पीलीभीत के ‘करोड़पति चपरासी’ पर नया खुलासा: तीनों पत्नियों से छुपा रखा था राज, फर्जी टीचर बनाकर ट्रांसफर किए 8.15 करोड़ रुपये

उत्तर प्रदेश के पीलीभीत में सामने आया ‘करोड़पति चपरासी’ घोटाला हर दिन नए-नए खुलासों के साथ और भी चौंकाने वाला होता जा रहा है। पहले जहां यह मामला 5.50 करोड़ रुपये के गबन तक सीमित बताया जा रहा था, वहीं अब जांच में सामने आया है कि आरोपी ने पिछले कई वर्षों में करीब 8.15 करोड़ रुपये की हेराफेरी की है।

इस घोटाले का मास्टरमाइंड जिला विद्यालय निरीक्षक (DIOS) कार्यालय में तैनात चपरासी इल्हाम-उर-रहमान शम्सी है, जिसने न केवल सरकारी खजाने को चूना लगाया, बल्कि अपने निजी जीवन को भी रहस्यों से ढका रखा। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि उसकी तीनों पत्नियों को एक-दूसरे के बारे में कोई जानकारी ही नहीं थी।

जांच में यह सामने आया कि इल्हाम ने बेहद शातिर तरीके से सरकारी सिस्टम की कमजोरियों का फायदा उठाया। उसने वेतन बिल और टोकन जनरेशन जैसे महत्वपूर्ण काम अपने नियंत्रण में ले लिए और उसी के जरिए फर्जीवाड़ा शुरू किया। आरोपी ने कागजों पर अपनी पत्नियों, सास, साली और अन्य रिश्तेदारों को ‘टीचर’ और ‘कर्मचारी’ दिखाकर उनके नाम से फर्जी भुगतान निकलवाए।

पिछले करीब आठ वर्षों में उसने दर्जनों फर्जी आईडी बनाईं और सरकारी भुगतान प्रणाली के जरिए पैसा ट्रांसफर करता रहा। इस दौरान किसी को भनक तक नहीं लगी कि सरकारी खजाने से इतनी बड़ी रकम लगातार निकाली जा रही है।

सबसे दिलचस्प और चौंकाने वाला पहलू यह रहा कि आरोपी ने अपनी तीनों पत्नियों को अलग-अलग शहरों में रखा था। हर पत्नी को यही लगता था कि वह ही उसकी एकमात्र जीवनसाथी है। आरोपी उन्हें लग्जरी जीवन देता था, जिससे किसी को उस पर शक भी नहीं हुआ।

पुलिस पूछताछ में दूसरी पत्नी अजारा खान ने बताया कि उसे यह तक नहीं पता था कि उसके पति की पहले से शादी हो चुकी है। इसी तरह अन्य पत्नियां भी इस सच्चाई से पूरी तरह अनजान थीं। यह खुलासा इस मामले को सिर्फ आर्थिक घोटाले से आगे बढ़ाकर एक सामाजिक और पारिवारिक धोखे की कहानी भी बना देता है।

इस पूरे मामले का खुलासा फरवरी 2026 में तब हुआ जब बैंक ऑफ बड़ौदा के एक मैनेजर ने संदिग्ध ट्रांजेक्शन को लेकर जिला प्रशासन को जानकारी दी। बैंक को शक हुआ जब ट्रेजरी से एक निजी खाते में करीब 1.15 करोड़ रुपये ट्रांसफर किए गए। इसके बाद शुरू हुई जांच में धीरे-धीरे पूरे घोटाले की परतें खुलती चली गईं।

जांच एजेंसियों ने अब तक 53 संदिग्ध बैंक खातों की पहचान की है और करीब 5.50 करोड़ रुपये फ्रीज कर दिए हैं। हालांकि जांच में यह भी सामने आया है कि कुल लेन-देन इससे कहीं अधिक यानी 8.15 करोड़ रुपये तक का है।

पुलिस ने इस मामले में बड़ी कार्रवाई करते हुए आरोपी की तीनों पत्नियों, साली, सास और अन्य महिलाओं सहित कुल सात लोगों को गिरफ्तार किया है। इनमें से एक पत्नी अर्शी खातून को पहले ही जेल भेजा जा चुका है।

जांच के दौरान यह भी सामने आया कि घोटाले की रकम का बड़ा हिस्सा रियल एस्टेट में लगाया गया था। आरोपी ने जमीन और संपत्ति खरीदकर अवैध कमाई को सुरक्षित करने की कोशिश की थी। अब पुलिस इन संपत्तियों की भी जांच कर रही है और जरूरत पड़ने पर उन्हें जब्त किया जा सकता है।

इस पूरे मामले ने सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक चपरासी स्तर का कर्मचारी कैसे करोड़ों रुपये का घोटाला कर सकता है, यह प्रशासनिक निगरानी और पारदर्शिता पर बड़ा प्रश्नचिह्न है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी बड़ी हेराफेरी बिना अंदरूनी मिलीभगत के संभव नहीं है। DIOS कार्यालय, वित्त विभाग और कोषागार के कुछ अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में आ सकती है। हालांकि अब तक किसी बड़े अधिकारी पर कार्रवाई नहीं हुई है, लेकिन जांच एजेंसियां इस दिशा में भी काम कर रही हैं।

यह मामला सिर्फ आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि एक संगठित धोखाधड़ी का उदाहरण बन चुका है, जिसमें रिश्तों का इस्तेमाल भी एक ‘कवच’ की तरह किया गया। आरोपी ने अपने ही परिवार को ढाल बनाकर सिस्टम को चकमा दिया और सालों तक सरकारी धन की लूट करता रहा।

फिलहाल पुलिस और आर्थिक अपराध शाखा इस पूरे नेटवर्क की गहराई से जांच कर रही है। आने वाले दिनों में इस मामले में और भी बड़े खुलासे हो सकते हैं।

पीलीभीत का यह ‘करोड़पति चपरासी’ कांड एक चेतावनी है कि यदि सरकारी तंत्र में निगरानी और जवाबदेही मजबूत नहीं होगी, तो ऐसे घोटाले भविष्य में भी सामने आते रहेंगे।

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