पटना : कदमकुंआ के अपर थानाध्यक्ष रिश्वत लेते रंगे हाथ गिरफ्तार; निगरानी ब्यूरो के जाल में फंसे दरोगा अर्जुन यादव

पटना। बिहार की राजधानी पटना के हृदय स्थल कदमकुंआ थाना क्षेत्र में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक ऐसी कार्रवाई हुई है जिसने पुलिस महकमे के भीतर चल रहे ‘अंधेरे खेल’ को सरेआम उजागर कर दिया है। जहाँ एक ओर राज्य सरकार और पुलिस मुख्यालय जीरो टॉलरेंस की नीति का ढिंढोरा पीट रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कानून के रखवाले ही कानून की धज्जियां उड़ाने में मग्न हैं। ताजा मामला कदमकुंआ थाना का है, जहाँ के अपर थानाध्यक्ष अर्जुन यादव को निगरानी अन्वेषण ब्यूरो की टीम ने घूस लेते हुए रंगे हाथों दबोच लिया है। यह गिरफ्तारी किसी सुदूर इलाके में नहीं, बल्कि शहर के वीआईपी माने जाने वाले जस्टिस राज किशोर पथ पर की गई। इस कार्रवाई के बाद न केवल कदमकुंआ थाना बल्कि पूरे पटना पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया है। दरोगा अर्जुन यादव पर आरोप है कि उन्होंने एक मामले के निपटारे के एवज में एक स्थानीय व्यक्ति से मोटी रकम की डिमांड की थी, जिसे पूरा न कर पाने पर पीड़ित ने भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग छेड़ने का मन बना लिया।

जस्टिस राज किशोर पथ पर बिछाया गया ‘शिकारी जाल’

​गुरुवार, 30 अप्रैल 2026 की सुबह जब कदमकुंआ थाना इलाके के जस्टिस राज किशोर पथ पर चहल-पहल शुरू हुई थी, तभी निगरानी अन्वेषण ब्यूरो के जांबाज अधिकारी सादे लिबास में अपनी पोजीशन ले चुके थे। ब्यूरो को पहले ही सूचना मिल चुकी थी कि अपर थानाध्यक्ष अर्जुन यादव रिश्वत की रकम लेने के लिए किसी खास जगह पर पहुँचने वाले हैं। जैसे ही रिश्वत का लेन-देन शुरू हुआ और अर्जुन यादव ने नोटों की गड्डी थामी, वैसे ही घेराबंदी कर खड़ी निगरानी टीम ने उन्हें दबोच लिया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, एक पल के लिए दरोगा को समझ ही नहीं आया कि उनके साथ क्या हुआ है। जब तक वे अपनी सरकारी हनक का इस्तेमाल करते, तब तक निगरानी विभाग के अधिकारियों ने उनके हाथों को रसायनों से धुलवाकर रिश्वत के सबूत पक्के कर लिए थे। यह पूरी कार्रवाई इतनी बिजली की तेजी से हुई कि आसपास के लोगों को भनक तक नहीं लगी कि खाकी वर्दी में तैनात एक रसूखदार अधिकारी अब सलाखों के पीछे जाने की तैयारी में है।

एक केस के निपटारे की ‘कीमत’ और पीड़ित का साहस

​इस पूरी कहानी की शुरुआत एक स्थानीय व्यक्ति की शिकायत से हुई। जानकारी के अनुसार, कदमकुंआ थाने में एक मामला दर्ज था जिसके विवेचक या सुपरवाइजर के तौर पर अर्जुन यादव कार्यरत थे। केस को रफा-दफा करने या डायरी में राहत देने के नाम पर दरोगा ने पीड़ित से ‘सुविधा शुल्क’ की मांग की थी। पीड़ित व्यक्ति बार-बार दरोगा के चक्कर काटकर थक चुका था, लेकिन अर्जुन यादव बिना ‘मोटी रकम’ के टस से मस होने को तैयार नहीं थे। जब पानी सिर से ऊपर चला गया, तो उस व्यक्ति ने भ्रष्टाचार के इस संगठित तंत्र के सामने झुकने के बजाय पटना स्थित निगरानी अन्वेषण ब्यूरो के कार्यालय का दरवाजा खटखटाया। ब्यूरो ने शुरुआती जांच में शिकायत को सही पाया और तुरंत एक विशेष टीम का गठन कर जाल बिछा दिया। यह गिरफ्तारी इस बात का प्रमाण है कि अगर आम जनता हिम्मत दिखाए, तो वर्दी के पीछे छिपे भ्रष्ट चेहरों को बेनकाब करना नामुमकिन नहीं है।

हिरासत में गहन पूछताछ: खुल सकते हैं कई और राज

​गिरफ्तारी के तुरंत बाद निगरानी की टीम अर्जुन यादव को अपने साथ लेकर गुप्त स्थान पर रवाना हो गई। वर्तमान में उनसे गहन पूछताछ की जा रही है। निगरानी ब्यूरो के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि दरोगा अर्जुन यादव के पास से कुछ महत्वपूर्ण दस्तावेज और जानकारियां प्राप्त हुई हैं। ब्यूरो इस बात की भी जांच कर रहा है कि क्या इस रिश्वतखोरी के खेल में थाने के कुछ अन्य पुलिसकर्मी या कोई ‘सफेदपोश’ भी शामिल था। अक्सर देखा जाता है कि थानों में चल रहे वसूली के सिंडिकेट में ऊपर से नीचे तक एक चेन बनी होती है। निगरानी विभाग अब अर्जुन यादव की चल-अचल संपत्ति का ब्योरा भी खंगालने की तैयारी में है ताकि यह पता लगाया जा सके कि उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान कितनी काली कमाई जमा की है।

पुलिस महकमे में हड़कंप: सुशासन के दावों पर सवाल

​पटना पुलिस के लिए यह घटना किसी बड़े झटके से कम नहीं है। कदमकुंआ जैसे महत्वपूर्ण थाने के अपर थानाध्यक्ष का इस तरह रिश्वत लेते पकड़ा जाना पुलिस की छवि पर एक गहरा दाग है। घटना की खबर मिलते ही एसएसपी और अन्य वरीय अधिकारी मामले की जानकारी लेने में जुट गए हैं। थानों में पदस्थापित दरोगा और इंस्पेक्टरों के बीच इस गिरफ्तारी को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं हो रही हैं। आम लोगों में यह संदेश गया है कि रक्षक ही भक्षक की भूमिका में हैं। सवाल यह भी उठता है कि क्या केवल एक अधिकारी की गिरफ्तारी से सिस्टम सुधर जाएगा? राजधानी के थानों में पैरवी और पैसों के बिना काम न होने की शिकायतें आम हैं, लेकिन अर्जुन यादव की गिरफ्तारी ने यह साबित कर दिया है कि निगरानी ब्यूरो की नजर अब शहर के ‘बड़े थानों’ पर भी टेढ़ी हो चुकी है।

निगरानी ब्यूरो का कड़ा संदेश: भ्रष्टाचार पर ‘जीरो टॉलरेंस’

​निगरानी अन्वेषण ब्यूरो ने इस सफल कार्रवाई के बाद स्पष्ट कर दिया है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ उनका अभियान रुकने वाला नहीं है। ब्यूरो के एक अधिकारी ने बताया कि पिछले कुछ महीनों में राजस्व विभाग और पुलिस विभाग के कई बड़े अधिकारियों को जाल बिछाकर पकड़ा गया है। अर्जुन यादव की गिरफ्तारी इस कड़ी का एक हिस्सा है। ब्यूरो ने आम नागरिकों से अपील की है कि यदि कोई भी सरकारी सेवक काम के बदले पैसों की मांग करता है, तो डरे नहीं और तुरंत इसकी सूचना विभाग को दें। कदमकुंआ की यह घटना उन तमाम पुलिस अधिकारियों के लिए एक बड़ी चेतावनी है जो अपनी वर्दी की हनक में यह भूल जाते हैं कि उनकी सैलरी जनता के टैक्स से आती है, न कि अवैध वसूली से।

भ्रष्टाचार की जड़ें और बदलता बिहार

​बिहार में हाल के वर्षों में निगरानी विभाग की सक्रियता बढ़ी है, लेकिन इसके बावजूद घूसखोरी के मामले कम होने का नाम नहीं ले रहे हैं। भागलपुर से लेकर पटना तक, हर जिले में अधिकारियों के ‘रेट कार्ड’ फिक्स होने की खबरें आती रहती हैं। अर्जुन यादव जैसे अधिकारियों का पकड़ा जाना व्यवस्था की एक छोटी सी जीत है, लेकिन पूर्ण विजय तब होगी जब थानों की कार्यप्रणाली को पूरी तरह पारदर्शी बनाया जाएगा। जस्टिस राज किशोर पथ पर आज जो हुआ, वह केवल एक दरोगा की गिरफ्तारी नहीं थी, बल्कि यह उस व्यवस्था पर तमाचा था जो आम आदमी को न्याय के बदले नीलामी की मेज पर बिठा देती है। अब देखना यह होगा कि कोर्ट में अर्जुन यादव के खिलाफ निगरानी विभाग कितनी मजबूती से साक्ष्य पेश कर पाता है और इस कांड में शामिल अन्य चेहरों से कब नकाब हटता है।

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