सत्ता के मद में चूर जनप्रतिनिधि की बर्बरता: पूर्णिया में कानून को ठेंगा दिखाकर सरेआम ‘भीड़तंत्र’ का खौफनाक मंचन

पूर्णिया। लोकतंत्र की सबसे छोटी और बुनियादी इकाई ‘वार्ड’ होती है, जहाँ से विकास और न्याय की किरण फूटने की उम्मीद की जाती है। लेकिन जब इसी इकाई का चुना हुआ प्रतिनिधि रक्षक की खाल ओढ़कर भक्षक बन जाए, तो न्याय की उम्मीद दम तोड़ने लगती है। पूर्णिया जिले के कस्बा थाना क्षेत्र अंतर्गत गुरही पंचायत में जो कुछ भी घटा, वह केवल एक हिंसक वारदात नहीं है, बल्कि यह हमारे संवैधानिक ढांचे के समानांतर खड़े उस ‘अघोषित क्रूर तंत्र’ की तस्दीक है, जो खाकी और कानून को अपनी जेब में रखने का गुमान पाले बैठा है। एक प्रेमी जोड़े की सरेराह बेरहमी से पिटाई और उस पर सैकड़ों लोगों की मौन सहमति ने यह साबित कर दिया है कि आधुनिकता के दावों के बावजूद, समाज के कुछ हिस्सों में आज भी पाशविक प्रवृत्तियां हावी हैं।

​लोकतंत्र के प्रहरी की निरंकुशता और मानवता का ह्रास

​गुरही पंचायत के वार्ड नंबर 9 की सड़कों पर जब लाठियां बरस रही थीं, तब वहां केवल दो शरीर नहीं टूट रहे थे, बल्कि कानून की वह किताब भी तार-तार हो रही थी जिसे हम संविधान कहते हैं। वीडियो में कैद तस्वीरें किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को विचलित करने के लिए पर्याप्त हैं। खुद को जनता का सेवक बताने वाला वार्ड सदस्य, सत्ता के नशे में इस कदर अंधा हो चुका है कि उसने खुद को जांचकर्ता, वकील और न्यायाधीश—तीनों भूमिकाओं में ढाल लिया।

​बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के, बिना पुलिस को सूचना दिए और बिना किसी मानवीय करुणा के, उस जनप्रतिनिधि ने सरेआम डंडे चटकाना शुरू कर दिया। चीखें गूँजती रहीं, रहम की भीख मांगी जाती रही, लेकिन उस तथाकथित ‘माननीय’ के हाथ नहीं कांपे। यह दृश्य यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हमने पंचायतों को इसलिए सशक्त बनाया था कि वहां के प्रतिनिधि अपनी लाठी के जोर पर निजी अदालतें लगाएं?

​रूह कंपा देने वाली हकीकत: गर्भवती महिला पर प्रहार

​इस पूरी घटना का सबसे काला और वीभत्स पहलू तब सामने आया जब पीड़ित परिवार की आपबीती सुनी गई। मामला केवल प्रेम प्रसंग का नहीं है, बल्कि यह एक असहाय जीवन की सुरक्षा से जुड़ा है। पीड़ित महिला न केवल विवाहित है, बल्कि वह दो महीने की गर्भवती भी है। चिकित्सा विज्ञान और मानवता, दोनों ही स्थितियों में एक गर्भवती महिला को विशेष संरक्षण और देखभाल की आवश्यकता होती है। लेकिन यहाँ स्थिति इसके ठीक उलट थी।

​वार्ड सदस्य को महिला की शारीरिक स्थिति और उसके गर्भ में पल रहे मासूम की जरा भी परवाह नहीं थी। दो महीने की गर्भवती महिला को बांधकर पीटना किसी भी सभ्य समाज में अक्षम्य अपराध की श्रेणी में आता है। यह कृत्य उस बर्बरता का चरम है, जहाँ नैतिकता की बलि केवल इसलिए चढ़ा दी जाती है क्योंकि अपराधी को लगता है कि उसे रोकने वाला कोई नहीं है। महिला के साथ हुई इस हिंसा ने नारी शक्ति और सुरक्षा के तमाम सरकारी विज्ञापनों को धरातल पर चुनौती दे दी है।

​भीड़ की चुप्पी: एक मरते हुए विवेक का परिचायक

​गुरही पंचायत की इस घटना ने केवल वार्ड सदस्य की क्रूरता को ही उजागर नहीं किया, बल्कि वहां मौजूद भीड़ के चरित्र पर भी कालिख पोत दी है। सैकड़ों की तादाद में खड़े लोग, जिनमें युवा और बुजुर्ग दोनों शामिल थे, मूकदर्शक बनकर इस हिंसा का आनंद ले रहे थे। कुछ लोग मोबाइल से वीडियो बनाने में व्यस्त थे, जैसे वहां कोई उत्सव चल रहा हो।

​यह भीड़ की वह ‘मौन स्वीकृति’ है जो अपराधियों के हौसले बुलंद करती है। जब समाज अपराध को घटते हुए देखता है और उसे रोकने के बजाय उसका ‘डिजिटल कंजम्पशन’ (वीडियो बनाना) करता है, तो वह समाज मानसिक रूप से बीमार माना जाना चाहिए। किसी एक व्यक्ति ने भी आगे बढ़कर उस लाठी को पकड़ने की जुर्रत नहीं की, किसी ने यह नहीं कहा कि “यह कानून का काम है, तुम्हारा नहीं।” यह सामाजिक उदासीनता ही भविष्य में और भी बड़ी हिंसा का मार्ग प्रशस्त करती है।

​कस्बा पुलिस की शिथिलता: वायरल वीडियो और कागजी न्याय

​इस पूरी घटनाक्रम में प्रशासन की भूमिका सबसे ज्यादा संदेहास्पद और निराशाजनक रही है। घटना का वीडियो आग की तरह फैल गया, हर तरफ शोर मचा, लेकिन कस्बा थाना की पुलिस जैसे किसी ‘मुहूर्त’ का इंतजार कर रही थी। तकनीक के इस युग में जहाँ एक ट्वीट पर सरकारें हरकत में आ जाती हैं, वहां एक जघन्य हिंसा का वीडियो सामने होने के बावजूद त्वरित कार्रवाई न होना प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।

​क्या पुलिस को अब भी लिखित शिकायत का इंतजार है? क्या सरेआम कानून को ठेंगा दिखाने वाले उस वार्ड सदस्य की गिरफ्तारी के लिए किसी विशेष आदेश की जरूरत है? पुलिस की यह शिथिलता ही जनता के मन में यह धारणा पुख्ता करती है कि स्थानीय रसूखदारों और थाने के बीच कोई ‘अलिखित समझौता’ काम कर रहा है। यदि वक्त रहते आरोपी को सलाखों के पीछे नहीं भेजा गया, तो जनता का कानून-व्यवस्था से भरोसा पूरी तरह उठ जाएगा।

​जनप्रतिनिधि या स्वघोषित तानाशाह?

​वार्ड सदस्य का पद सेवा के लिए होता है, दमन के लिए नहीं। गुरही पंचायत के इस प्रतिनिधि ने जिस तरह से लाठी चलाई, वह किसी गुंडे या मवाली की कार्यशैली से कम नहीं थी। सत्ता का यह ‘छोटा नशा’ सबसे ज्यादा खतरनाक होता है क्योंकि यह सीधे तौर पर ग्रामीण जनता के जीवन को प्रभावित करता है।

​इस घटना ने यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि क्या हम अपने प्रतिनिधियों के आचरण की जांच के लिए कोई तंत्र विकसित कर पाए हैं? क्या चुनाव जीत लेने मात्र से किसी को यह लाइसेंस मिल जाता है कि वह किसी के निजी जीवन में हस्तक्षेप करे और उसे शारीरिक रूप से प्रताड़ित करे? वार्ड सदस्य की यह निरंकुशता पूरे पंचायत राज सिस्टम के लिए एक चेतावनी है।

​पाशविक न्याय बनाम संवैधानिक व्यवस्था

​सभ्य समाज और अराजक समाज के बीच केवल ‘कानून के शासन’ का अंतर होता है। प्रेम, विवाह या अवैध संबंधों के मामलों को सुलझाने के लिए हमारे देश में आईपीसी और अब बीएनएस (भारतीय न्याय संहिता) की सुसंगत धाराएं मौजूद हैं। यदि किसी को किसी के आचरण पर आपत्ति थी, तो उसे कानून का दरवाजा खटखटाना चाहिए था।

​सड़क पर इंसाफ करना उस पाशविक न्याय की श्रेणी में आता है जहाँ शारीरिक शक्ति को ही अंतिम सत्य मान लिया जाता है। यदि आज हम एक वार्ड सदस्य को प्रेमी जोड़े को पीटने की इजाजत देते हैं, तो कल कोई और किसी भी बहाने से किसी की जान लेने को अपना अधिकार समझने लगेगा। यह प्रवृत्ति बिहार के सुशासन के दावों के लिए एक बड़ा खतरा है।

​न्याय की कसौटी पर प्रशासन

​पूर्णिया की यह घटना मानवता और कानून, दोनों के लिए एक परीक्षा की घड़ी है। एक गर्भवती महिला की पिटाई और उसे सरेआम अपमानित करना वह घाव है जो केवल अपराधी की गिरफ्तारी से नहीं भरेगा। इसके लिए प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि आरोपी को इतनी कड़ी सजा मिले कि भविष्य में कोई भी जनप्रतिनिधि ‘कानून का पहरेदार’ बनने के बजाय ‘कानून का भक्षक’ बनने की हिम्मत न कर सके।

​कस्बा पुलिस और पूर्णिया के वरीय अधिकारियों को यह समझना होगा कि उनकी चुप्पी को कमजोरी माना जाएगा। मानवता यह पुकार कर रही है कि गुरही पंचायत के उन पीड़ितों को न्याय मिले और उस वार्ड सदस्य को यह अहसास कराया जाए कि लाठी की शक्ति संविधान की कलम से बड़ी नहीं होती। क्या प्रशासन अपनी कुंभकर्णी नींद से जागेगा या फिर एक और ‘वीरानी’ का इंतजार किया जाएगा? सवाल कड़वा है, लेकिन जवाब पूर्णिया की जनता और वहां की पुलिस को ही देना है।

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