गरीबी और जिम्मेदारियों के बोझ तले बुझा घर का इकलौता चिराग: भागलपुर में 18 वर्षीय ई-रिक्शा चालक ने मौत को लगाया गले

भागलपुर। 08 अप्रैल 2026 : सिल्क सिटी भागलपुर के विश्वविद्यालय थाना क्षेत्र से एक ऐसी हृदयविदारक घटना सामने आई है, जिसने समाज के अंतिम पायदान पर खड़े परिवारों की जद्दोजहद और उनके भीतर पनप रही खामोश हताशा को बेनकाब कर दिया है। छोटी साहेबगंज इलाके में एक 18 वर्षीय किशोर, जो अपने परिवार का एकमात्र सहारा और इकलौता वारिस था, उसने फंदे से झूलकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली। गरीबी, बीमार पिता और तीन कुंवारी बहनों की शादी की चिंता के बीच फंसे इस किशोर की मौत ने पूरे साहेबगंज इलाके में सन्नाटा पसार दिया है। ई-रिक्शा चलाकर चंद रुपयों की कमाई से परिवार की नैया पार लगाने की कोशिश करने वाले मनीष कुमार की इस आत्मघाती कदम ने कई अनसुलझे सवाल पीछे छोड़ दिए हैं।

​अभावों की कोख से उपजी त्रासदी: एक झोपड़ी और भारी उम्मीदें

​मृतक की पहचान साहेबगंज निवासी बबलू शाह के पुत्र मनीष कुमार (18 वर्ष) के रूप में की गई है। मनीष का परिवार छोटी साहेबगंज में एक कच्ची झोपड़ी में रहने को मजबूर है। परिवार की माली हालत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मनीष के सिर पर अपनी तीन छोटी बहनों की शादी और उनके भविष्य की जिम्मेदारी थी।

​पड़ोसियों का कहना है कि मनीष दिन भर शहर की सड़कों पर ई-रिक्शा चलाता था ताकि घर में शाम का चूल्हा जल सके। महज 18 साल की उम्र, जहाँ युवा अपने सुनहरे भविष्य के सपने देखते हैं, वहां मनीष के कंधों पर पूरे कुनबे का बोझ था। उसके पिता बबलू शाह खुद लंबे समय से मानसिक अस्वस्थता से जूझ रहे हैं, और हाल ही में उनके सिर में आई एक गहरी चोट ने उनकी स्थिति को और भी गंभीर बना दिया है। ऐसे में मनीष ही घर का एकमात्र कमाऊ सदस्य था।

​आखिरी रात और खामोश सुबह: जब बांस के सहारे लटकी मिली लाश

​परिजनों के अनुसार, मंगलवार की रात सब कुछ सामान्य सा लग रहा था। मनीष ने परिवार के साथ रात का भोजन किया और सोने के लिए अपने कमरे में चला गया। किसी को इस बात का आभास तक नहीं था कि यह उसकी आखिरी रात होगी। बुधवार की सुबह जब सूरज चढ़ आया और मनीष के कमरे का दरवाजा नहीं खुला, तो परिजनों को कुछ अनहोनी की आशंका हुई।

​जब परिजन कमरे के भीतर पहुंचे, तो उनकी चीख निकल गई। मनीष का शव छत के बांस के सहारे फंदे से लटक रहा था। घर में कोहराम मच गया। आनन-फानन में स्थानीय लोगों और पुलिस की मदद से फंदे को काटकर मनीष को नीचे उतारा गया। परिजन इस उम्मीद में उसे लेकर मायागंज अस्पताल (JLNMCH) भागे कि शायद उसकी सांसें बची हों, लेकिन वहां ड्यूटी पर तैनात डॉक्टरों ने उसे देखते ही ‘मृत’ घोषित कर दिया। अस्पताल के कॉरिडोर में गूंजती परिजनों की चीखें वहां मौजूद हर व्यक्ति की आंखें नम कर रही थीं।

​मानसिक कमजोरी और नशे की लत: एक उलझी हुई गुत्थी

​घटना के कारणों को लेकर स्थानीय स्तर पर दो तरह की चर्चाएं हैं। परिजनों का मानना है कि मनीष मानसिक रूप से थोड़ा कमजोर था और परिवार की दयनीय आर्थिक स्थिति ने उसे और अधिक अवसाद (Depression) में धकेल दिया था। एक तरफ बीमार पिता और दूसरी तरफ तीन बहनों का भविष्य—यह दबाव एक 18 साल के किशोर के लिए असहनीय हो गया था।

​वहीं, कुछ स्थानीय लोगों का कहना है कि मनीष नशे का भी आदी हो गया था। गरीबी और अवसाद के कारण अक्सर युवा गलत संगति या नशे की ओर मुड़ जाते हैं, जो अंततः उन्हें ऐसे विनाशकारी रास्तों पर ले जाता है। हालांकि, पुलिस का कहना है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट और विस्तृत जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो पाएगा कि आत्महत्या के पीछे की मुख्य वजह आर्थिक तंगी थी, मानसिक तनाव था या फिर नशे का कोई प्रभाव।

​पिता की हालत नाजुक: बार-बार खो रहे हैं सुध-बुध

​इस हादसे का सबसे गहरा असर मनीष के पिता बबलू शाह पर पड़ा है। पहले से ही अस्वस्थ पिता अपने इकलौते बेटे के जाने के सदमे को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं। वे बार-बार बेहोश हो रहे हैं और होश आने पर बस अपने बेटे का नाम पुकार रहे हैं। परिवार के पास अंतिम संस्कार तक के लिए पर्याप्त पैसे नहीं हैं, जिससे स्थिति और भी कारुणिक हो गई है। बहनों का रो-रोकर बुरा हाल है; उनके लिए भाई केवल एक रिश्ता नहीं था, बल्कि वह दीवार था जिसके भरोसे उनका पूरा घर टिका हुआ था।

​प्रशासनिक कार्रवाई और सामाजिक सरोकार

​सूचना मिलने पर विश्वविद्यालय थाना की पुलिस ने मौके पर पहुंचकर स्थिति का जायजा लिया। पुलिस ने शव को पंचनामा के बाद पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है। थाना प्रभारी ने बताया कि यूडी (UD) केस दर्ज कर मामले की पड़ताल की जा रही है।

​”यह एक बेहद मार्मिक घटना है। एक युवा का इस तरह चले जाना समाज के लिए क्षति है। हम हर पहलू से जांच कर रहे हैं कि क्या कोई बाहरी दबाव या रंजिश तो नहीं थी, हालांकि प्रथम दृष्टया यह आत्महत्या का ही मामला लग रहा है।”

गरीबी और उपेक्षा की भेंट चढ़ता बचपन

​मनीष की मौत केवल एक पुलिस रिकॉर्ड की फाइल बनकर रह जाएगी या फिर यह प्रशासन और समाज को झकझोरने का काम करेगी? भागलपुर जैसे शहरों में ऐसे कई ‘मनीष’ हैं जो उम्र से पहले जिम्मेदारियों के बोझ तले दब जाते हैं। सरकारी योजनाओं की पहुँच इन झोपड़ियों तक क्यों नहीं हो पाती? क्या मानसिक स्वास्थ्य की काउंसलिंग केवल बड़े शहरों के समृद्ध लोगों तक ही सीमित रहेगी?

​जब तक गरीबी उन्मूलन और मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता जमीनी स्तर पर नहीं पहुंचेगी, तब तक मासूम जानें इसी तरह व्यवस्था की कमियों और आर्थिक तंगी की भेंट चढ़ती रहेंगी। साहेबगंज की वह खाली ई-रिक्शा अब बस एक मूक गवाह बनकर खड़ी है उस संघर्ष की, जो मनीष ने अपनी आखिरी सांस तक लड़ा।

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