भागलपुर : सबौर के चंदेरी में ‘मिट्टी’ के लिए बहा खून: जमीन विवाद में घायल महेंद्र यादव की अस्पताल में मौत

भागलपुर। 08 अप्रैल 2026: बिहार में जमीन की एक-एक इंच की लड़ाई कितनी भयावह हो सकती है, इसका ताजा और दर्दनाक उदाहरण भागलपुर जिले के सबौर थाना क्षेत्र में देखने को मिला है। चंदेरी गांव में महज चंद कट्ठा जमीन के मालिकाना हक को लेकर शुरू हुआ विवाद अंततः एक जान लेवा साबित हुआ। पिछले दिनों हुई हिंसक मारपीट में गंभीर रूप से जख्मी हुए महेंद्र यादव ने बुधवार को इलाज के दौरान मायागंज अस्पताल (JLNMCH) में दम तोड़ दिया। महेंद्र यादव की मौत की खबर जैसे ही चंदेरी गांव पहुँची, पूरे इलाके में मातम पसर गया। सगे-संबंधियों की चीख-पुकार से गांव का माहौल गमगीन है, वहीं दूसरी ओर इस हत्याकांड के बाद गांव में तनाव की स्थिति बनी हुई है, जिसे देखते हुए पुलिस प्रशासन पूरी तरह मुस्तैद है।

​विवाद की जड़: पैतृक भूमि या कब्जे की होड़?

​सबौर थाना क्षेत्र का चंदेरी गांव लंबे समय से इस भूमि विवाद की तपिश झेल रहा था। बताया जा रहा है कि महेंद्र यादव और उनके विरोधियों के बीच जमीन के एक विशेष टुकड़े को लेकर काफी समय से तनातनी चल रही थी। ग्रामीण सूत्रों के अनुसार, इस जमीन को लेकर पहले भी कई बार पंचायतें हुईं और स्थानीय स्तर पर सुलह की कोशिशें की गईं, लेकिन ईगो (अहम) और जमीन के प्रति मोह ने किसी भी पक्ष को पीछे नहीं हटने दिया।

​घटना वाले दिन, इसी विवादित जमीन पर कब्जे या सीमांकन को लेकर दोनों पक्ष आमने-सामने आ गए थे। लाठी-डंडों और धारदार हथियारों से हुई उस खूनी भिड़ंत में महेंद्र यादव को निशाना बनाया गया। उन पर हुए जानलेवा हमले में उनके सिर और शरीर के अंदरूनी अंगों पर गंभीर चोटें आई थीं। खून से लथपथ महेंद्र यादव को उसी समय स्थानीय लोगों की मदद से अस्पताल ले जाया गया था, जहाँ से उनकी स्थिति बिगड़ने पर उन्हें मायागंज अस्पताल रेफर कर दिया गया।

​अस्पताल में संघर्ष और आखिरी सांस

​मायागंज अस्पताल के आईसीयू वार्ड में महेंद्र यादव पिछले कुछ दिनों से जिंदगी और मौत के बीच जंग लड़ रहे थे। डॉक्टरों की एक विशेष टीम उनके उपचार में जुटी थी, लेकिन चोटें इतनी गहरी थीं कि उनके शरीर ने दवाओं पर प्रतिक्रिया देना बंद कर दिया था। बुधवार की दोपहर जब डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित किया, तो अस्पताल परिसर में मौजूद परिजनों के सब्र का बांध टूट गया।

​महेंद्र यादव के परिजन विशाल कुमार ने रुंधे गले से बताया कि उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि जमीन का एक टुकड़ा उनके घर के मुखिया की जान ले लेगा। विशाल के अनुसार, महेंद्र यादव परिवार के स्तंभ थे और उनकी मौत ने पूरे कुनबे को अनाथ कर दिया है। परिजनों का आरोप है कि हमलावरों ने सोची-समझी साजिश के तहत महेंद्र यादव पर हमला किया था ताकि उन्हें रास्ते से हटाया जा सके।

​गांव में मातमी सन्नाटा और पुलिसिया दबिश

​महेंद्र यादव की मौत के बाद चंदेरी गांव में स्थिति काफी संवेदनशील हो गई है। एक ओर जहाँ पीड़ित परिवार के घर से उठती सिसकियां माहौल को भारी कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर आरोपी पक्ष के घरों में ताला लटका हुआ है। गिरफ्तारी के डर से आरोपी पक्ष के पुरुष सदस्य गांव छोड़कर फरार बताए जा रहे हैं।

​सबौर थाना पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए शव को अपने कब्जे में ले लिया और पोस्टमार्टम की प्रक्रिया शुरू कर दी है। पुलिस का कहना है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद मौत के तकनीकी कारणों का और अधिक स्पष्ट खुलासा हो सकेगा। थानाध्यक्ष ने बताया कि इस मामले में पहले ही प्राथमिकी (FIR) दर्ज की जा चुकी थी, जिसे अब हत्या की धाराओं में तब्दील किया जाएगा। पुलिस की कई टीमें आरोपियों की तलाश में संभावित ठिकानों पर छापेमारी कर रही हैं।

​जमीन विवाद: बिहार के गांवों का नासूर

​चंदेरी की यह घटना कोई इकलौती वारदात नहीं है। बिहार के ग्रामीण अंचलों में जमीन विवाद एक ऐसे नासूर की तरह है जो हर दिन किसी न किसी घर के चिराग को बुझा रहा है। राजस्व विभाग और अंचल कार्यालयों की सुस्ती, दस्तावेजों में गड़बड़ी और समय पर पुलिसिया हस्तक्षेप की कमी अक्सर छोटे विवादों को बड़े हत्याकांडों में तब्दील कर देती है।

​स्थानीय बुद्धिजीवियों का मानना है कि अगर समय रहते इस विवाद का समाधान अंचल कार्यालय या थाना स्तर पर ‘जनता दरबार’ के माध्यम से करा लिया गया होता, तो आज महेंद्र यादव जीवित होते। चंदेरी गांव के लोगों में इस बात को लेकर भी आक्रोश है कि प्रशासन ने पहले मिली शिकायतों को गंभीरता से क्यों नहीं लिया।

​आगे की राह और प्रशासनिक चुनौती

​महेंद्र यादव की मौत के बाद अब पुलिस के सामने दोहरी चुनौती है। पहली चुनौती आरोपियों को जल्द से जल्द सलाखों के पीछे पहुँचाना है ताकि पीड़ित परिवार को न्याय मिल सके। दूसरी और सबसे बड़ी चुनौती गांव में जातीय या गुटीय हिंसा को भड़कने से रोकना है। एहतियात के तौर पर चंदेरी गांव में पुलिस बल की तैनाती कर दी गई है और वरीय अधिकारी स्थिति पर पैनी नजर रख रहे हैं।

​पुलिस अधीक्षक (नगर) ने इस मामले में संज्ञान लेते हुए सबौर पुलिस को स्पीडी ट्रायल (त्वरित सुनवाई) के माध्यम से दोषियों को कड़ी सजा दिलाने का निर्देश दिया है। पुलिस का दावा है कि तकनीकी साक्ष्यों और चश्मदीदों के बयानों के आधार पर केस को इतना मजबूत बनाया जाएगा कि अपराधी कानून की गिरफ्त से बच न सकें।

​निष्कर्ष: कब थमेगा यह खूनी खेल?

​महेंद्र यादव तो चले गए, लेकिन उनके पीछे बिलखता परिवार और डरा हुआ गांव कई सवाल छोड़ गया है। क्या जमीन की कीमत एक इंसान की जान से बढ़कर है? चंदेरी गांव की गलियों में आज सन्नाटा है, लेकिन यह सन्नाटा आने वाले तूफान की आहट भी हो सकता है अगर समय रहते न्याय न मिला। भागलपुर जिला प्रशासन को अब यह सुनिश्चित करना होगा कि महेंद्र यादव का बलिदान व्यर्थ न जाए और जमीन के नाम पर होने वाले इस खूनी खेल पर स्थायी लगाम लगाई जा सके।

​परिजनों की मांग है कि हत्यारों को फांसी की सजा मिले और उनकी सुरक्षा की गारंटी दी जाए। फिलहाल, भागलपुर की सड़कों पर महेंद्र यादव का पार्थिव शरीर अपने गांव की ओर जा रहा है, जहाँ उनकी अंतिम यात्रा में पूरा इलाका शामिल होने की तैयारी कर रहा है।

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