बारात से पहले मां दूल्हे को क्यों पिलाती है दूध? IPS केके बिश्नोई की शादी से चर्चा में आई अनोखी रस्म

जोधपुर/बरेली: चर्चित आईपीएस अधिकारी और की शादी इन दिनों सोशल मीडिया पर खूब चर्चा बटोर रही है। शादी की भव्य तस्वीरों और वीडियो के बीच एक खास परंपरा ने लोगों का ध्यान खींचा है—बारात से पहले मां द्वारा दूल्हे को दूध पिलाने की रस्म।

यह परंपरा कई लोगों के लिए नई और चौंकाने वाली जरूर हो सकती है, लेकिन इसका सांस्कृतिक और भावनात्मक महत्व बेहद गहरा है।

क्या है ‘आंचल पीना’ या स्तनपान की रस्म?

राजस्थान और खासकर बिश्नोई समाज में इस परंपरा को ‘आंचल पीना’ कहा जाता है। यह एक प्रतीकात्मक रस्म होती है, जिसमें दूल्हा बारात निकलने से पहले अपनी मां के पास जाता है और मां उसे दूध पिलाती है।

हालांकि आज के समय में कई जगह यह रस्म सीधे स्तनपान के बजाय थाली या कटोरी में दूध देकर निभाई जाती है। इसका उद्देश्य परंपरा को निभाना और भावनात्मक जुड़ाव को दर्शाना होता है।

रस्म के पीछे क्या है असली भाव?

इस परंपरा का संबंध सिर्फ एक रस्म से नहीं, बल्कि गहरे भाव से जुड़ा है।

  • यह मां के दूध के ऋण को स्वीकार करने का प्रतीक है
  • यह दर्शाता है कि बेटा कितना भी बड़ा हो जाए, मां का कर्ज नहीं चुका सकता
  • शादी जैसे नए जीवन की शुरुआत से पहले मां का आशीर्वाद लेना

समाज में माना जाता है कि यह रस्म बेटे को उसके संस्कार और जड़ों से जोड़ती है।

मां-बेटे के रिश्ते का भावुक प्रतीक

यह परंपरा मां और बेटे के बीच के अटूट रिश्ते को दर्शाती है। जब बेटा विवाह के बाद नई जिम्मेदारियों में कदम रखता है, तब यह रस्म उसे याद दिलाती है कि उसकी पहली पहचान और शक्ति उसकी मां से ही आती है।

इस दौरान मां अपने बेटे के सिर पर हाथ रखकर उसे सुखी वैवाहिक जीवन का आशीर्वाद देती है।

बिश्नोई समाज की खास पहचान

राजस्थान का बिश्नोई समाज अपनी अनोखी परंपराओं और प्रकृति प्रेम के लिए जाना जाता है।

  • यहां ममता को सर्वोच्च स्थान दिया जाता है
  • महिलाओं द्वारा जानवरों (खासकर हिरण) को भी स्तनपान कराने की कहानियां प्रसिद्ध हैं
  • यह समाज मानव और प्रकृति के बीच संतुलन का प्रतीक माना जाता है

इसी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में ‘आंचल पीना’ जैसी रस्मों का विशेष महत्व है।

सोशल मीडिया पर क्यों हो रही चर्चा?

IPS अधिकारी केके बिश्नोई की शादी का यह वीडियो वायरल होने के बाद लोगों में इस परंपरा को लेकर जिज्ञासा बढ़ गई है।
कई लोग इसे भावुक और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ा मान रहे हैं, तो कुछ इसे नई नजर से समझने की कोशिश कर रहे हैं।

बदलते समय में परंपरा का स्वरूप

समय के साथ इस रस्म के स्वरूप में बदलाव जरूर आया है, लेकिन इसका मूल भाव आज भी कायम है—
मां का स्नेह, आशीर्वाद और बेटे का सम्मान।

निष्कर्ष

‘आंचल पीना’ सिर्फ एक रस्म नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति में रिश्तों की गहराई और भावनात्मक जुड़ाव का प्रतीक है।
IPS केके बिश्नोई की शादी ने एक बार फिर इस परंपरा को चर्चा में ला दिया है और लोगों को अपनी जड़ों से जुड़ी परंपराओं को समझने का मौका दिया है।

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