनुसार, कुछ तकनीकी खामियों के कारण डेटा मिसमैच हो रहा था, जिसे सुधारा जा रहा है।
लेकिन पेंशनर इन तकनीकी दलीलों को सुनने के मूड में नहीं हैं। उनका कहना है कि यह उनका सिरदर्द नहीं है कि कंप्यूटर में क्या समस्या है या पटना में कौन सी फाइल अटकी है। प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह समय पर सेवानिवृत्त लाभ प्रदान करे। अब देखने वाली बात यह होगी कि नगर आयुक्त इस गतिरोध को कैसे तोड़ते हैं। क्या वे स्वयं बाहर आकर इन बुजुर्गों के घावों पर मरहम लगाएंगे या फिर यह धरना एक बड़े प्रशासनिक संकट में तब्दील हो जाएगा।


