
उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जिले से सामने आया ‘करोड़पति चपरासी’ घोटाला इन दिनों पूरे राज्य में चर्चा का विषय बना हुआ है। एक साधारण सरकारी कर्मचारी के पद पर तैनात व्यक्ति द्वारा करोड़ों रुपये के गबन ने न सिर्फ प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि यह भी दिखाया है कि किस तरह सुनियोजित तरीके से सरकारी धन की हेराफेरी की गई।
इस पूरे मामले में पुलिस ने बड़ी कार्रवाई करते हुए मुख्य आरोपी की तीनों पत्नियों, सास, साली और अन्य रिश्तेदारों समेत कुल सात महिलाओं को गिरफ्तार किया है। यह घोटाला करीब 5.50 करोड़ रुपये का बताया जा रहा है, जिसे आरोपी ने फर्जीवाड़े के जरिए सरकारी खजाने से निकालकर अपने नेटवर्क के माध्यम से अलग-अलग खातों में ट्रांसफर किया।
मामले का मुख्य आरोपी इल्हाम उर रहमान शम्सी पीलीभीत के जिला विद्यालय निरीक्षक (DIOS) कार्यालय से संबद्ध था। वह मूल रूप से जनता टेक्निकल इंटर कॉलेज, बीसलपुर में चपरासी के पद पर कार्यरत था, लेकिन DIOS कार्यालय में अटैच होने के कारण उसे वेतन बिल तैयार करने और टोकन जनरेशन जैसे संवेदनशील कार्यों की जिम्मेदारी मिली हुई थी।
यही जिम्मेदारी उसके लिए ‘कमाई का जरिया’ बन गई। जांच में सामने आया कि आरोपी ने वर्ष 2024 से फरवरी 2026 के बीच फर्जी लाभार्थी आईडी तैयार कर सरकारी भुगतान प्रणाली में हेराफेरी की। उसने 98 से अधिक संदिग्ध ट्रांजेक्शन के माध्यम से सरकारी धन को अपने और अपने रिश्तेदारों के खातों में ट्रांसफर किया। शुरुआत में यह रकम करीब एक करोड़ रुपये आंकी गई थी, लेकिन जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी, यह आंकड़ा बढ़कर 5.50 करोड़ रुपये तक पहुंच गया।
इस मामले की सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि आरोपी ने अपने परिवार और रिश्तेदारों को ही इस घोटाले का हिस्सा बना लिया। पुलिस जांच के अनुसार, रकम को अलग-अलग खातों में इस तरह बांटा गया ताकि किसी एक खाते पर ज्यादा ध्यान न जाए। दूसरी पत्नी लुबना के खाते में 2.37 करोड़ रुपये, तीसरी पत्नी आजरा खान के खाते में 2.12 करोड़ रुपये, साली फातिमा के खाते में 1.03 करोड़ रुपये, आफिया के खाते में 80 लाख से अधिक, सास नाहिद के खाते में 95 लाख रुपये, परवीन खातून के खाते में 48 लाख रुपये और आशकारा परवीन के खाते में 38 लाख रुपये ट्रांसफर किए गए।
जांच एजेंसियों ने यह भी पाया कि घोटाले की रकम सिर्फ बैंक खातों तक सीमित नहीं थी। आरोपी ने इस पैसे का बड़ा हिस्सा रियल एस्टेट में निवेश किया। कई जमीनों और संपत्तियों की खरीदारी की गई, जिससे यह साफ होता है कि आरोपी लंबे समय से इस फर्जीवाड़े को अंजाम दे रहा था और भविष्य के लिए संपत्ति खड़ी कर रहा था। पुलिस ने अब तक 53 संदिग्ध बैंक खातों को फ्रीज कर दिया है, जिनमें कुल 5.50 करोड़ रुपये की रकम चिन्हित की गई है।
शुक्रवार शाम पुलिस ने इस मामले में बड़ी कार्रवाई करते हुए आरोपी की तीनों पत्नियों सहित कुल सात महिलाओं को गिरफ्तार किया। पुलिस के अनुसार, इन सभी की भूमिका पैसे के लेन-देन और उसे छिपाने में अहम रही है।
इस घोटाले ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या यह सब कुछ एक चपरासी अकेले कर सकता था। विशेषज्ञों का मानना है कि बिना अंदरूनी मिलीभगत के इतनी बड़ी रकम का ट्रांसफर संभव नहीं है। DIOS कार्यालय, वित्त विभाग और कोषागार के कुछ अधिकारियों की भूमिका भी संदेह के घेरे में है। हालांकि अब तक किसी बड़े अधिकारी पर कार्रवाई नहीं हुई है, लेकिन जांच एजेंसियां इस एंगल पर भी काम कर रही हैं।
इस घटना ने सरकारी सिस्टम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इतनी बड़ी रकम कैसे ट्रांसफर होती रही, ऑडिट सिस्टम क्यों फेल हुआ और फर्जी लाभार्थी आईडी कैसे बनीं—ये सभी सवाल प्रशासनिक लापरवाही की ओर इशारा करते हैं।
पुलिस और जांच एजेंसियां अब पूरे नेटवर्क की तह तक जाने की कोशिश कर रही हैं। अन्य संभावित आरोपियों की पहचान की जा रही है, संपत्तियों की जांच और जब्ती की प्रक्रिया जारी है और वित्तीय लेन-देन की गहराई से जांच हो रही है। अधिकारियों का कहना है कि इस मामले में शामिल किसी भी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा।
पीलीभीत का यह ‘करोड़पति चपरासी’ घोटाला सिर्फ एक व्यक्ति की लालच की कहानी नहीं है, बल्कि यह पूरे सिस्टम की कमजोरियों को उजागर करता है। एक छोटे कर्मचारी द्वारा करोड़ों का घोटाला करना यह साबित करता है कि यदि निगरानी तंत्र मजबूत न हो, तो सरकारी धन की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। यह मामला प्रशासन के लिए एक चेतावनी है कि पारदर्शिता, जवाबदेही और सख्त निगरानी के बिना ऐसे घोटाले भविष्य में भी दोहराए जा सकते हैं।


