भागलपुर: साइबर ठगों पर पुलिस का ‘डिजिटल प्रहार’; जागरूकता अभियान से जनता को किया लैस; 1930 का दिया सुरक्षा मंत्र

  • ​वरीय पुलिस अधीक्षक के निर्देशन में साइबर थाना भागलपुर ने शहर के प्रमुख चौक-चौराहों और बाजारों में सघन जागरूकता अभियान चलाया।
  • ​पंपलेट्स और सीधी बातचीत के जरिए लोगों को फिशिंग, ओटीपी फ्रॉड और सोशल मीडिया हैकिंग जैसी डिजिटल चुनौतियों से आगाह किया गया।
  • ​पुलिस ने स्पष्ट संदेश दिया कि किसी भी अनजान लिंक या कॉल पर विश्वास न करें और अपनी बैंकिंग गोपनीय जानकारी किसी से साझा न करें।
  • ​साइबर ठगी की स्थिति में त्वरित सहायता के लिए राष्ट्रीय हेल्पलाइन नंबर 1930 और आधिकारिक पोर्टल के उपयोग की विस्तृत जानकारी दी गई।
  • ​डिजिटल युग में सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए भविष्य में भी नियमित अंतराल पर ऐसे कार्यक्रमों के आयोजन का संकल्प दोहराया गया।

भागलपुर (द वॉयस ऑफ बिहार)।

डिजिटल युग की अदृश्य चुनौती और सजग पुलिस का पहरा

आधुनिकता की दौड़ में जहाँ आज हर हाथ में स्मार्टफोन और हर जेब में डिजिटल वॉलेट है, वहीं अपराध का चेहरा भी पूरी तरह बदल चुका है। अब लुटेरे सड़कों पर कट्टा लहराकर नहीं, बल्कि मोबाइल की स्क्रीन पर एक लुभावना लिंक भेजकर आपकी गाढ़ी कमाई पर डाका डालते हैं। इसी अदृश्य खतरे को भांपते हुए भागलपुर पुलिस ने मोर्चा संभाल लिया है। बुधवार, 8 अप्रैल 2026 को सिल्क सिटी की सड़कों पर साइबर पुलिस की सक्रियता एक नए सामाजिक बदलाव की गवाही दे रही थी। वरीय पुलिस अधीक्षक भागलपुर के कड़े रुख और मार्गदर्शन में शहर के व्यस्ततम इलाकों में एक व्यापक साइबर जागरूकता अभियान की शुरुआत की गई। इस मुहिम का नेतृत्व पुलिस उपाधीक्षक (साइबर) ने किया, जबकि पूरी निगरानी पुलिस अधीक्षक नगर द्वारा की गई। यह अभियान केवल एक सरकारी प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि साइबर ठगों के बढ़ते साम्राज्य के खिलाफ आम आदमी को सशक्त बनाने का एक रक्षा कवच था।

चौक-चौराहों पर ‘साइबर पाठशाला’: जब पुलिस बनी शिक्षक

भागलपुर के सैंडिस कंपाउंड से लेकर स्टेशन चौक और वेरायटी चौक से लेकर सुजागंज बाजार तक, पुलिस की टीमें पूरी तैयारी के साथ मुस्तैद दिखीं। अमूमन खाकी वर्दी को देखकर लोग अपराध की खबरों की तलाश करते हैं, लेकिन यहाँ दृश्य कुछ अलग था। साइबर थाना के पदाधिकारी और जवान राहगीरों को रोककर उनसे अपराधी की नहीं, बल्कि उनके अपने डिजिटल व्यवहार की चर्चा कर रहे थे। दुकानदारों, छात्रों और कामकाजी महिलाओं के बीच रंगीन पंपलेट्स बांटे गए, जिनमें ठगी के उन तमाम तरीकों का जिक्र था जो आज के दौर में सबसे ज्यादा प्रचलित हैं। पुलिस अधिकारियों ने अपनी ‘अस्थायी पाठशाला’ में लोगों को बताया कि कैसे एक छोटा सा ‘ओटीपी’ साझा करना आपके बैंक खाते को शून्य कर सकता है। इस संवाद ने पुलिस और जनता के बीच की दूरी को कम किया और सुरक्षा के प्रति एक नया विश्वास पैदा किया।

फिशिंग से लेकर सोशल मीडिया हैकिंग तक: हर खतरे का हुआ विश्लेषण

जागरूकता अभियान के दौरान साइबर विशेषज्ञों ने उन सूक्ष्म तरीकों की परतें खोलीं जिनका इस्तेमाल कर ठग लोगों के मनोविज्ञान से खेलते हैं। लोगों को समझाया गया कि ‘फिशिंग’ क्या होती है—कैसे बैंक के नाम पर आने वाला एक ईमेल या संदेश आपको एक नकली वेबसाइट पर ले जाता है और आपकी लॉगिन जानकारी चुरा लेता है। इसके अलावा, आजकल बढ़ते ‘सोशल मीडिया हैकिंग’ और ‘प्रोफाइल क्लोनिंग’ के मामलों पर भी विस्तार से चर्चा की गई। युवाओं को विशेष रूप से आगाह किया गया कि वे अनजान लोगों की फ्रेंड रिक्वेस्ट स्वीकार न करें और अपनी प्राइवेसी सेटिंग्स को हमेशा मजबूत रखें। लॉटरी जीतने, कैशबैक मिलने या बिजली बिल कटने के नाम पर आने वाले फर्जी कॉल्स की वास्तविकता भी लोगों के सामने रखी गई, जिससे कई लोग अब तक अनभिज्ञ थे।

यूपीआई और क्यूआर कोड का भ्रम: तकनीकी बारीकियों पर जोर

डिजिटल इंडिया के इस दौर में यूपीआई (UPI) पेमेंट सबसे सुलभ माध्यम है, लेकिन यही ठगों का सबसे बड़ा हथियार भी बन गया है। पुलिस टीम ने बाजारों में घूम-घूम कर दुकानदारों को समझाया कि ‘पैसे प्राप्त करने के लिए कभी भी पिन (PIN) डालने या क्यूआर कोड स्कैन करने की आवश्यकता नहीं होती’। यह एक ऐसा भ्रम है जिसमें अक्सर कम पढ़े-लिखे लोग ही नहीं, बल्कि उच्च शिक्षित युवा भी फंस जाते हैं। पदाधिकारियों ने जोर देकर कहा कि यदि कोई अजनबी आपको पैसे भेजने के नाम पर क्यूआर कोड भेजता है, तो समझ लीजिए कि वह आपके खाते से पैसे निकालने की साजिश रच रहा है। सुरक्षा का सबसे बड़ा मंत्र यही दिया गया कि बैंकिंग जानकारी, चाहे वह पासवर्ड हो या एटीएम पिन, किसी भी परिस्थिति में किसी के साथ साझा न करें, चाहे फोन करने वाला खुद को बैंक अधिकारी ही क्यों न बताए।

गोल्डन ऑवर की महत्ता: ठगी हो जाए तो क्या करें?

अभियान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा ‘एक्शन आफ्टर फ्रॉड’ यानी ठगी के बाद की कार्रवाई पर केंद्रित था। साइबर पुलिस ने बताया कि ठगी के मामलों में शुरुआती एक से दो घंटे ‘गोल्डन ऑवर’ कहलाते हैं। यदि इस दौरान सही जगह सूचना दे दी जाए, तो ठगी गई राशि को अपराधी के खाते में फ्रीज (Freeze) कराना संभव हो जाता है। इसके लिए राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन नंबर 1930 को याद रखने की अपील की गई। साथ ही आधिकारिक पोर्टल (www.cybercrime.gov.in) पर शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया भी बताई गई। पुलिस ने जनता को आश्वस्त किया कि वे किसी भी साइबर अपराध का शिकार होने पर डरे नहीं और न ही शर्मिंदा हों, बल्कि तत्काल साइबर थाना भागलपुर से संपर्क करें ताकि समय रहते तकनीकी कार्रवाई की जा सके।

जनता का उत्साह और पुलिस की दूरगामी रणनीति

भागलपुर के नागरिकों ने पुलिस की इस पहल का गर्मजोशी से स्वागत किया। स्टेशन चौक पर एक छात्र ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि पहले उसे लगता था कि केवल कम जानकार लोग ही ठगी का शिकार होते हैं, लेकिन पुलिस की बातों से समझ आया कि तकनीकी रूप से सक्षम लोग भी लापरवाही में फंस सकते हैं। व्यापारियों ने भी माना कि डिजिटल लेन-देन के बढ़ते दौर में यह जानकारी उनके व्यवसाय की सुरक्षा के लिए अनिवार्य है। साइबर थाना भागलपुर ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह अभियान केवल एक दिन के लिए नहीं है। भविष्य में स्कूलों, कॉलेजों और ग्रामीण क्षेत्रों के पंचायतों में भी ऐसे सेमिनार आयोजित किए जाएंगे। प्रशासन का लक्ष्य भागलपुर को एक ‘साइबर सुरक्षित जिला’ बनाना है, जहाँ तकनीक का उपयोग तो बढ़े, लेकिन अपराध का ग्राफ न्यूनतम रहे।

तकनीक और तर्क का संतुलन ही असली सुरक्षा

भागलपुर पुलिस का यह जागरूकता अभियान डिजिटल साक्षरता की दिशा में एक बड़ा कदम है। केवल पुलिस के भरोसे अपराध कम नहीं किया जा सकता, इसके लिए नागरिक जागरूकता प्राथमिक शर्त है। जब हर नागरिक सतर्क होगा और अपनी गोपनीय जानकारी को तिजोरी की तरह सुरक्षित रखेगा, तभी साइबर ठगों के मंसूबे नाकाम होंगे। वरीय पुलिस अधीक्षक के नेतृत्व में शुरू हुई यह मुहिम भागलपुर के सामाजिक जीवन में सुरक्षा की एक नई परत चढ़ा रही है। ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ की टीम प्रशासन के इस प्रयास की सराहना करती है और पाठकों से अपील करती है कि वे पुलिस द्वारा दिए गए इन सुझावों को अपने जीवन में उतारें, क्योंकि आपकी एक छोटी सी सावधानी ही आपकी मेहनत की कमाई की सबसे बड़ी पहरेदार है।

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