​बेटी की डोली उठने से पहले उठी पिता की अर्थी: पटना में सिपाही की मौत से शादी की खुशियां मातम में बदलीं

पटना। नियति के क्रूर प्रहार की एक ऐसी हृदयविदारक घटना बिहार की राजधानी पटना से सामने आई है, जिसने मानवीय संवेदनाओं को झकझोर कर रख दिया है। एक पिता, जिसकी आँखों में अपनी बेटी को लाल जोड़े में विदा करने के सपने थे, जिसके घर में बारात के स्वागत की तैयारियां अंतिम चरण में थीं, वह अचानक मौत की गहरी नींद सो गया। पटना पुलिस लाइन में तैनात सिपाही सुरेश तिवारी के साथ काल ने जो खेल खेला, उसने एक हंसते-खेलते घर को मातम के घने कोहरे में धकेल दिया। शनिवार, 25 अप्रैल 2026 को जिस घर से शहनाइयों की गूँज सुनाई देनी थी और जहाँ जमुई से बारात का स्वागत होना था, वहां शुक्रवार को सिसकियों और विलाप के बीच अंतिम संस्कार की रस्में पूरी की गईं। 2009 बैच के समर्पित सिपाही सुरेश तिवारी का इस तरह अचानक चले जाना न केवल उनके परिवार के लिए एक अपूरणीय क्षति है, बल्कि पटना पुलिस महकमे के लिए भी एक शोक का विषय बन गया है।

शहनाइयों के बीच पसरा सन्नाटा: बारात आने से पहले ही थम गई सांसें

​कहते हैं कि इंसान सोचता कुछ है और ईश्वर की योजना कुछ और ही होती है। पटना के बुद्धा कॉलोनी थाना क्षेत्र अंतर्गत कुम्हार गली स्थित सुरेश तिवारी के आवास पर पिछले कई दिनों से उत्सव का माहौल था। बेटी की शादी को लेकर घर को सजाया गया था, मेहमानों का आना शुरू हो चुका था और हर चेहरे पर एक विशेष चमक थी। शनिवार को जमुई से बारात आने वाली थी, जिसे लेकर सुरेश तिवारी खुद काफी उत्साहित थे और हर छोटी-बड़ी व्यवस्था का ध्यान रख रहे थे।

​लेकिन गुरुवार की देर रात अचानक सब कुछ बदल गया। जब घर के बाकी सदस्य शादी की अगली सुबह की तैयारियों की चर्चा कर रहे थे, तभी सुरेश तिवारी के सीने में तेज दर्द उठा। इससे पहले कि परिवार के लोग कुछ समझ पाते या उन्हें अस्पताल ले जाने की प्रक्रिया पूरी हो पाती, नियति ने अपना काम कर दिया था। उनकी हृदय गति रुक गई और देखते ही देखते शादी का वह घर चीख-पुकार के केंद्र में बदल गया। बेटी, जिसकी विदाई के लिए पिता ने अपनी पूरी जमा-पूँजी और जीवन के अरमान लगा दिए थे, वह अब अपने पिता के निर्जीव शरीर से लिपटकर बिलख रही थी।

स्वास्थ्य की चुनौतियां और कर्तव्य का बोझ

​52 वर्षीय सुरेश तिवारी मूल रूप से मधेपुरा जिले के सिंहेश्वर गांव के निवासी थे। वर्ष 2009 में वे बिहार पुलिस में आरक्षी के पद पर भर्ती हुए थे। सेवा के दौरान उन्होंने हमेशा अपने कर्तव्यों का निर्वहन पूरी निष्ठा के साथ किया। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों से उनका स्वास्थ्य उनके साथ नहीं दे रहा था। वे लंबे समय से उच्च रक्तचाप (ब्लड प्रेशर) और मधुमेह (शुगर) जैसी बीमारियों से जूझ रहे थे।

​करीब ढाई साल पहले उन पर एक और शारीरिक विपत्ति आई थी, जब उनके शरीर के दाहिने हिस्से में लकवा (पैरालिसिस) मार गया था। इस गंभीर स्थिति के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। उनका नियमित इलाज पटना के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) में चल रहा था। अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर वे धीरे-धीरे स्वास्थ्य लाभ कर रहे थे और विभागीय कार्यों में भी योगदान दे रहे थे। 31 अगस्त 2025 को उनका स्थानांतरण सिवान से पटना पुलिस लाइन में हुआ था, जिसके बाद वे अपने परिवार के साथ बुद्धा कॉलोनी में रह रहे थे। शादी के इस माहौल में काम का दबाव और संभवतः शारीरिक थकान उनके कमजोर दिल पर भारी पड़ गई।

गार्ड ऑफ ऑनर के साथ अंतिम विदाई: नम आँखों से दी गई श्रद्धांजलि

​शुक्रवार का दिन पटना पुलिस लाइन के लिए अत्यंत भावुक कर देने वाला था। सुरेश तिवारी का पार्थिव शरीर जैसे ही पुलिस लाइन पहुँचा, वहां सन्नाटा पसर गया। अपने एक साथी को इस तरह खोने का गम हर पुलिसकर्मी के चेहरे पर साफ दिख रहा था। पुलिस लाइन के प्रांगण में उन्हें ‘गार्ड ऑफ ऑनर’ दिया गया। यह सम्मान एक सिपाही के लिए उसके सेवा काल की सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होती है।

​वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों और उनके साथियों ने पुष्पचक्र अर्पित कर उन्हें अंतिम सलामी दी। गार्ड ऑफ ऑनर की प्रक्रिया के दौरान वहां मौजूद हर व्यक्ति की आँखें नम थीं। इसके बाद, उनके पार्थिव शरीर को अंतिम संस्कार के लिए पटना के बांसघाट ले जाया गया। गंगा के तट पर उनके पुत्र ने उन्हें मुखाग्नि दी। जिस हाथ से कल उन्हें अपनी बेटी का कन्यादान करना था, आज उसी परिवार के सदस्यों को उनके अंतिम सफर की रस्में पूरी करनी पड़ रही थीं। बांसघाट पर मौजूद लोगों के लिए यह दृश्य देखना अत्यंत कठिन था कि एक तरफ शादी का कार्ड घर में पड़ा है और दूसरी तरफ चिता की राख ठंडी हो रही है।

परिवार पर टूटा दुखों का पहाड़: तीन संतानों के सिर से उठा साया

​सुरेश तिवारी के पीछे उनकी पत्नी, दो बेटियां और एक बेटा है। परिवार में वे ही एकमात्र सहारा थे। उनकी एक बेटी की शादी पहले ही हो चुकी थी, जबकि दूसरी बेटी की शादी के लिए वे पिछले कई महीनों से तैयारियों में जुटे थे। उनका बेटा अभी छोटा है, जिस पर अब पूरे घर की जिम्मेदारी का बोझ आ गया है।

​परिजनों ने बताया कि वे अपनी इस बेटी की शादी को लेकर काफी भावुक थे। वे चाहते थे कि शादी में कोई कमी न रहे। जमुई से आने वाली बारात के स्वागत के लिए उन्होंने विशेष व्यवस्थाएं की थीं। लेकिन विधाता को कुछ और ही मंजूर था। अब घर के भीतर जहाँ मंगल गीतों की गूँज होनी चाहिए थी, वहां सिसकियों का शोर है। बेटी का रो-रोकर बुरा हाल है, वह बार-बार बस यही कह रही है कि अब उसे मंडप तक कौन ले जाएगा और उसका कन्यादान कौन करेगा।

पुलिसकर्मियों के स्वास्थ्य पर बढ़ता दबाव: एक सामाजिक चिंता

​सुरेश तिवारी की मौत ने एक बार फिर पुलिसकर्मियों के कठिन कार्यक्षेत्र और उनके गिरते स्वास्थ्य की ओर ध्यान खींचा है। अनियमित ड्यूटी के घंटे, नींद की कमी, मानसिक तनाव और खान-पान में असंतुलन के कारण बिहार पुलिस के कई जवान कम उम्र में ही गंभीर बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं।

  • तनावपूर्ण जीवनशैली: पुलिसकर्मियों को अक्सर त्योहारों और पारिवारिक आयोजनों के समय भी छुट्टी नहीं मिल पाती, जिससे उनमें मानसिक तनाव बढ़ता है।
  • स्वास्थ्य की अनदेखी: ड्यूटी की व्यस्तता के कारण कई जवान अपनी बीमारियों का समय पर इलाज नहीं करा पाते।
  • पारिवारिक दबाव: अपनी जिम्मेदारियों को निभाने की जद्दोजहद में वे खुद के शरीर पर ध्यान देना भूल जाते हैं।

​विशेषज्ञों का मानना है कि सुरेश तिवारी जैसे मामले यह चेतावनी देते हैं कि पुलिस बल के भीतर नियमित स्वास्थ्य जांच और तनाव प्रबंधन (Stress Management) की व्यवस्था को और अधिक सुदृढ़ करने की आवश्यकता है।

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