ग्रामीण हाटों ने बदली गांव की तस्वीर, ताड़ के पंखों से सैकड़ों परिवारों को मिल रहा रोजगार

पटना, 10 अप्रैल 2026 — बिहार में ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में चलाई जा रही योजनाएं अब जमीनी स्तर पर असर दिखाने लगी हैं। मुख्यमंत्री ग्रामीण हाट विकास योजना के तहत विकसित किए गए आधुनिक ग्रामीण हाट अब स्थानीय कारीगरों और छोटे व्यवसायियों के लिए स्थायी रोजगार का बड़ा माध्यम बनकर उभरे हैं। समस्तीपुर जिले के रोसड़ा प्रखंड स्थित मोतीपुर पंचायत इसका एक जीवंत उदाहरण बनकर सामने आया है, जहां पारंपरिक हुनर आज रोज़गार का मजबूत आधार बन चुका है।

मोतीपुर पंचायत के वार्ड संख्या 5 में करीब 125 परिवार पीढ़ियों से ताड़ के पत्तों से पंखा बनाने की कला को जीवित रखे हुए हैं। यह केवल एक व्यवसाय नहीं, बल्कि यहां के लोगों की परंपरा और पहचान का हिस्सा बन चुका है। गांव के कारीगरों द्वारा तैयार किए गए ये पंखे अब स्थानीय ग्रामीण हाट के साथ-साथ बेगूसराय, दरभंगा और आसपास के कई जिलों के बाजारों तक पहुंच रहे हैं।

स्थानीय वार्ड सदस्य बताते हैं कि यह हुनर उनके पूर्वजों से मिला है और करीब आठ पीढ़ियों से यह परंपरा लगातार आगे बढ़ रही है। इस काम की खास बात यह है कि इसमें परिवार का हर सदस्य अपनी भूमिका निभाता है। पुरुष ताड़ के पत्ते लाते हैं, महिलाएं सिलाई और रंगाई करती हैं, जबकि बच्चे भी इस कला को सीखने में रुचि दिखा रहे हैं। इससे न केवल रोजगार मिलता है, बल्कि पारिवारिक एकजुटता भी बनी रहती है।

पंखा बनाने की प्रक्रिया पूरी तरह पारंपरिक और मेहनत भरी होती है। सबसे पहले अच्छे और नरम ताड़ के पत्तों का चयन किया जाता है, जिन्हें तीन दिनों तक धूप में सुखाया जाता है। इसके बाद पत्तों को काटकर गोल आकार दिया जाता है और सावधानीपूर्वक सिलाई की जाती है। ताड़ के डंडे से मजबूत हैंडल तैयार कर पंखे को अंतिम रूप दिया जाता है और फिर रंगाई के बाद दोबारा सुखाया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में लगभग 10 दिन का समय लगता है।

एक परिवार औसतन हर महीने तीन से चार हजार पंखे तैयार कर लेता है, जो थोक बाजार में 8 से 10 रुपये प्रति पीस के हिसाब से बिकते हैं। अब कई कारीगर सीधे मोतीपुर के ग्रामीण हाट में अपने उत्पाद बेच रहे हैं, जिससे उन्हें बेहतर मुनाफा भी मिल रहा है।

कारीगरों के अनुसार, पहले इन पंखों को बाजार तक पहुंचाने में काफी कठिनाइयां होती थीं। लेकिन ग्रामीण हाट शुरू होने के बाद अब बिक्री आसान हो गई है और आय में भी सुधार हुआ है। यही कारण है कि नई पीढ़ी भी इस पारंपरिक काम को अपनाने के लिए प्रेरित हो रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस तरह के स्थानीय उत्पादों को बेहतर बाजार और ब्रांडिंग का समर्थन मिले, तो यह न केवल ग्रामीण रोजगार को बढ़ावा देगा बल्कि बिहार की पारंपरिक कला को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान भी दिला सकता है।

कुल मिलाकर, ग्रामीण हाटों की यह पहल केवल बाजार उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह गांवों में आत्मनिर्भरता, रोजगार और सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का एक मजबूत माध्यम बनती जा रही है।

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