
पटना/मोतिहारी। बिहार की सियासत में ‘शराबबंदी’ एक ऐसा मुद्दा है जो समय-समय पर न केवल सुशासन के दावों की परीक्षा लेता है, बल्कि बार-बार होती मौतों के कारण सरकार की नीतियों को कटघरे में भी खड़ा करता है। पूर्वी चंपारण के मोतिहारी में ज़हरीली शराब से हुई ताज़ा मौतों ने एक बार फिर पूरे प्रदेश को झकझोर दिया है। इस त्रासदी के बाद विपक्ष के नेता तेजस्वी प्रसाद यादव ने नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार पर सीधा हमला बोला है। 4 अप्रैल 2026 की इस बड़ी राजनीतिक हलचल में तेजस्वी यादव ने आरोप लगाया है कि बिहार में शराबबंदी कानून अब अपने मूल उद्देश्य से पूरी तरह भटक चुका है। उनके अनुसार, यह कानून अब समाज सुधार का जरिया नहीं, बल्कि सत्ताधारी दल के नेताओं, भ्रष्ट अधिकारियों और शराब माफियाओं के लिए अकूत कमाई का एक ‘कमाऊ पूत’ बन गया है।
मोतिहारी की चीखें और तेजस्वी का आक्रोश: आँकड़ों की जुबानी हमला
शुक्रवार को जारी एक कड़े बयान में तेजस्वी प्रसाद यादव ने मोतिहारी की घटना को बेहद दुखद और हृदय विदारक बताया। उन्होंने कहा कि मोतिहारी में ज़हरीली शराब ने न केवल चार परिवारों के चिराग बुझा दिए, बल्कि छह लोग अपनी आँखों की रोशनी हमेशा के लिए खो चुके हैं। कई अन्य लोग अभी भी अस्पतालों में अपनी जिंदगी की अंतिम लड़ाई लड़ रहे हैं। तेजस्वी यादव के अनुसार, यह घटना कोई इकलौती दुर्घटना नहीं है, बल्कि बिहार में पिछले एक दशक से चल रहे ‘मौत के तांडव’ की एक नई कड़ी है।
तेजस्वी ने सरकारी आँकड़ों का हवाला देते हुए दावा किया कि शराबबंदी लागू होने के बाद से अब तक बिहार में ज़हरीली शराब पीने के कारण 1300 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। उन्होंने इस पर कटाक्ष करते हुए कहा कि यह तो केवल वह संख्या है जो फाइलों में दर्ज है, असलियत में यह संख्या इससे कहीं अधिक भयावह हो सकती है। हकीकत में सैकड़ों लोग ऐसे हैं जिन्होंने लोक-लाज और पुलिस के डर से अपनी मौत या आँखों की रोशनी जाने की बात सार्वजनिक नहीं की। यह आंकड़ा एनडीए सरकार की शराबबंदी नीति की विफलता का सबसे बड़ा गवाह है।
भ्रष्ट तंत्र और माफिया का गठजोड़: ‘कमाऊ पूत’ की परिभाषा
तेजस्वी प्रसाद यादव ने अपने बयान में सबसे गंभीर आरोप ‘गठजोड़’ पर लगाया है। उन्होंने कहा कि जब यह कानून बनाया गया था, तब उद्देश्य पवित्र था, लेकिन क्रियान्वयन (Implementation) के स्तर पर यह पूरी तरह धराशायी हो गया है। तेजस्वी के अनुसार, बिहार में अब एक समानांतर अर्थव्यवस्था चल रही है। जहाँ सरकारी राजस्व का नुकसान हो रहा है, वहीं भाजपा और जदयू के कुछ नेताओं के संरक्षण में शराब का अवैध धंधा फल-फूल रहा है।
उन्होंने आरोप लगाया कि यह कानून अब भ्रष्ट पुलिस अधिकारियों और शराब माफियाओं के बीच ‘अवैध वसूली’ का सबसे बड़ा जरिया बन गया है। जिसे शराबबंदी का रक्षक बनाया गया था, वही अब माफियाओं के साथ मिलकर इसे घर-घर पहुँचाने में मदद कर रहे हैं। तेजस्वी ने कहा कि शराबबंदी ने बिहार में अपराधियों का एक नया वर्ग पैदा कर दिया है जो रातों-रात लखपति और करोड़पति बन रहे हैं, और इस पूरी प्रक्रिया में गरीब और आम लोग अपनी जान देकर इसकी कीमत चुका रहे हैं।
होम डिलीवरी और पुलिस की भूमिका: सरकार की नाक के नीचे खेल
नेता प्रतिपक्ष ने बिहार की वर्तमान कानून व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि आज प्रदेश में किसी भी अन्य आवश्यक वस्तु की तुलना में शराब की ‘होम डिलीवरी’ ज्यादा आसान है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि सरकार की नाक के नीचे खुलेआम ज़हरीली शराब की भट्टियां धधक रही हैं और पुलिस की मिलीभगत से इसे धड़ल्ले से बेचा जा रहा है।
तेजस्वी यादव ने सवाल उठाया कि जब बिहार में शराबबंदी है, तो टनों के हिसाब से स्पिरिट और विदेशी शराब की खेप राज्य की सीमाओं को पार कैसे कर रही है? उन्होंने कहा कि बिना उच्च स्तरीय संरक्षण और स्थानीय पुलिस की संलिप्तता के यह संभव ही नहीं है। पुलिस का सूचना तंत्र (Intelligence) केवल गरीब शराब पीने वालों को पकड़ने के लिए सक्रिय है, लेकिन बड़े माफियाओं तक पहुँचने में इसके हाथ कांपने लगते हैं।
शराबबंदी: सुधार का संकल्प या प्रशासनिक विफलता? (विशेष विश्लेषण)
द वॉयस ऑफ बिहार के विशेष विश्लेषण के अनुसार, बिहार में शराबबंदी कानून एक ऐसी दोधारी तलवार बन चुका है जिसका सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव काफी जटिल है।
- सामाजिक पक्ष बनाम हकीकत: सरकार का तर्क रहा है कि इस कानून से घरेलू हिंसा में कमी आई है और गरीब परिवारों की आर्थिक स्थिति सुधरी है। लेकिन तेजस्वी यादव का हमला इस बात पर केंद्रित है कि ‘शुद्ध शराब’ की जगह अब ‘ज़हरीला ज़हर’ बिक रहा है, जो सामाजिक सुधार के दावों को ही खत्म कर रहा है।
- राजस्व का घाटा: बिहार को हर साल हजारों करोड़ रुपये के राजस्व की हानि हो रही है। तेजस्वी का तर्क है कि यह पैसा जनता के विकास में लगने के बजाय शराब सिंडिकेट की जेबों में जा रहा है।
- न्यायिक बोझ: बिहार की जेलों और अदालतों में शराबबंदी से जुड़े मामलों का अंबार लगा हुआ है। इसमें भी अधिकांश गिरफ्तार लोग समाज के सबसे निचले और गरीब तबके से आते हैं, जबकि मुख्य सरगना अक्सर पुलिस की पहुँच से दूर रहते हैं।
मोतिहारी कांड और 2023 की यादें: क्यों नहीं सुधरे हालात?
तेजस्वी यादव ने याद दिलाया कि मोतिहारी में साल 2023 में भी ऐसी ही एक बड़ी घटना हुई थी जिसमें दर्जनों लोगों की जान गई थी। उन्होंने पूछा कि आखिर तीन साल बीत जाने के बाद भी सरकार ने पिछली त्रासदियों से क्या सबक सीखा? जब बार-बार एक ही जिले और एक ही इलाके में ज़हरीली मौतें हो रही हैं, तो यह स्पष्ट है कि स्थानीय प्रशासन और खुफिया तंत्र पूरी तरह से फेल हो चुका है।
उन्होंने कहा कि सरकार केवल ‘समाधान यात्रा’ और नारों में व्यस्त है, जबकि धरातल पर लोग ज़हर पीकर मर रहे हैं। तेजस्वी यादव ने मांग की कि सरकार इस कानून की विफलता की जिम्मेदारी स्वीकार करे और उन बड़े चेहरों को बेनकाब करे जो इस अवैध कारोबार के असली सूत्रधार हैं।
समाधान की तलाश में बिहार
जहाँ तेजस्वी यादव का हमला राजनीतिक रूप से तीखा है, वहीं सुशासन के समर्थकों का मानना है कि किसी भी बड़े सुधार के रास्ते में चुनौतियां आती हैं। शराबबंदी को केवल पुलिस के भरोसे नहीं, बल्कि सामाजिक जागरूकता के जरिए सफल बनाया जा सकता है। हालाँकि, यह भी सच है कि मोतिहारी जैसी घटनाएं सरकार के उन दावों की पोल खोलती हैं जिनमें ‘जीरो टॉलरेंस’ की बात की जाती है।
निष्पक्ष रूप से देखा जाए तो, तेजस्वी यादव के आरोपों में छिपे आंकड़े और जमीनी हकीकत को नकारा नहीं जा सकता। बिहार में शराबबंदी अब केवल एक नीति नहीं, बल्कि एक बड़ी प्रशासनिक चुनौती बन गई है। क्या वाकई यह कानून ‘कमाऊ पूत’ बन गया है? इस सवाल का जवाब उन हज़ारों गिरफ्तारियों और करोड़ों रुपये की बरामदगी में छिपा है जो हर साल खबरों की सुर्खियां बनती हैं।
तेजस्वी की चेतावनी और सरकार की चुप्पी
तेजस्वी प्रसाद यादव के इस बयान ने बिहार की राजनीति में एक बार फिर भूचाल ला दिया है। मोतिहारी की त्रासदी ने विपक्ष को एक बड़ा हथियार दे दिया है जिससे वे सरकार की ‘नियत और नीति’ दोनों पर सवाल उठा रहे हैं। तेजस्वी ने स्पष्ट किया है कि जब तक सरकार शराब माफिया और भ्रष्ट तंत्र के नेक्सस (Nexus) को नहीं तोड़ेगी, तब तक बिहार की सड़कों पर अर्थियां उठती रहेंगी।
द वॉयस ऑफ बिहार की टीम इस पूरी स्थिति पर नजर बनाए हुए है। मोतिहारी में अपनों को खोने वाले परिवारों के लिए तेजस्वी की यह राजनीति भले ही मरहम न हो, लेकिन यह बिहार के प्रशासनिक तंत्र को आइना दिखाने के लिए पर्याप्त है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार तेजस्वी के इन गंभीर आरोपों का क्या जवाब देती है और क्या वाकई शराबबंदी कानून में किसी बड़े बदलाव की आहट सुनाई देगी।


