
- मुजफ्फरपुर के गरहा स्थित अर्जुन बाबू पशु मेले में बुधवार को उस समय अफरा-तफरी मच गई, जब भोजपुरी सुपरस्टार खेसारी लाल यादव के मंच पर पहुँचते ही हजारों की भीड़ बेकाबू हो गई और भगदड़ जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई।
- औराई के पूर्व बीजेपी विधायक रामसूरत राय द्वारा आयोजित इस वार्षिक मेले में सुरक्षा के दावे उस समय खोखले साबित हुए, जब हुजूम ने बैरिकेडिंग तोड़कर स्टेज की ओर बढ़ने की कोशिश की, जिसे रोकने के लिए पुलिस को बल प्रयोग (लाठीचार्ज) करना पड़ा।
- महज दो दिन पहले इसी मेले के मंच पर डांसरों के बीच हुई मारपीट का वीडियो वायरल हुआ था, जिसके बावजूद आयोजकों और स्थानीय प्रशासन ने सुरक्षा मानकों में कोई ठोस बदलाव नहीं किया, जो एक बड़ी लापरवाही की ओर इशारा करता है।
- नालंदा के मघड़ा मंदिर में हुई हालिया भगदड़ की त्रासदी के बावजूद मुजफ्फरपुर में इतने बड़े आयोजन के लिए ‘क्राउड मैनेजमेंट’ (भीड़ प्रबंधन) की कोई पुख्ता योजना धरातल पर नजर नहीं आई।
- घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से प्रसारित हो रहा है, जिसमें पुलिस कर्मियों को भीड़ पर लाठियां चटकाते और लोगों को जान बचाकर इधर-उधर भागते हुए देखा जा सकता है।
मुजफ्फरपुर/गरहा (द वॉयस ऑफ बिहार)।
मनोरंजन की चाह और मौत का साया: जब सुरों के बीच मची चीख-पुकार
मुजफ्फरपुर जिले का गरहा इलाका बुधवार को एक बड़े हादसे का गवाह बनते-बनते बचा, लेकिन कुव्यवस्था की जो तस्वीर यहाँ से सामने आई है, वह डराने वाली है। अर्जुन बाबू पशु मेला, जो अपनी भव्यता और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए उत्तर बिहार में प्रसिद्ध है, इस बार विवादों और अव्यवस्था का केंद्र बन गया है। बुधवार को यहाँ भोजपुरी फिल्म जगत के दिग्गज गायक और अभिनेता खेसारी लाल यादव का कार्यक्रम प्रस्तावित था। जैसे ही शाम ढली और खेसारी के कार्यक्रम की घोषणा हुई, मेले में मौजूद हजारों की संख्या में प्रशंसकों का हुजूम बेकाबू हो गया। देखते ही देखते मनोरंजन का यह मंच अराजकता के अखाड़े में तब्दील हो गया, जहाँ हर कोई अपने पसंदीदा कलाकार की एक झलक पाने के लिए नियमों और सुरक्षा घेरों को रौंदने पर आमादा था।
बैरीकेडिंग टूटी और शुरू हुआ ‘खूनी’ संघर्ष
आयोजन स्थल पर भीड़ का दबाव इतना अधिक था कि प्रशासन द्वारा लगाए गए लोहे और बांस के बैरिकेड्स ताश के पत्तों की तरह ढह गए। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, जैसे ही खेसारी लाल यादव ने मंच पर कदम रखा, पीछे खड़ी भीड़ ने आगे बढ़ने के लिए धक्का-मुक्की शुरू कर दी। कुछ ही पलों में स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई और लोग एक-दूसरे के ऊपर गिरने लगे। भगदड़ मचते ही पूरे परिसर में चीख-पुकार मच गई। ड्यूटी पर तैनात पुलिस कर्मियों ने पहले तो लाउडस्पीकर के जरिए लोगों को शांत रहने की अपील की, लेकिन जब बेकाबू हुजूम मंच की ओर बढ़ने लगा, तो मजबूरन पुलिस को लाठियां भांजनी पड़ीं। पुलिस के इस ‘हल्के’ लाठीचार्ज के बाद भीड़ तितर-बितर हुई, लेकिन इस दौरान कई लोगों को मामूली चोटें भी आईं।
नालंदा त्रासदी से क्यों नहीं लिया सबक?
यह घटना इसलिए भी अधिक गंभीर है क्योंकि अभी हाल ही में नालंदा के मघड़ा स्थित शीतला माता मंदिर में भगदड़ मचने से आठ महिलाओं की मौत हो गई थी। उस घटना के बाद बिहार के डीजीपी ने स्पष्ट निर्देश दिए थे कि राज्य के सभी सार्वजनिक और धार्मिक स्थलों पर ‘सुरक्षा ऑडिट’ अनिवार्य होगा और भीड़ प्रबंधन के लिए विशेष प्रोटोकॉल का पालन किया जाएगा। मुजफ्फरपुर के इस मेले में पूर्व विधायक रामसूरत राय जैसे रसूखदार व्यक्ति का संरक्षण प्राप्त होने के बावजूद, बुनियादी सुरक्षा मानकों की अनदेखी की गई। सवाल उठता है कि जब प्रशासन को पता था कि खेसारी लाल यादव जैसे बड़े कलाकार को देखने के लिए लाखों की भीड़ जुट सकती है, तो वहां अतिरिक्त बल और ‘होल्डिंग एरिया’ की व्यवस्था क्यों नहीं की गई थी?
विवादों का पुराना नाता: जब मंच पर ही भिड़ गई थीं डांसर
अर्जुन बाबू पशु मेले की साख पिछले कुछ दिनों से लगातार गिर रही है। इसी बुधवार की घटना से ठीक दो दिन पहले, मेले के ही एक सांस्कृतिक कार्यक्रम के दौरान मंच पर डांसरों के बीच जमकर मारपीट हुई थी। उस समय भी सुरक्षाकर्मी मूकदर्शक बने रहे थे और कानून-व्यवस्था का मजाक उड़ाया गया था। दो दिनों के भीतर यह दूसरी बड़ी घटना है जिसने यह साबित कर दिया है कि मेले के आयोजक केवल भीड़ जुटाने और आर्थिक लाभ कमाने में रुचि रख रहे हैं, जबकि आम जनता की सुरक्षा उनकी प्राथमिकता सूची में कहीं नहीं है। लगातार हो रही इन घटनाओं ने स्थानीय ग्रामीणों और दूर-दराज से आए व्यापारियों के मन में भी भय पैदा कर दिया है।
आयोजकों की भूमिका और राजनीतिक संरक्षण के सवाल
औराई के पूर्व बीजेपी विधायक रामसूरत राय इस मेले के मुख्य संरक्षक और आयोजक माने जाते हैं। राजनीतिक रसूख वाले व्यक्ति के कार्यक्रम में इस तरह की अव्यवस्था होना प्रशासनिक विफलता का बड़ा प्रमाण है। पुलिस बल की मौजूदगी के बावजूद भीड़ का बेकाबू होना यह दर्शाता है कि पुलिस और आयोजकों के बीच समन्वय का घोर अभाव था। स्थानीय लोगों का आरोप है कि वीआईपी दर्शन और विशिष्ट अतिथियों के लिए की गई विशेष व्यवस्थाओं के कारण आम जनता को संकरी दीर्घाओं में ठूंस दिया गया था, जिससे दबाव बढ़ गया और भगदड़ मची।
सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो: पुलिसिया तंत्र की बेबसी या सख्ती?
घटना के जो वीडियो वायरल हो रहे हैं, वे विचलित करने वाले हैं। एक ओर प्रशंसक अपने कलाकार की जय-जयकार कर रहे हैं, तो दूसरी ओर पुलिस की लाठियां उनके कंधों पर गिर रही हैं। वीडियो में अफरा-तफरी का जो माहौल दिख रहा है, वह किसी भी समय एक बड़ी जनहानि में तब्दील हो सकता था। पुलिस का दावा है कि अगर लाठीचार्ज नहीं किया जाता, तो भीड़ मंच पर चढ़ जाती और बड़ा हादसा हो सकता था। लेकिन सवाल यह है कि ऐसी नौबत ही क्यों आई कि पुलिस को अपने ही नागरिकों पर बल प्रयोग करना पड़ा? क्या पहले से ‘क्राउड कंट्रोल’ की रणनीति नहीं बनाई जा सकती थी?
सुरक्षा व्यवस्था पर खड़े होते गंभीर प्रश्नचिह्न
बिहार में मेलों और त्योहारों के दौरान होने वाले हादसे अब आम होते जा रहे हैं। मुजफ्फरपुर की यह घटना उस ‘सिस्टम’ पर प्रहार है जो कागजों पर तो चाक-चौबंद रहता है, लेकिन जमीन पर पूरी तरह विफल साबित होता है। मेले में न तो पर्याप्त निकासी द्वार (Exit Points) थे और न ही आपातकालीन चिकित्सा की कोई ठोस व्यवस्था। अगर भगदड़ में कोई गंभीर रूप से घायल हो जाता, तो भीड़भाड़ के बीच एम्बुलेंस का पहुँचना भी नामुमकिन था। प्रशासन अब भले ही जांच की बात कर रहा है, लेकिन क्या वह इन लापरवाहियों के लिए आयोजकों पर कोई कड़ी कार्रवाई करने का साहस जुटा पाएगा?
निष्कर्ष: मनोरंजन की कीमत पर जान का जोखिम कब तक?
मुजफ्फरपुर का अर्जुन बाबू मेला अब मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि अव्यवस्था के लिए चर्चा में है। खेसारी लाल यादव का कार्यक्रम भले ही संपन्न हो गया हो, लेकिन जो डर और अराजकता पीछे छूट गई है, उसका हिसाब कौन देगा? सरकार को चाहिए कि वह ऐसे बड़े आयोजनों के लिए ‘अनिवार्य सुरक्षा बीमा’ और ‘थर्ड पार्टी ऑडिट’ जैसे कड़े नियम लागू करे। नालंदा से लेकर मुजफ्फरपुर तक, भगदड़ की ये घटनाएं एक ही कहानी कहती हैं—व्यवस्था की संवेदनहीनता। द वॉयस ऑफ बिहार की टीम प्रशासन से यह मांग करती है कि इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच हो और भविष्य में रामसूरत राय जैसे किसी भी आयोजक को तब तक अनुमति न दी जाए जब तक कि वे सुरक्षा के अंतरराष्ट्रीय मानकों को पूरा न करें।


