
समाचार के मुख्य बिंदु: सात समंदर पार अपनों की सुरक्षा पर उठ रहे बड़े सवाल
- संसदीय हस्तक्षेप: भागलपुर सांसद अजय कुमार मंडल ने 20 मार्च 2026 को लोकसभा में प्रश्न संख्या 4802 के माध्यम से विदेशों में भारतीय नागरिकों, विशेषकर बिहार के लोगों की सुरक्षा का मुद्दा उठाया।
- सरकारी स्वीकारोक्ति: विदेश राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने माना कि मंत्रालय के पास प्रवासियों की मौतों का राज्यवार या बिहार-विशिष्ट डेटा उपलब्ध नहीं है।
- मौत के आंकड़े: पिछले तीन वर्षों (2023-2025) में कुल 34,672 भारतीय प्रवासियों की विदेशों में मृत्यु हुई है।
- कल्याणकारी कोष: संकटग्रस्त भारतीयों की मदद के लिए भारतीय समुदाय कल्याण कोष (ICWF) के माध्यम से करोड़ों रुपये खर्च किए गए हैं।
- बड़ी मांग: अजय कुमार मंडल ने केंद्र सरकार से राज्यवार डेटा तैयार करने और प्रभावित परिवारों के लिए अधिक प्रभावी मुआवजा प्रणाली सुनिश्चित करने की मांग की है।
- VOB इनसाइट: बिहार के प्रवासी श्रमिक अक्सर खाड़ी देशों में कठिन परिस्थितियों में काम करते हैं। डेटा के अभाव में यह समझना असंभव है कि कितनी बिहारी विधवाओं या अनाथ बच्चों को सरकारी सहायता की आवश्यकता है। सांसद की यह पहल बिहार के श्रम बल के लिए एक सुरक्षा कवच बन सकती है।
भागलपुर/नई दिल्ली | 28 मार्च, 2026
बिहार की मिट्टी से दूर, रोजी-रोटी की तलाश में सात समंदर पार गए श्रमिकों की नियति आज संसद की गलियारों में चर्चा का केंद्र बन गई। भागलपुर सांसद अजय कुमार मंडल ने लोकसभा में उन हजारों परिवारों की आवाज उठाई है, जिनके अपने विदेशों में काम करते हुए काल के गाल में समा गए। ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ (VOB) की विशेष रिपोर्ट के अनुसार, संसद में उठाया गया यह प्रश्न बिहार के उस दर्द को बयां करता है, जिसे अब तक केवल ‘आंकड़ों की बाजीगरी’ के पीछे छिपाया जाता रहा है।
34,672 मौतें और डेटा का ‘अंधेरा’: संसद में क्या हुआ?
अजय कुमार मंडल ने सरकार से पिछले तीन वर्षों के दौरान विदेशों में हुई बिहार के मूल निवासियों की मौतों का विस्तृत ब्यौरा मांगा था। उन्होंने मृत्यु के कारणों, जैसे प्राकृतिक दुर्घटना, आत्महत्या या अपराध, और पीड़ित परिवारों को दी गई सहायता के बारे में स्पष्ट जानकारी चाही थी।
विदेश राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने इस प्रश्न का लिखित उत्तर देते हुए एक चौंकाने वाला खुलासा किया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि मंत्रालय के पास प्रवासियों की मौतों का राज्यवार या बिहार के संदर्भ में अलग-अलग डेटा उपलब्ध नहीं है। हालांकि, उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर जो आंकड़े पेश किए, वे डराने वाले हैं।
विदेशी जमीं पर बुझते चिराग (पिछले 3 वर्षों का डेटा):
- वर्ष 2023: 11,841 भारतीय नागरिकों की मृत्यु।
- वर्ष 2024: 11,061 भारतीय नागरिकों की मृत्यु।
- वर्ष 2025: 11,770 भारतीय नागरिकों की मृत्यु। कुल मिलाकर, पिछले तीन वर्षों में 34,672 भारतीयों की जान विदेशों में गई है। यदि इनमें खाड़ी देशों (सऊदी अरब, यूएई) के आंकड़ों को देखें, तो वहां मौतों का ग्राफ सबसे अधिक है।
मदद का तंत्र: कागजों पर सुरक्षा और धरातल की चुनौतियां
सरकार ने सदन को बताया कि विदेशों में रहने वाले भारतीयों की सुरक्षा और कल्याण उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता है। भारतीय मिशन केंद्र और दूतावास संकट की स्थिति में कई प्रकार की कांसुलर सहायता प्रदान करते हैं।
सरकार द्वारा प्रदान की जाने वाली सहायता के मुख्य बिंदु:
- बुनियादी मदद: संकट में फंसे भारतीयों को भोजन, आश्रय और दवा उपलब्ध कराई जाती है।
- कानूनी सहयोग: मिशनों में वकीलों का एक स्थानीय पैनल होता है जो भारतीय समुदाय को कानूनी सहायता प्रदान करता है।
- शिकायत निवारण: भारतीय नागरिक ‘मदद’ (MADAD) और ‘सीपीजीआरएएमएस’ जैसे पोर्टलों के साथ-साथ 24 घंटे चलने वाली हेल्पलाइन का उपयोग कर सकते हैं।
- विशेष सहायता केंद्र: दुबई, शारजाह, रियाद, जेद्दा और कुआलालंपुर जैसे शहरों में ‘प्रवासी भारतीय सहायता केंद्र’ (PBSK) स्थापित किए गए हैं ताकि श्रमिकों की शिकायतों का मौके पर समाधान हो सके।
भारतीय समुदाय कल्याण कोष (ICWF): खर्च का लेखा-जोखा
विदेश मंत्रालय ने संकटग्रस्त भारतीयों की वित्तीय सहायता के लिए ‘भारतीय समुदाय कल्याण कोष’ (ICWF) का विवरण भी साझा किया है। पिछले पांच वर्षों में इस फंड का उपयोग बढ़ता गया है:
- 2021: 422 लाभार्थियों पर ₹5.70 करोड़ खर्च।
- 2022: 507 लाभार्थियों पर ₹8.65 करोड़ खर्च।
- 2023: 433 लाभार्थियों पर ₹9.06 करोड़ खर्च।
- 2024: 488 लाभार्थियों पर ₹11.96 करोड़ खर्च।
- 2025 (सितंबर तक): 312 लाभार्थियों पर ₹8.48 करोड़ खर्च।
यह फंड मृतकों के पार्थिव अवशेषों को स्वदेश भेजने और फंसे हुए भारतीयों को वापस लाने में एक बड़ी भूमिका निभाता है।
अजय कुमार मंडल की हुंकार: “बिहारी श्रमिकों का डेटा क्यों नहीं?”
सांसद अजय कुमार मंडल ने सरकार के उत्तर पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि राज्यवार डेटा का न होना एक गंभीर कमी है। बिहार के लाखों लोग अपनी मेहनत से देश को विदेशी मुद्रा (Remittance) भेजते हैं, लेकिन जब उनकी मृत्यु होती है, तो उनके परिवारों को कागजी औपचारिकताओं के कारण भटकना पड़ता है।
उन्होंने सरकार से मांग की है कि:
- भविष्य में प्रवासियों का डेटा राज्य के आधार पर संकलित किया जाए ताकि बिहार सरकार भी अपने स्तर पर सहायता योजनाएं बना सके।
- मृतकों के पार्थिव अवशेषों को भारत लाने की प्रक्रिया को और अधिक सरल बनाया जाए।
- प्रभावित गरीब परिवारों को मिलने वाली वित्तीय सहायता की राशि में बढ़ोतरी की जाए।
अजय कुमार मंडल ने आश्वासन दिया कि वे इस विषय को आने वाले सत्रों में और अधिक गंभीरता से उठाएंगे ताकि बिहार के उन प्रवासी नागरिकों के हितों की रक्षा हो सके जो अपने परिवार के भविष्य के लिए विदेशों की चिलचिलाती धूप में खून-पसीना एक करते हैं।
VOB का नजरिया: सुशासन और प्रवासियों की गरिमा
’द वॉयस ऑफ बिहार’ (VOB) का मानना है कि भागलपुर सांसद ने एक ऐसे मुद्दे को छुआ है जो बिहार की ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार है।
- अदृश्य श्रमिक: बिहार से जाने वाले अधिकांश श्रमिक ‘ब्लू कॉलर’ श्रेणियों (मजदूरी, निर्माण कार्य) में होते हैं। डेटा न होने के कारण उनकी मृत्यु अक्सर केवल एक ‘संख्या’ बनकर रह जाती है।
- पारदर्शिता: यदि सरकार के पास राज्यवार आंकड़े होंगे, तो यह पता चल सकेगा कि किस जिले (जैसे भागलपुर, खगड़िया या बांका) से पलायन अधिक हो रहा है और वहां किन सुरक्षात्मक उपायों की आवश्यकता है।
- राज्यों का सहयोग: बिहार सरकार को भी केंद्र के साथ मिलकर एक ऐसा मैकेनिज्म बनाना चाहिए जिससे प्रवासियों का पंजीकरण अनिवार्य हो सके।
सात समंदर पार भी सुरक्षित हो बिहार का लाल
अजय कुमार मंडल का यह संसदीय प्रश्न एक नई शुरुआत है। विदेशों में हो रही हजारों मौतें केवल एक सांख्यिकीय त्रासदी नहीं, बल्कि हजारों परिवारों का भविष्य उजड़ने की कहानी है। ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ (VOB) इस मुद्दे पर केंद्र सरकार की अगली कार्रवाई, विदेश मंत्रालय द्वारा डेटा संग्रह के लिए उठाए गए नए कदमों और भागलपुर के प्रवासी परिवारों को मिलने वाली हर सहायता की ताज़ा अपडेट आप तक सबसे पहले पहुँचाता रहेगा।


