मौत को मात देने की जद्दोजहद: सुल्तानगंज के मुख्य पार्षद के सिर में अब भी फंसी है गोली, पटना मेदांता में जिंदगी और मौत के बीच महासंग्राम

पटना/सुल्तानगंज। बिहार के प्रशासनिक और राजनैतिक गलियारों को दहला देने वाले सुल्तानगंज नगर परिषद गोलीकांड के जख्म अब भी हरे हैं। इस जघन्य वारदात में गंभीर रूप से घायल हुए नगर परिषद के मुख्य पार्षद राजकुमार गुड्डू की स्थिति अत्यंत चिंताजनक बनी हुई है। राजधानी पटना के मेदांता हॉस्पिटल के सघन चिकित्सा कक्ष (ICU) में भर्ती मुख्य पार्षद इस समय मौत और जिंदगी के बीच एक कठिन महासंग्राम लड़ रहे हैं। सबसे बड़ी चिकित्सकीय चुनौती यह है कि अपराधियों द्वारा दागी गई एक गोली अब भी उनके सिर के भीतर अटकी हुई है। डॉक्टरों की एक विशेषज्ञ टीम चौबीसों घंटे उनकी निगरानी कर रही है, लेकिन गोली की नाजुक स्थिति के कारण तत्काल ऑपरेशन करना जोखिम भरा माना जा रहा है। अस्पताल प्रशासन और परिजनों से मिल रही जानकारी के अनुसार, गुरुवार का दिन उनके लिए काफी संघर्षपूर्ण रहा, जहाँ उन्हें जीवन रक्षक दवाओं के साथ भारी मात्रा में रक्त की आवश्यकता पड़ी। पूरे सुल्तानगंज और भागलपुर जिले में उनके शीघ्र स्वस्थ होने के लिए प्रार्थनाओं और दुआओं का दौर जारी है।

चिकित्सकीय अपडेट: 4 यूनिट ब्लड और वेंटिलेटर का सहारा

​पटना मेदांता अस्पताल में भर्ती राजकुमार गुड्डू की सेहत को लेकर पल-पल की जानकारी सुल्तानगंज तक पहुँच रही है। उनके साथ पटना गए परिजनों और करीबियों ने बताया कि गुरुवार को उनकी स्थिति अचानक बिगड़ने लगी थी, जिसके बाद डॉक्टरों ने तत्काल चार यूनिट ब्लड चढ़ाने का निर्णय लिया। शरीर में रक्त की कमी और आंतरिक रक्तस्राव को नियंत्रित करने के लिए यह प्रक्रिया अनिवार्य थी।

​अस्पताल के सूत्रों के अनुसार, मुख्य पार्षद को फिलहाल ‘क्रिटिकल केयर यूनिट’ में रखा गया है। डॉक्टरों का कहना है कि सिर में फंसी गोली मस्तिष्क के बेहद संवेदनशील हिस्से के करीब है। ऐसे में बिना किसी पुख्ता स्टेबलाइजेशन (स्थिरीकरण) के गोली निकालने का प्रयास करना जानलेवा साबित हो सकता है। चिकित्सा बुलेटिन के संकेत बताते हैं कि अगले 24 से 48 घंटे उनकी जान बचाने के लिए सबसे महत्वपूर्ण ‘गोल्डन पीरियड’ हैं। पूरी टीम इस बात पर ध्यान केंद्रित कर रही है कि पहले उनके शरीर के अन्य महत्वपूर्ण अंग (वाइटल ऑर्गन्स) सामान्य रूप से कार्य करने लगें और संक्रमण का खतरा कम हो जाए, उसके बाद ही न्यूरो-सर्जरी के अगले चरण पर विचार किया जाएगा।

बाहर से बुलाए जा रहे विशेषज्ञ, परिजनों की बढ़ी चिंता

​राजकुमार गुड्डू की गंभीर स्थिति को देखते हुए मेदांता अस्पताल प्रबंधन अब दिल्ली या अन्य बड़े महानगरों से न्यूरो-सर्जरी के अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विशेषज्ञों को बुलाने की तैयारी कर रहा है। स्थानीय डॉक्टरों का मानना है कि सिर में फंसी गोली को निकालने के लिए जिस स्तर की सूक्ष्म सर्जरी (Micro-surgery) की आवश्यकता है, उसके लिए देश के बेहतरीन हाथों की जरूरत है।

​परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है। उनके अनुसार, जब तक गोली शरीर से बाहर नहीं निकल जाती, तब तक किसी भी तरह की राहत की उम्मीद बेमानी है। अस्पताल के गलियारों में मौजूद उनके समर्थकों और परिवार के सदस्यों का कहना है कि वे केवल ईश्वर के चमत्कार और डॉक्टरों की मेधा पर भरोसा कर रहे हैं। परिजनों ने बताया कि गोली लगने के बाद से ही वे चेतना में नहीं हैं और उनकी श्वसन प्रक्रिया को मशीनी सहायता से सुचारू रखा गया है।

राजनैतिक एकजुटता: सैयद शाहनवाज हुसैन पहुँचे मेदांता

​इस दुखद घड़ी में मुख्य पार्षद के साथ राजनैतिक संवेदनाओं का सैलाब भी उमड़ पड़ा है। गुरुवार को पूर्व केंद्रीय मंत्री सैयद शाहनवाज हुसैन विशेष रूप से राजकुमार गुड्डू का हाल जानने मेदांता अस्पताल पहुँचे। उन्होंने वहां मौजूद डॉक्टरों की टीम से विस्तार से चर्चा की और इलाज में किसी भी प्रकार की कोताही न बरतने का आग्रह किया। शाहनवाज हुसैन ने पीड़ित परिवार से मुलाकात की और उन्हें ढांढस बंधाते हुए कहा कि पूरी सरकार और प्रशासन इस मुश्किल वक्त में उनके साथ खड़ा है।

​उन्होंने परिजनों को आश्वासन दिया कि यदि बेहतर इलाज के लिए उन्हें एयर एंबुलेंस के जरिए दिल्ली या विदेश ले जाने की आवश्यकता पड़ी, तो उसमें भी हर संभव राजनैतिक और प्रशासनिक सहयोग प्रदान किया जाएगा। शाहनवाज हुसैन ने अस्पताल परिसर में मीडिया से बात करते हुए कहा कि सुल्तानगंज में जो हुआ वह लोकतंत्र के मंदिर पर हमला है और हम दुआ करते हैं कि राजकुमार गुड्डू जल्द स्वस्थ होकर वापस लौटें।

शहीद ईओ कृष्ण भूषण कुमार को नमन और प्रतिमा की मांग

​जहाँ एक ओर मुख्य पार्षद की सलामती के लिए प्रार्थनाएं हो रही हैं, वहीं दूसरी ओर सुल्तानगंज की जनता उस जांबाज अधिकारी के बलिदान को भी याद कर रही है जिसने कर्तव्य की वेदी पर अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। कार्यपालक पदाधिकारी (EO) कृष्ण भूषण कुमार ने जिस तरह अपराधियों के सामने ढाल बनकर खड़े होने का साहस दिखाया, उसकी चर्चा आज हर जुबान पर है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर सुल्तानगंज के नागरिकों ने एक बड़ा अभियान शुरू किया है।

मौत को मात देने की जद्दोजहद: सुल्तानगंज के मुख्य पार्षद के सिर में अब भी फंसी है गोली, पटना मेदांता में जिंदगी और मौत के बीच महासंग्राम
भागलपुर में चुनावी सभा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ सुल्तानगंज सभापति

​लोग मांग कर रहे हैं कि नगर परिषद कार्यालय परिसर में, जहाँ यह खूनी वारदात हुई, वहां दिवंगत कार्यपालक पदाधिकारी कृष्ण भूषण कुमार की एक आदमकद प्रतिमा (मूर्ति) स्थापित की जाए। स्थानीय युवाओं और बुद्धिजीवियों का तर्क है कि उनकी शहादत आने वाली प्रशासनिक पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगी। यह प्रतिमा इस बात का प्रतीक होगी कि भ्रष्टाचार और माफियाराज के खिलाफ लड़ने वाले अधिकारी कभी मरते नहीं, बल्कि जनता के दिलों में अमर हो जाते हैं। नगर परिषद के कई पार्षदों ने भी इस मांग का समर्थन किया है और कहा है कि आगामी बोर्ड की बैठक में इस पर आधिकारिक प्रस्ताव लाया जाएगा।

प्रशासनिक वैक्यूम और सुल्तानगंज में पसरा सन्नाटा

​सुल्तानगंज नगर परिषद इस समय एक अजीबोगरीब प्रशासनिक शून्यता (Administrative Vacuum) से गुजर रहा है। एक तरफ जांबाज ईओ का शहीद होना और दूसरी तरफ मुख्य पार्षद का अस्पताल में जिंदगी के लिए संघर्ष करना, इन दोनों घटनाओं ने शहर के विकास कार्यों पर फिलहाल ब्रेक लगा दिया है। नगर परिषद कार्यालय में सन्नाटा पसरा हुआ है और कर्मचारी अब भी उस खौफनाक मंजर को याद कर सिहर उठते हैं।

​पुलिस की गश्ती हालांकि इलाके में बढ़ा दी गई है, लेकिन आम जनता के मन में यह सवाल अब भी कौंध रहा है कि क्या एक अधिकारी और जनप्रतिनिधि अपने ही कार्यालय में सुरक्षित नहीं हैं? शहर के बाजारों में राजकुमार गुड्डू के स्वास्थ्य को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म रहता है। लोग हर आने-जाने वाले से बस एक ही सवाल पूछते हैं—”क्या गुड्डू जी की गोली निकल गई?”

​अस्पताल में मौजूद डॉक्टरों का कहना है कि ट्रीटमेंट प्लान पूरी तरह से मरीज की रिकवरी रेट पर निर्भर है। यदि शुक्रवार की रात तक उनके वाइटल्स स्टेबल होते हैं, तो शनिवार को सर्जरी को लेकर बड़ा फैसला लिया जा सकता है। फिलहाल, मेदांता अस्पताल का वह विशेष वार्ड बिहार की राजनीति और प्रशासन के लिए सबसे संवेदनशील केंद्र बना हुआ है, जहाँ एक जनसेवक अपनी अंतिम सांसों तक लड़ाई लड़ रहा है।

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