
झारखंड के हजारीबाग जिले से इंसानियत को झकझोर देने वाली एक भयावह घटना सामने आई है, जहां अंधविश्वास के चलते एक मां ने अपने ही कलेजे के टुकड़े को मौत के घाट उतरवा दिया। यह मामला न केवल समाज में फैले अंधविश्वास की गंभीरता को उजागर करता है, बल्कि पारिवारिक मूल्यों पर भी बड़ा सवाल खड़ा करता है।
क्या है पूरा मामला?
घटना हजारीबाग के कुसुमभा गांव की है। पुलिस जांच में सामने आया कि एक महिला अपने बेटे की बीमारी को लेकर बेहद परेशान थी। इसी बीच वह गांव की एक तथाकथित तांत्रिक महिला के संपर्क में आई, जिसने उसे यकीन दिलाया कि विशेष अनुष्ठान के जरिए उसके बेटे की बीमारी ठीक हो सकती है।
तांत्रिक के बहकावे में आकर महिला ने एक खौफनाक साजिश रच डाली। आरोप है कि उसने अपनी 13 वर्षीय बेटी को ही इस कथित अनुष्ठान का हिस्सा बना दिया, जिसके चलते बच्ची की जान चली गई।
घटना की रात क्या हुआ?
बताया जा रहा है कि यह वारदात नवरात्र के दौरान अष्टमी की रात को अंजाम दी गई, जब पूरा गांव धार्मिक आयोजन में व्यस्त था। इसी दौरान आरोपियों ने बच्ची को अपने कब्जे में लेकर इस जघन्य कृत्य को अंजाम दिया। बाद में साक्ष्य छिपाने के लिए शव को गांव के पास ही दफना दिया गया।
पुलिस जांच में खुलासा
घटना के बाद आरोपियों ने पुलिस को गुमराह करने की कोशिश की और इसे अपहरण या अन्य अपराध का रूप देने की कोशिश की। लेकिन पोस्टमार्टम और फोरेंसिक जांच में सच्चाई सामने आ गई। सख्ती से पूछताछ के बाद मां, तांत्रिक महिला और एक अन्य सहयोगी ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया।
पुलिस ने तीनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है और आगे की कानूनी कार्रवाई जारी है।
हाई कोर्ट ने लिया संज्ञान
इस घटना ने पूरे राज्य को हिला कर रख दिया है। मामले की गंभीरता को देखते हुए झारखंड हाई कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए राज्य प्रशासन से जवाब मांगा है। कोर्ट ने कानून-व्यवस्था और अंधविश्वास पर नियंत्रण को लेकर सख्त रुख दिखाया है।
समाज के लिए चेतावनी
यह घटना अंधविश्वास के खतरनाक परिणामों की एक बड़ी चेतावनी है। विशेषज्ञों का मानना है कि जागरूकता की कमी और अंधविश्वास में विश्वास ऐसी घटनाओं को जन्म देता है, जिन्हें रोकने के लिए समाज और प्रशासन दोनों को मिलकर काम करना होगा।
प्रशासन ने आश्वासन दिया है कि इस मामले में दोषियों को सख्त से सख्त सजा दिलाने के लिए हर संभव कदम उठाए जाएंगे।


