
स्वास्थ्य विभाग ने डॉ. नरेंद्र प्रताप सिंह द्वारा हाल ही में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में लगाए गए आरोपों पर विस्तृत तथ्यात्मक प्रतिवेदन जारी करते हुए अपना पक्ष स्पष्ट किया है। विभाग ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कही गई कई बातों को भ्रामक बताते हुए दावा किया है कि उपलब्ध रिकॉर्ड और प्रारंभिक जांच में कई ऐसे तथ्य सामने आए हैं जो डॉ. सिंह के दावों से मेल नहीं खाते। साथ ही विभाग ने मामले की निष्पक्ष जांच के लिए उच्चस्तरीय कमिटी गठित करने का भी निर्णय लिया है।
यह मामला तब चर्चा में आया जब डॉ. नरेंद्र प्रताप सिंह, जो पहले में प्राचार्य पद का अतिरिक्त प्रभार संभाल रहे थे, ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अपने स्थानांतरण और प्रशासनिक कार्रवाई पर सवाल उठाए। प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद स्वास्थ्य विभाग ने आधिकारिक रूप से घटनाक्रम की क्रमवार जानकारी साझा की।
स्वास्थ्य विभाग के अनुसार डॉ. सिंह ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि 23 जून 2026 को माननीय स्वास्थ्य मंत्री के दौरे की कोई पूर्व सूचना उन्हें नहीं दी गई थी। हालांकि विभाग ने इस दावे को असत्य बताया है। विभागीय रिपोर्ट के मुताबिक अस्पताल अधीक्षक ने 22 जून की शाम लगभग 7 बजे मोबाइल फोन पर बातचीत के दौरान डॉ. सिंह को कार्यक्रम की पूरी जानकारी दे दी थी।
रिपोर्ट में कहा गया है कि बातचीत के दौरान कार्यक्रम की रूपरेखा भी स्पष्ट कर दी गई थी। अधीक्षक ने बताया था कि कार्यक्रम में स्वास्थ्य मंत्री का स्वागत अधीक्षक द्वारा किया जाएगा जबकि समापन पर धन्यवाद ज्ञापन प्राचार्य द्वारा दिया जाएगा। विभाग के अनुसार इस व्यवस्था पर डॉ. सिंह की सहमति भी प्राप्त हुई थी। ऐसे में विभाग का कहना है कि कार्यक्रम की सूचना नहीं मिलने का दावा तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है।
छुट्टी से जुड़े मुद्दे पर भी विभाग ने गंभीर सवाल उठाए हैं। डॉ. सिंह की ओर से यह कहा गया था कि उनके पुत्र ने विभागीय सचिव, अधीक्षक और अन्य अधिकारियों को व्हाट्सऐप के माध्यम से उनके घायल होने और अवकाश की सूचना भेजी थी। लेकिन स्वास्थ्य विभाग के अनुसार यह सूचना कार्यक्रम समाप्त होने के कई घंटे बाद साझा की गई।
विभाग का दावा है कि समयक्रम से यह स्पष्ट होता है कि मीडिया में मामला सामने आने के बाद बचाव की स्थिति में यह संदेश भेजा गया। रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि वास्तव में डॉ. सिंह गंभीर रूप से घायल थे, तो निर्धारित कार्यक्रम से पहले या कम से कम कार्यक्रम के समय संबंधित अधिकारियों को सूचित किया जाना अपेक्षित था।
मामले का सबसे संवेदनशील पहलू डॉ. सिंह की अनुपस्थिति और उनके निजी क्लिनिक से जुड़ा है। स्वास्थ्य विभाग ने दावा किया है कि जब डॉ. सिंह कार्यक्रम में उपस्थित नहीं हुए, तब उनकी लोकेशन की पुष्टि के लिए प्रारंभिक स्तर पर जांच कराई गई। विभागीय अधिकारियों और जिला प्रशासन की सहायता से इस संबंध में तथ्य जुटाए गए।
रिपोर्ट के अनुसार सबसे पहले एक छद्म मरीज भेजकर यह जांच की गई कि डॉ. सिंह अपने निजी क्लिनिक में मौजूद हैं या नहीं। जांच में यह संकेत मिला कि वे क्लिनिक में उपलब्ध थे। इसके बाद विस्तृत सत्यापन कराया गया।
जांच के दौरान यह भी पाया गया कि के प्राचार्य के लिए उपलब्ध सरकारी वाहन डॉ. सिंह के निजी क्लिनिक के बाहर खड़ा था। इस तथ्य को विभाग ने सरकारी संसाधनों के संभावित दुरुपयोग से जोड़कर देखा है।
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि क्लिनिक से बाहर निकल रहे मरीजों ने बताया कि वे कुछ ही देर पहले डॉ. नरेंद्र प्रताप सिंह से परामर्श लेकर बाहर आए हैं। यह बयान विभाग के अनुसार महत्वपूर्ण है क्योंकि डॉ. सिंह ने दावा किया था कि वे जलने की घटना के कारण बातचीत करने और सामान्य गतिविधियों में शामिल होने की स्थिति में नहीं थे।
जांच के दौरान क्लिनिक के अंदर मौजूद कंपाउंडर से भी पूछताछ की गई। कंपाउंडर ने बताया कि डॉ. सिंह मरीजों को देखने के लिए नियमित समय निर्धारित करते हैं। जानकारी के अनुसार सुबह 9 बजे से 10 बजे, दोपहर 2 बजे से 3 बजे और शाम 7 बजे से 9 बजे तक मरीजों को देखा जाता है।
विभाग ने इस तथ्य को भी गंभीर माना है। रिपोर्ट के अनुसार इससे प्रथम दृष्टया संकेत मिलता है कि डॉ. सिंह कार्यालय अवधि के दौरान भी निजी क्लिनिक में मरीज देख रहे थे। यदि यह आरोप जांच में प्रमाणित होता है तो इसे सेवा नियमों का गंभीर उल्लंघन माना जा सकता है।
इन सभी तथ्यों के आधार पर स्वास्थ्य विभाग ने प्रारंभिक स्तर पर डॉ. सिंह के खिलाफ लापरवाही, कर्तव्यहीनता, अनधिकृत अनुपस्थिति और सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग जैसी आशंकाएं दर्ज की हैं। इसी आधार पर उन्हें प्राचार्य पद के अतिरिक्त प्रभार से मुक्त कर दिया गया।
विभाग ने स्पष्ट किया है कि डॉ. सिंह का स्थानांतरण दंडात्मक कार्रवाई नहीं बल्कि प्रशासनिक निर्णय है। उन्हें अब के मनोरोग विभाग में प्राध्यापक के रूप में पदस्थापित किया गया है। विभाग का कहना है कि यह स्थानांतरण केवल प्रशासनिक दृष्टिकोण से किया गया है।
स्वास्थ्य विभाग ने डॉ. सिंह के प्रेस कॉन्फ्रेंस करने के तरीके पर भी आपत्ति जताई है। विभाग का कहना है कि यदि उन्हें स्थानांतरण या कार्रवाई पर आपत्ति थी, तो पहले विभाग के समक्ष औपचारिक अभ्यावेदन प्रस्तुत करना चाहिए था। सीधे प्रेस कॉन्फ्रेंस करना सेवा आचरण नियमों के अनुरूप नहीं माना जा रहा।
रिपोर्ट में कहा गया है कि बिहार सरकारी सेवक आचार नियमावली के तहत सरकारी सेवकों को विभागीय प्रक्रियाओं का पालन करना आवश्यक है। विभाग ने आरोप लगाया कि डॉ. सिंह का सार्वजनिक बयान इसी आचार संहिता की भावना के प्रतिकूल प्रतीत होता है।
अब पूरे मामले की निष्पक्ष जांच के लिए उच्चस्तरीय जांच कमिटी गठित की जा रही है। यह कमिटी डॉ. सिंह का पक्ष भी सुनेगी और उपलब्ध सभी साक्ष्यों का परीक्षण करेगी। जांच प्रक्रिया के दौरान निर्धारित नियमों और प्रक्रियाओं का पालन किया जाएगा।
स्वास्थ्य विभाग ने अपने बयान में स्पष्ट संदेश दिया है कि अनुशासनहीनता और कर्तव्यहीनता किसी भी स्तर पर स्वीकार नहीं की जाएगी। विभाग का कहना है कि यदि जांच में आरोप प्रमाणित होते हैं तो नियमों के तहत उचित कार्रवाई की जाएगी।
कुल मिलाकर यह मामला अब प्रशासनिक जांच के महत्वपूर्ण चरण में पहुंच चुका है। उच्चस्तरीय कमिटी की रिपोर्ट आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि आरोपों में कितनी सच्चाई है और आगे क्या कार्रवाई की जाएगी। फिलहाल स्वास्थ्य विभाग ने सख्त रुख अपनाते हुए संकेत दे दिया है कि सेवा अनुशासन और जवाबदेही पर कोई समझौता नहीं किया जाएगा।


