लखीसराय में पर्यटन संगोष्ठी और विरासत विहार का भव्य शुभारंभ

बज्रयान बौद्ध धरोहर को वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में ऐतिहासिक पहल

लखीसराय, 3 मई 2025:लखीसराय ज़िला प्रशासन, पर्यटन विभाग एवं बिहार फ़ाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में तीन दिवसीय पर्यटन संगोष्ठी एवं विरासत विहार का भव्य शुभारंभ शुक्रवार को संगम होटल के सेमिनार हॉल में हुआ।
पहले दिन देश-विदेश से आए बुद्ध भिक्षुओं, शोधकर्ताओं एवं विद्यार्थियों की उपस्थिति ने आयोजन को अंतरराष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया।


उद्घाटन सत्र: सांस्कृतिक जागरूकता की ओर पहला कदम

कार्यक्रम का शुभारंभ ज़िलाधिकारी मिथिलेश मिश्र द्वारा दीप प्रज्वलन एवं प्रार्थना के साथ हुआ। उन्होंने कहा:

“लखीसराय की ऐतिहासिक और धार्मिक विरासत को वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में यह संगोष्ठी मील का पत्थर साबित होगी। आने वाले समय में यह क्षेत्र सांस्कृतिक पर्यटन के मानचित्र पर उभरता हुआ दिखेगा।”


अंतरराष्ट्रीय सहभागिता ने बढ़ाई गरिमा

संगोष्ठी में सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, भूटान, तिब्बत और बोधगया से आए बौद्ध भिक्षुओं तथा नालंदा नवविहार विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों ने भाग लिया। उनकी सहभागिता ने आयोजन को अंतरराष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया।


बज्रयान बुद्धिज्म और लखीसराय का संबंध

इतिहासविद् अशोक कुमार सिंह ने बज्रयान बौद्ध परंपरा के दृष्टिकोण से लखीसराय के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि:

  • उरेन, धनौरी, लाली पहाड़ी और सहमालपुर जैसे गांवों में बुद्ध धर्म से जुड़ी बज्रयान शाखा की धार्मिक धरोहरों के प्रमाण मिले हैं।
  • यह क्षेत्र कभी बौद्ध शिक्षा, साधना और संस्कृति का प्रमुख केंद्र था।

प्रशासनिक सहयोग और विकास की योजना

ज़िलाधिकारी ने घोषणा की कि पर्यटकों की सुविधा हेतु भौतिक संरचना और आधारभूत सुविधाओं का विकास किया जाएगा, जिससे लखीसराय को एक पर्यटन केंद्र के रूप में स्थापित किया जा सके।


उपस्थित अधिकारीगण एवं आयोजक टीम

इस अवसर पर उप विकास आयुक्त सुमित कुमार, जिला पर्यटन प्रभारी शशि कुमार, जनसंपर्क अधिकारी विनोद प्रसाद, डीआरडीए निदेशक नीरज कुमार, तथा कला-संस्कृति पदाधिकारी मृणाल रंजन सहित कई अन्य अधिकारी मौजूद रहे। कार्यक्रम का सफल संयोजन रविराज पटेल, अभिनव कुमार, कुमार अभिषेक और उत्कर्ष ने किया।


संगोष्ठी का उद्देश्य और आगामी गतिविधियाँ

इस तीन दिवसीय आयोजन का उद्देश्य लखीसराय की ऐतिहासिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण और प्रचार करना है।
आगामी सत्रों में:

  • पुरातात्विक स्थलों का भ्रमण
  • शोधपरक प्रस्तुतियाँ
  • स्थानीय सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाएंगे।

 

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