लखीसराय में प्रशासनिक हलचल: पूर्व जिलाधिकारी के कार्यकाल की परतों को उधेड़ रही ईओयू की टीम

लखीसराय। बिहार के प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों लखीसराय जिला चर्चा का केंद्र बना हुआ है। भ्रष्टाचार के विरुद्ध सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति के तहत आर्थिक अपराध इकाई (EOU) ने अपनी सक्रियता बढ़ा दी है। जिले के पूर्व जिलाधिकारी मिथिलेश मिश्र के लगभग डेढ़ साल के कार्यकाल के दौरान हुए प्रशासनिक निर्णयों और वित्तीय खर्चों की गहन जांच के लिए पटना से आई पांच सदस्यीय टीम ने लगातार दूसरे दिन भी कलेक्ट्रेट की फाइलों को खंगाला। गुरुवार को हुई इस कार्रवाई ने न केवल स्थानीय प्रशासन में हड़कंप मचा दिया है, बल्कि सरकारी तंत्र के भीतर जवाबदेही और पारदर्शिता को लेकर एक बड़ा विमर्श भी छेड़ दिया है।

​जांच का दूसरा दिन: कलेक्ट्रेट की दहलीज पर कड़ा पहरा

​गुरुवार की सुबह जब कलेक्ट्रेट के कर्मचारी अपने कार्यालय पहुंचे, तो वहां का माहौल सामान्य दिनों से काफी अलग था। पटना से आई आर्थिक अपराध इकाई की टीम दो वाहनों में सवार होकर स्थानीय अतिथि गृह से सीधे जिलाधिकारी कार्यालय पहुंची। जांच टीम की कमान संभाल रहे अधिकारियों ने सबसे पहले प्रभारी जिलाधिकारी नीरज कुमार के चेंबर में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। यहाँ लंबी बातचीत के दौरान उन प्रशासनिक फाइलों की सूची तैयार की गई, जो पूर्व जिलाधिकारी के कार्यकाल में लिए गए नीतिगत निर्णयों से संबंधित थीं।

​टीम का रुख इसके बाद एसडीसी प्राची के कार्यालय की ओर हुआ। यहाँ अभिलेखों के अवलोकन का सिलसिला घंटों चला। सूत्रों की मानें तो टीम का मुख्य ध्यान उन फाइलों पर था, जिनमें वित्तीय लेन-देन के स्पष्ट प्रमाण छिपे हो सकते हैं। महत्वपूर्ण दस्तावेजों की बारीकी से जांच करने के बाद टीम ने दर्जनों फाइलों की प्रतिलिपियां (फोटोकॉपी) तैयार करवाईं और उन्हें अपने साथ पटना ले जाने के लिए सीलबंद किया।

​जांच की रडार पर धान खरीद और शस्त्र लाइसेंस

​इस पूरी जांच प्रक्रिया में जो दो सबसे बड़े मुद्दे उभरकर सामने आए हैं, वे हैं—धान खरीद में अनियमितता और शस्त्र लाइसेंसों का वितरण। बिहार जैसे कृषि प्रधान राज्य में धान खरीद एक बेहद संवेदनशील मामला है, जहाँ सीधे तौर पर किसानों का हित जुड़ा होता है। आरोप है कि पूर्व जिलाधिकारी के कार्यकाल के दौरान धान की अधिप्राप्ति में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी की गई। पैक्सों (PACS) के माध्यम से होने वाली खरीद और मिलरों के साथ समन्वय में भारी वित्तीय हेरफेर की आशंका जताई गई है। बताया जा रहा है कि इस मामले में पूर्व डीएम के खिलाफ पहले ही आरोप पत्र गठित किया जा चुका है, जो उनके अचानक हुए तबादले की एक बड़ी वजह माना जा रहा है।

​वहीं, शस्त्र लाइसेंसों का वितरण भी जांच के घेरे में है। जिलाधिकारी के पास शस्त्र लाइसेंस जारी करने का विशेषाधिकार होता है, लेकिन इसके लिए तय मानकों और पुलिस रिपोर्ट की अनदेखी किए जाने की शिकायतें ईओयू तक पहुंची थीं। टीम यह जांच रही है कि क्या लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया में किसी प्रकार के ‘दबाव’ या ‘प्रलोभन’ का खेल तो नहीं खेला गया।

​ओपन जिम और महोत्सवों के नाम पर खर्च का लेखा-जोखा

​जांच का दायरा केवल फाइलों तक सीमित नहीं है, बल्कि जमीन पर उतारी गई योजनाओं की गुणवत्ता और उन पर हुए व्यय की भी पड़ताल की जा रही है। ईओयू की टीम ने विशेष रूप से ‘ओपन जिम’ परियोजना से जुड़े दस्तावेजों को खंगाला है। जिले के विभिन्न पार्कों और सार्वजनिक स्थानों पर लगाए गए इन जिमों की खरीद प्रक्रिया, वेंडर का चयन और भुगतान की शर्तों में अनियमितता की बू आ रही है।

​इसके अलावा, जिले में आयोजित हुए करीब 15 सरकारी महोत्सवों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों पर भी टीम की टेढ़ी नजर है। कला एवं संस्कृति विभाग से प्राप्त फंड का उपयोग किस तरह किया गया, टेंडर प्रक्रिया में पारदर्शिता बरती गई या नहीं, और क्या कार्यक्रमों के नाम पर कागजी खर्च दिखाकर सरकारी खजाने को चूना लगाया गया—इन तमाम बिंदुओं पर अधिकारियों से तीखे सवाल पूछे गए।

​प्रशासनिक महकमे में पसरा सन्नाटा और सतर्कता

​ईओयू की इस कार्रवाई का असर लखीसराय कलेक्ट्रेट के कामकाज पर साफ देखा जा रहा है। जिन विभागों की फाइलें जांच टीम ने तलब की थीं, वहां के अधिकारी और कर्मचारी अब अपनी कार्यशैली को लेकर खासे सतर्क नजर आ रहे हैं। कई अधिकारी कैमरे के सामने कुछ भी बोलने से कतरा रहे हैं। प्रशासनिक गलियारों में इस बात की चर्चा आम है कि यदि जांच की आंच और तेज हुई, तो कई छोटे-बड़े कर्मचारी और बिचौलिए भी इसकी चपेट में आ सकते हैं।

​प्रभारी जिलाधिकारी नीरज कुमार और एसडीसी प्राची के कार्यालयों में हुई पूछताछ ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जांच टीम किसी भी दस्तावेजी सुराग को छोड़ना नहीं चाहती। ईओयू के अधिकारी अपने साथ महत्वपूर्ण अभिलेखों के डिजिटल साक्ष्य भी लेकर गए हैं, जिनका विश्लेषण पटना स्थित मुख्यालय में तकनीकी विशेषज्ञों द्वारा किया जाएगा।

​क्या कहता है ईओयू का एक्शन प्लान?

​आर्थिक अपराध इकाई की यह कार्रवाई केवल एक जिले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संदेश है कि उच्च पदों पर बैठे अधिकारी भी जांच के दायरे से बाहर नहीं हैं। मिथिलेश मिश्र के कार्यकाल की जांच के लिए गठित पांच सदस्यीय टीम में वित्तीय विशेषज्ञों और पुलिस अधिकारियों का ऐसा तालमेल है जो ‘मनी ट्रेल’ (पैसे के प्रवाह) को पकड़ने में माहिर है।

​गुरुवार शाम को जांच के दूसरे चरण के समापन के बाद टीम वापस पटना लौट गई है। अब गेंद सरकार और गृह विभाग के पाले में है। यदि दस्तावेजों की जांच में वित्तीय गबन या पद के दुरुपयोग के पुख्ता सबूत मिलते हैं, तो आने वाले दिनों में पूर्व जिलाधिकारी की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।

​पारदर्शिता की ओर बढ़ता कदम

​भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे किसी पूर्व जिलाधिकारी के कार्यकाल की इस तरह की सघन जांच लखीसराय के इतिहास में बिरली ही देखने को मिलती है। स्थानीय नागरिकों का मानना है कि इस तरह की कार्रवाइयों से सरकारी तंत्र में जनता का भरोसा बहाल होता है। जब एक जिलाधिकारी जैसे शीर्ष पद पर आसीन व्यक्ति के कार्यकाल की जांच आर्थिक अपराध इकाई जैसी विशिष्ट संस्था करती है, तो यह स्पष्ट होता है कि व्यवस्था के भीतर जवाबदेही तय करने की कोशिशें ईमानदार हैं।

​फिलहाल, लखीसराय के प्रशासनिक हलकों में यह सवाल तैर रहा है कि पटना गई ईओयू की टीम अब अगली कार्रवाई कब और किस रूप में करेगी। क्या यह केवल फाइलों की पड़ताल तक सीमित रहेगा या फिर आने वाले समय में कुछ बड़ी गिरफ्तारियां या विभागीय कार्रवाई देखने को मिलेगी? यह तो आने वाला समय ही बताएगा, लेकिन इतना तय है कि मिथिलेश मिश्र के 1.5 वर्षों का लेखा-जोखा अब सार्वजनिक और कानूनी जांच की कसौटी पर है।

लखीसराय में ईओयू की दो दिवसीय छापेमारी ने यह साबित कर दिया है कि सरकारी फाइलों के भीतर छिपे राज अब ज्यादा दिनों तक बंद नहीं रह सकते। धान खरीद से लेकर शस्त्र लाइसेंस और सांस्कृतिक महोत्सवों तक, हर उस पहलू की जांच की जा रही है जहाँ भ्रष्टाचार की गुंजाइश थी। प्रशासन में पारदर्शिता लाने की दिशा में यह कदम मिल का पत्थर साबित हो सकता है।

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