
पटना। राजधानी के जक्कनपुर थाना क्षेत्र अंतर्गत खासमहल में गुरुवार की सुबह जो आग की लपटें उठी थीं, उन्होंने न केवल एक आशियाने को जलाया, बल्कि एक गरीब पिता के जीवन भर की उम्मीदों और सपनों को भी राख कर दिया। गैस रिसाव के कारण हुए उस भीषण अग्निकांड में बुरी तरह झुलसे भाई-बहन, सन्नी कुमार (16) और अंजनी कुमारी (14) ने आखिरकार जिंदगी की जंग हार दी। शुक्रवार को कंकड़बाग स्थित एक निजी अस्पताल में इलाज के दौरान दोनों ने दम तोड़ दिया। इस हृदयविदारक घटना ने पूरे इलाके को शोक में डुबो दिया है। जहाँ एक ओर परिवार अपने दो चिरागों के बुझने से टूट चुका है, वहीं दूसरी ओर सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। परिजनों का सीधा आरोप है कि बिहार के सबसे बड़े अस्पताल पीएमसीएच में यदि समय पर और संवेदनशीलता के साथ इलाज मिला होता, तो शायद आज सन्नी और अंजनी जीवित होते। घटना के बाद से पिता राजेश कुमार केसरी की आंखें पथरा गई हैं और उनका ईश्वर पर से विश्वास डगमगा गया है।
सुबह की चाय और काल बना गैस सिलेंडर
यह घटना गुरुवार सुबह करीब 8.15 बजे की है। खासमहल रोड नंबर दो स्थित शंभू शरण अग्रवाल के मकान में पिछले 11 वर्षों से किराए पर रह रहे राजेश कुमार केसरी का परिवार रोज की तरह अपनी दिनचर्या में जुटा था। राजेश कुमार अपनी आजीविका चलाने के लिए सुबह ही ऑटो लेकर निकल गए थे। घर पर उनकी पत्नी पूनम देवी अपने दोनों बच्चों को कोचिंग और स्कूल भेजने की तैयारी कर रही थी। पूनम देवी रसोई में बच्चों के लिए पूड़ी छान रही थीं, तभी अचानक गैस सिलेंडर से रिसाव शुरू हो गया। देखते ही देखते पूरा कमरा आग की लपटों से घिर गया।
आग इतनी तेजी से फैली कि किसी को संभलने का मौका नहीं मिला। बच्चों को बचाने की कोशिश में मां पूनम देवी भी बुरी तरह झुलस गईं। चीख-पुकार सुनकर आसपास के लोग जमा हुए और किसी तरह आग पर काबू पाकर तीनों को बाहर निकाला। उस वक्त तीनों की हालत नाजुक थी। आनन-फानन में उन्हें पीएमसीएच ले जाया गया, जहाँ से शुरू हुआ लापरवाही और बदइंतजामी का वह सिलसिला, जिसने इस त्रासदी को और भी भयावह बना दिया।
पीएमसीएच की संवेदनहीनता: तड़पते रहे मासूम, नहीं बदला गया पानी
राजेश कुमार केसरी के बड़े भाई राजू कुमार केसरी ने जो आपबीती सुनाई, वह बिहार की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था का काला चेहरा उजागर करती है। उन्होंने बताया कि हादसे के तुरंत बाद वे तीनों को लेकर पीएमसीएच पहुँचे थे। उन्हें उम्मीद थी कि इतने बड़े सरकारी अस्पताल में बेहतर इलाज मिलेगा, लेकिन वहां का नजारा कुछ और ही था। सन्नी और अंजनी दर्द से कराह रहे थे, लेकिन डॉक्टर और कर्मचारी अपनी ही दुनिया में मस्त थे।
परिजनों का आरोप है कि बच्चों की स्थिति गंभीर होने के बावजूद नर्स और कर्मचारी वार्ड में झांकने तक नहीं आ रहे थे। राजू केसरी ने बताया कि “चढ़ाया गया पानी (IV Fluids) खत्म हो चुका था, लेकिन बार-बार गुहार लगाने के बावजूद कोई उसे बदलने वाला नहीं था।” जब परिजनों ने विरोध किया, तो उन्हें अनसुना कर दिया गया। सरकारी सिस्टम की इस बेरुखी से तंग आकर और बच्चों की जान बचाने की छटपटाहट में परिजन उन्हें कंकड़बाग स्थित एक निजी अस्पताल ले गए। लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। सन्नी और अंजनी के शरीर का काफी हिस्सा झुलस चुका था और संक्रमण तेजी से फैल गया था। शुक्रवार को दोनों ने एक-एक कर दम तोड़ दिया।
सपनों का कत्ल: मेधावी सन्नी और लाडली अंजली का अंत
राजेश कुमार केसरी के लिए सन्नी केवल उनका बेटा नहीं था, बल्कि उनकी गरीबी दूर करने का एक जरिया और बुढ़ापे की लाठी था। सन्नी पढ़ाई में अत्यंत मेधावी था। उसने हाल ही में प्रथम श्रेणी से मैट्रिक की परीक्षा पास की थी। वह आगे विज्ञान (Science) लेकर इंटर की पढ़ाई करना चाहता था और उसका सपना बड़ा होकर अपने परिवार को एक बेहतर जिंदगी देना था। 16 साल की उम्र में ही उसने अपनी मेहनत और लगन से पिता का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया था।
वहीं, 14 वर्षीय अंजली कुमारी न्यू स्टैंडर्ड एकेडमी में आठवीं कक्षा की छात्रा थी। घर की लाडली अंजली की मौत ने पिता को इस कदर तोड़ दिया है कि वे बार-बार यही कह रहे हैं कि “भगवान ने मेरी दुनिया ही उजाड़ दी।” राजेश कुमार केसरी ने नम आंखों से बताया कि वे पिछले 11 साल से एक छोटे से कमरे में रहकर मेहनत कर रहे थे ताकि बच्चों को अच्छी शिक्षा दे सकें। लेकिन एक पल के गैस रिसाव ने सब कुछ खत्म कर दिया। सन्नी और अंजली का अंतिम संस्कार फतुहा घाट पर गमगीन माहौल में किया गया।
इलाजरत मां और पथरा गई पिता की आंखें
जहाँ सन्नी और अंजली अब इस दुनिया में नहीं रहे, वहीं उनकी मां पूनम देवी अभी भी कंकड़बाग के उसी निजी अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच झूल रही हैं। डॉक्टरों के मुताबिक, फिलहाल पूनम देवी की हालत स्थिर और खतरे से बाहर है, लेकिन उन्हें अभी तक यह नहीं बताया गया है कि उनके कलेजे के दोनों टुकड़े अब इस दुनिया में नहीं रहे। अस्पताल के बिस्तर पर पड़ी मां बार-बार अपने बच्चों के बारे में पूछती है, जिसका जवाब किसी के पास नहीं है।
राजेश कुमार केसरी की स्थिति विक्षिप्त जैसी हो गई है। उनके दोनों भाई, जो पटना में ही निजी काम करते हैं, उन्हें संभालने की कोशिश कर रहे हैं। राजेश के लिए अब जीवन का कोई अर्थ नहीं बचा है। वे कहते हैं कि “यदि एक बच्चा भी बच जाता तो मैं अपनी सारी मेहनत सफल समझता, लेकिन अब किसके लिए जीऊंगा?” मूलरूप से नालंदा के इस्लामपुर निवासी राजेश कुमार का ननिहाल जहानाबाद के घोसी में है, जहाँ से भी रिश्तेदार इस दुख की घड़ी में पटना पहुँच रहे हैं।
गैस सुरक्षा और सरकारी जवाबदेही पर बड़े सवाल
खासमहल की यह घटना केवल एक हादसा नहीं है, बल्कि यह सुरक्षा मानकों के प्रति हमारी लापरवाही और सरकारी व्यवस्था की विफलता का प्रतीक है। अक्सर घनी आबादी वाले इलाकों में छोटे कमरों में रसोई गैस का उपयोग बिना वेंटिलेशन और बिना सुरक्षा जांच के किया जाता है। गैस सिलेंडर से रिसाव की स्थिति में क्या करना चाहिए, इसके प्रति जागरूकता की कमी आज दो मासूमों की जान ले चुकी है।
साथ ही, पीएमसीएच जैसे संस्थानों की भूमिका पर भी राज्य सरकार को विचार करना होगा। यदि एक गंभीर रूप से झुलसा हुआ मरीज सरकारी अस्पताल में पानी (ड्रिप) बदलने के लिए भी कर्मचारियों का मोहताज है, तो सुशासन के दावों की पोल खुल जाती है। खासमहल रोड नंबर दो पर पसरा सन्नाटा आज पटना प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग से जवाब मांग रहा है।
राजेश कुमार केसरी के घर पर परिजनों के आने-जाने का तांता लगा हुआ है, लेकिन सांत्वना के शब्द उस खालीपन को नहीं भर सकते जो सन्नी और अंजली के जाने से पैदा हुआ है। जक्कनपुर पुलिस ने मामले की जानकारी ली है, लेकिन यह कानूनी खानापूर्ति उस दर्द का इलाज नहीं है जो एक ऑटो चालक पिता के सीने में धधक रहा है। पटना का आसमान आज इस परिवार के आंसुओं के साथ भारी है।


