संघर्ष से सफलता तक: मेडिकल शॉप चलाने वाले पिता के बेटे ने IIT खड़गपुर से इंजीनियर बनकर BPSC में हासिल की सफलता, बने SDM

गया: बिहार के गया जिले के रहने वाले प्रवीण कुमार की सफलता की कहानी संघर्ष, मेहनत और आत्मविश्वास का ऐसा उदाहरण है, जो हजारों युवाओं को प्रेरित कर सकती है। एक छोटे से गांव से निकलकर पहले आईआईटी खड़गपुर से इंजीनियर बने और अब 70वीं बीपीएससी परीक्षा में सफलता हासिल कर एसडीएम (Sub Divisional Magistrate) पद पर चयनित हुए हैं।

प्रवीण कुमार ने अपने तीसरे प्रयास में बीपीएससी परीक्षा पास करते हुए 1306वीं रैंक हासिल की है। इसके साथ ही वे अपने परिवार के पहले प्रशासनिक अधिकारी बन गए हैं।

आर्थिक तंगी में बीता बचपन

प्रवीण कुमार के पिता वीरेंद्र चौधरी ग्रामीण क्षेत्र में एक छोटी मेडिकल दुकान चलाते हैं, जबकि उनकी मां सुशीला देवी आंगनबाड़ी सेविका हैं। बड़े भाई सीआरपीएफ में कांस्टेबल हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति वर्षों तक कमजोर रही, लेकिन माता-पिता ने बेटे की शिक्षा से कभी समझौता नहीं किया।

पिता बताते हैं कि गांव में अच्छी शिक्षा व्यवस्था नहीं होने के कारण उन्होंने प्रवीण को शुरुआती कक्षाओं में घर पर ही पढ़ाया। कक्षा 1 से 5 तक उन्होंने किसी स्कूल में नामांकन नहीं कराया और खुद शिक्षक बनकर बेटे को पढ़ाया।

नवोदय से शुरू हुआ बड़ा सफर

बाद में प्रवीण का नामांकन मध्य विद्यालय में कराया गया और फिर उन्होंने नवोदय विद्यालय की प्रवेश परीक्षा पास कर गया के जेठियन स्थित नवोदय विद्यालय में दाखिला लिया।

दसवीं के बाद उन्होंने दक्षिणा फाउंडेशन की स्कॉलरशिप परीक्षा पास की, जिसके बाद बेंगलुरु में इंटरमीडिएट की पढ़ाई और जेईई की तैयारी का अवसर मिला।

JEE में 99.9 परसेंटाइल, फिर IIT खड़गपुर

प्रवीण ने 2016 में जेईई मेन में 99.9 परसेंटाइल हासिल किया। शानदार प्रदर्शन के दम पर उन्हें देश के प्रतिष्ठित संस्थान IIT Kharagpur में दाखिला मिला।

इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद वर्ष 2020 में उन्हें पुणे की एक सॉफ्टवेयर कंपनी में नौकरी मिली, जहां वे अच्छी सैलरी पर कार्यरत रहे।

वर्क फ्रॉम होम ने बदली जिंदगी

कोरोना काल में वर्क फ्रॉम होम के दौरान प्रवीण के मन में सिविल सेवा में जाने का सपना और मजबूत हुआ। नौकरी के साथ-साथ उन्होंने यूपीएससी और बीपीएससी की तैयारी शुरू कर दी।

उन्होंने बताया कि आर्थिक मजबूरी के कारण नौकरी छोड़ना संभव नहीं था, इसलिए उन्होंने नौकरी और पढ़ाई दोनों को साथ लेकर चलने का फैसला किया।

“कोरोना काल में वर्क फ्रॉम होम मिला तो सिविल सर्विसेज की तैयारी का जुनून पैदा हुआ। नौकरी के साथ पढ़ाई जारी रखी और आज उसका परिणाम सामने है।” — प्रवीण कुमार

असफलताओं से नहीं मानी हार

प्रवीण को सफलता एक दिन में नहीं मिली।

  • पहले प्रयास में वे बीपीएससी प्रीलिम्स में मात्र 1 नंबर से चूक गए।
  • दूसरे प्रयास में मेन्स परीक्षा में केवल 13 अंकों से पीछे रह गए।
  • यूपीएससी 2024 में भी सफलता नहीं मिली।

इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और तीसरे प्रयास में बीपीएससी पास कर एसडीएम बनने का सपना पूरा कर लिया।

मां का सपना हुआ पूरा

मां सुशीला देवी बताती हैं कि आंगनबाड़ी सेविका के रूप में काम करते समय जब बड़े अधिकारियों को निरीक्षण के लिए आते देखती थीं, तब मन में एक ही इच्छा होती थी कि उनका बेटा भी एक दिन अधिकारी बने।

आज बेटे के एसडीएम बनने के बाद उनका वह सपना साकार हो गया है।

बिना कोचिंग हासिल की सफलता

प्रवीण कुमार का कहना है कि उन्होंने बीपीएससी की तैयारी के लिए किसी कोचिंग संस्थान का सहारा नहीं लिया।

“मैंने पूरी तैयारी सेल्फ स्टडी से की है। सिर्फ ऑनलाइन मॉक टेस्ट दिए, जिससे अपनी कमियों को समझने में मदद मिली।” — प्रवीण कुमार

अभी खत्म नहीं हुआ लक्ष्य

एसडीएम बनने के बाद भी प्रवीण का सपना पूरा नहीं हुआ है। उनका अगला लक्ष्य यूपीएससी पास कर आईएएस अधिकारी बनना है।

वे कहते हैं कि प्रशासनिक सेवा के साथ-साथ अपनी पढ़ाई भी जारी रखेंगे और समाज के लिए बेहतर काम करने का प्रयास करेंगे।

छात्रों के लिए लाइब्रेरी खोलने का सपना

प्रवीण कुमार का मानना है कि मोबाइल फोन युवाओं का काफी समय बर्बाद कर रहा है। इसलिए वे अपने कार्यक्षेत्र में ग्रामीण इलाकों में लाइब्रेरी विकसित करने और छात्रों को पढ़ाई के लिए बेहतर माहौल उपलब्ध कराने की दिशा में काम करना चाहते हैं।

पूरे इलाके में खुशी का माहौल

एसडीएम बनने की खबर मिलते ही गया और शेरघाटी क्षेत्र में खुशी की लहर दौड़ गई। सामाजिक, शैक्षणिक और राजनीतिक संगठनों से जुड़े लोग लगातार उनके घर पहुंचकर बधाई दे रहे हैं।

प्रवीण कुमार की कहानी यह साबित करती है कि कठिन परिस्थितियां सफलता की राह में बाधा नहीं बनतीं, यदि लक्ष्य स्पष्ट हो और मेहनत ईमानदार हो।

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