विश्व तंबाकू निषेध दिवस पर भागलपुर व्यवहार न्यायालय की अनूठी पहल

न्यायिक पदाधिकारियों, अधिवक्ताओं और कर्मियों ने ली नशा से दूर रहने की शपथ

भागलपुर | 31 मई 2025: विश्व तंबाकू निषेध दिवस के अवसर पर भागलपुर व्यवहार न्यायालय परिसर में एक संकल्प सभा का आयोजन किया गया, जिसमें न्यायिक पदाधिकारी, अधिवक्ता, न्यायालय कर्मी और पारा विधिक स्वयंसेवकों ने भाग लेकर समाज को नशामुक्त बनाने का संदेश दिया।

कार्यक्रम की शुरुआत जिला एवं सत्र न्यायाधीश के प्रकोष्ठ के समीप सभी प्रतिभागियों द्वारा “तंबाकू एवं नशे से दूर रहने” की सामूहिक शपथ लेकर की गई। यह आयोजन सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं था, बल्कि सामाजिक सुधार की दिशा में एक गंभीर और सकारात्मक पहल था।

सामाजिक परिवर्तन में न्यायपालिका की भागीदारी

इस अवसर पर वक्ताओं ने ज़ोर देकर कहा कि न्यायिक संस्थाएं केवल कानून का पालन ही नहीं करातीं, बल्कि वे समाज में सकारात्मक सोच और चेतना फैलाने में भी अग्रणी भूमिका निभा रही हैं। तंबाकू निषेध दिवस पर इस तरह की पहल न्यायपालिका की संवेदनशीलता और सामाजिक जिम्मेदारी को रेखांकित करती है।

पारा विधिक स्वयंसेवकों की प्रेरक भागीदारी

इस आयोजन में पारा विधिक स्वयंसेवकों की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। उन्होंने नशामुक्ति को लेकर जागरूकता संदेश, प्रेरक वक्तव्य और स्वास्थ्य संबंधित जानकारियाँ साझा कीं। स्वयंसेवकों ने बताया कि तंबाकू और नशा केवल व्यक्ति के शरीर को ही नहीं, उसके परिवार और सामाजिक परिवेश को भी नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है।

स्वास्थ्य पर प्रभाव: चेतावनी और समाधान

कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने कैंसर, हृदय रोग, फेफड़ों की बीमारी जैसी घातक समस्याओं की चर्चा की, जो तंबाकू सेवन से जुड़ी हैं। विशेषज्ञों ने बताया कि भारत में हर वर्ष लाखों लोग तंबाकू जनित बीमारियों से असमय मृत्यु का शिकार हो रहे हैं।

दीर्घकालिक उद्देश्य, एक दिन की पहल नहीं

भागलपुर व्यवहार न्यायालय की यह पहल न केवल एक दिन की गतिविधि है, बल्कि यह दीर्घकालिक सामाजिक सुधार के उद्देश्य की ओर उठाया गया एक ठोस और प्रेरणात्मक कदम है। अधिवक्ताओं और न्यायिक अधिकारियों ने इस प्रयास को नियमित रूप से दोहराने का सुझाव भी दिया, ताकि समाज में यह चेतना स्थायी रूप से बनी रहे।

भागलपुर न्यायालय की यह पहल एक मॉडल के रूप में देखी जा सकती है, जिसे देशभर के अन्य न्यायालयों, कार्यालयों और संस्थानों को अपनाना चाहिए। जब समाज के कानूनी संरक्षक स्वयं समाज सुधारक बनें, तब असली न्याय सुनिश्चित होता है।

 

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