
भागलपुर, 10 जुलाई 2025:अररिया जिले के पलासी, चौसा और आसपास के गांवों से हजारों ग्रामीणों ने आज भागलपुर के बरारी स्थित सीढ़ी घाट पर पहुंचकर विषहरा भगवान के कलशों का विधिपूर्वक विसर्जन किया। इस अवसर पर सामूहिक गंगा स्नान और पूजा-अर्चना के साथ ग्रामीणों की आस्था, विश्वास और परंपरा का एक अद्भुत संगम देखने को मिला।
बीमारी से मुक्ति की सामूहिक यात्रा
ग्रामीणों के अनुसार, लगभग तीन वर्ष पूर्व गांव में अचानक अज्ञात बीमारियां—जैसे बुखार, चेचक और अन्य संक्रमण—फैल गई थीं। हालात भयावह होने पर गांव के बुजुर्गों की सलाह पर विषहरा भगवान की पूजा शुरू की गई।
इस पूजा का उद्देश्य गांव की रक्षा और बीमारियों से मुक्ति था। अब जब गांव पूरी तरह स्वस्थ हो गया, तो ग्रामीणों ने इसे ईश्वर की कृपा मानते हुए सामूहिक गंगा स्नान और कलश विसर्जन का आयोजन किया।
श्रद्धा और उत्सव का माहौल
पूजा के समापन पर ढोल-नगाड़ों की धुन पर नाचते ग्रामीण, उत्साह और भक्ति से भरकर गंगा तट पहुंचे। महिलाएं पारंपरिक वस्त्रों में सजी थीं, और हर चेहरे पर संतोष, श्रद्धा और आभार की भावना स्पष्ट झलक रही थी।
ग्रामीण रुपेश कुमार मंडल ने बताया, “जब गांव में बीमारी फैली थी, तब हमने पूजा शुरू की थी। आज जब सभी स्वस्थ हैं, तो ईश्वर को धन्यवाद देने आए हैं।”
पूनम देवी ने कहा, “भगवान ने हमारी सुन ली। आज का दिन हमारे लिए किसी त्योहार से कम नहीं है।”
पूजा कुमारी ने कहा, “यह पूजा केवल आस्था नहीं, बल्कि हमारे गांव की एकता और विश्वास का प्रतीक है।”
अंधविश्वास या परंपरा?
हालांकि यह आयोजन ग्राम्य आस्था और एकता का प्रतीक रहा, लेकिन यह सवाल भी उठता है कि क्या हर परंपरा सकारात्मक होती है? हाल ही में पूर्णिया में इसी तरह की आस्था के चलते पांच लोगों की मौत की घटना सामने आई थी। ऐसे में आवश्यक है कि परंपरा और वैज्ञानिक सोच के बीच संतुलन बनाया जाए।
प्रशासन रहा सतर्क
गंगा घाट पर उमड़ी भीड़ को देखते हुए प्रशासन ने सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए थे। पुलिस बल और स्वास्थ्यकर्मियों की तैनाती सुनिश्चित की गई थी ताकि किसी भी अप्रिय स्थिति से बचाव किया जा सके।
यह आयोजन गांव की सामूहिक चेतना, सामाजिक समर्पण और धार्मिक आस्था का एक जीवंत उदाहरण है, जो दर्शाता है कि एकजुटता और आस्था के बल पर समुदाय किसी भी संकट का सामना कर सकता है।


