​पटना IG का कड़ा एक्शन: शराब कांड में लापरवाही पर DSP, थानेदार और दारोगा से शोकॉज

पटना। बिहार में शराबबंदी कानून को प्रभावी ढंग से लागू करने और तस्करों के नेटवर्क को ध्वस्त करने के दावों के बीच पुलिस महकमे के भीतर से ही लापरवाही की एक बड़ी तस्वीर सामने आई है। पटना प्रक्षेत्र के पुलिस महानिरीक्षक (IG) जितेंद्र राणा ने कर्तव्य के प्रति उदासीनता और अनुसंधान में शिथिलता बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनाते हुए बड़ी कार्रवाई की है। आईजी ने पटना सिटी डीएसपी-1, अगमकुआं थानाध्यक्ष और संबंधित कांड के अनुसंधानकर्ता दारोगा को कारण बताओ नोटिस (शोकॉज) जारी किया है। यह कार्रवाई शराब तस्करों की गिरफ्तारी न होने और दर्ज मुकदमों की जांच में बरती गई घोर अनियमितताओं के कारण की गई है। शुक्रवार को हुई एक उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक में आईजी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वर्दी की हनक केवल अपराधियों के लिए होनी चाहिए, न कि फाइलों को दबाने के लिए। इस आदेश के बाद राजधानी के पुलिस गलियारों में हड़कंप मच गया है, क्योंकि आईजी ने स्पष्ट पूछा है कि क्यों न इस लापरवाही के लिए उन पर विभागीय गाज गिराई जाए।

समीक्षा बैठक में फूटा आईजी का गुस्सा: अगमकुआं थाने की खुली पोल

​शुक्रवार को आईजी जितेंद्र राणा अपने कार्यालय कक्ष में पटना के सिटी एसपी पूर्वी और पश्चिमी क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले सभी डीएसपी और थानाध्यक्षों के साथ अपराध समीक्षा बैठक कर रहे थे। बैठक का मुख्य एजेंडा शराबबंदी कानून के तहत दर्ज मामलों की वर्तमान स्थिति और फरार तस्करों की कुंडली खंगालना था। जैसे ही अगमकुआं थाने के अंतर्गत लंबित कांडों की फाइलें खुलीं, आईजी का पारा चढ़ गया। समीक्षा में पाया गया कि कई ऐसे मामले हैं जिनमें तस्करों की पहचान हो चुकी है, लेकिन महीनों बीत जाने के बाद भी उनकी गिरफ्तारी के लिए कोई ठोस प्रयास नहीं किए गए।

​आईजी ने पाया कि अगमकुआं थाने में शराब से जुड़े कांडों के अनुसंधान (Investigation) में नियमों की धज्जियां उड़ाई गई हैं। जांच की प्रक्रिया इतनी सुस्त थी कि अपराधी खुलेआम घूम रहे थे और पुलिस कागजों में अपनी खानापूर्ति कर रही थी। उन्होंने सिटी डीएसपी-1 और थानाध्यक्ष से जवाब तलब किया कि जब मुख्यालय से स्पष्ट निर्देश हैं, तो फिर तस्करों को किसका संरक्षण मिल रहा है? अनुसंधानकर्ता दारोगा की कार्यशैली पर भी सवाल उठाते हुए आईजी ने कहा कि साक्ष्यों के संकलन में देरी जानबूझकर की गई प्रतीत होती है, जो अपराधियों को लाभ पहुँचाने जैसा है।

शोकॉज की ‘सर्जिकल स्ट्राइक’: इन अधिकारियों पर गिरी गाज

​आईजी जितेंद्र राणा की इस कार्रवाई की जद में पटना सिटी के तीन महत्वपूर्ण पद आए हैं:

  • पटना सिटी डीएसपी-1: अनुमंडल स्तर पर कानून व्यवस्था और जांच की निगरानी की जिम्मेदारी डीएसपी की होती है। आईजी ने उनसे पूछा है कि उनके अधिकार क्षेत्र में आने वाले अगमकुआं थाने में इतनी बड़ी लापरवाही कैसे होती रही और उन्होंने इस पर संज्ञान क्यों नहीं लिया।
  • अगमकुआं थानाध्यक्ष: थाने के मुखिया होने के नाते हर कांड के समयबद्ध निपटारे और अपराधियों की धरपकड़ की प्राथमिक जिम्मेदारी उनकी थी। आईजी ने उनके नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए शोकॉज जारी किया है।
  • अनुसंधानकर्ता दारोगा: केस की डायरी लिखने और साक्ष्यों को अदालत के समक्ष पेश करने का जिम्मा दारोगा का था। दारोगा द्वारा जांच में देरी करना और तस्करों को पकड़ने में विफल रहना उनकी पेशेवर ईमानदारी पर सवाल खड़े कर रहा है।

​आईजी ने इन तीनों अधिकारियों से बिंदुवार स्पष्टीकरण मांगा है। उन्होंने पूछा है कि किन परिस्थितियों में कांडों का निपटारा लंबित रखा गया और क्या इसके पीछे कोई अन्य संदेहास्पद कारण हैं। यदि अधिकारियों का जवाब संतोषजनक नहीं पाया गया, तो उनके खिलाफ कठोर अनुशासनात्मक कार्रवाई या निलंबन की अनुशंसा भी की जा सकती है।

15 दिनों का अल्टीमेटम: ‘अब बहानेबाजी नहीं, गिरफ्तारी चाहिए’

​महज शोकॉज जारी कर आईजी शांत नहीं बैठे हैं, बल्कि उन्होंने पुलिस अधिकारियों को एक ‘डेडलाइन’ भी थमा दी है। जितेंद्र राणा ने कड़ा निर्देश दिया है कि अगले 15 दिनों के भीतर उन सभी फरार शराब तस्करों की गिरफ्तारी सुनिश्चित की जाए जो पिछले लंबे समय से पुलिस को चकमा दे रहे हैं। आईजी ने स्पष्ट किया कि लंबित कांडों का निपटारा केवल कागजों पर नहीं, बल्कि धरातल पर अपराधियों को जेल भेजकर करना होगा।

​बैठक के दौरान आईजी ने चेतावनी दी कि यदि 15 दिनों के बाद दोबारा समीक्षा की गई और स्थिति वैसी ही पाई गई, तो थानाध्यक्षों की कुर्सी छिनना तय है। उन्होंने कहा कि पुलिस की सुस्ती के कारण ही तस्करों का मनोबल बढ़ता है। पटना जैसे संवेदनशील जिले में, जहाँ शराब की बड़ी खेप पकड़ी जाती रही है, वहां पुलिस का इस तरह ढीला रवैया किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने फरार तस्करों की संपत्ति कुर्क करने और उन पर इनाम घोषित करने जैसी प्रक्रियाओं में भी तेजी लाने को कहा है।

बिहार में शराबबंदी और पुलिस की दोहरी भूमिका

​बिहार में शराबबंदी कानून लागू हुए एक लंबा अरसा बीत चुका है, लेकिन समय-समय पर पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठते रहे हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कड़े रुख के बावजूद धरातल पर पुलिस और तस्करों के बीच ‘सांठगांठ’ के आरोप लगते रहते हैं। आईजी जितेंद्र राणा की यह कार्रवाई इसी छवि को सुधारने की एक कोशिश है। जब एक आईजी स्तर का अधिकारी अपने अधीनस्थों पर शिकंजा कसता है, तो इसका संदेश बहुत गहरा होता है।

​पटना सिटी का इलाका घनी आबादी वाला है और यहाँ शराब के अवैध कारोबार के कई नेटवर्क सक्रिय रहे हैं। अगमकुआं जैसे महत्वपूर्ण थाने में लापरवाही का मतलब है कि पूरे क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था के साथ समझौता। आईजी ने बैठक में यह भी निर्देश दिया कि केवल शराब पकड़ने से काम नहीं चलेगा, बल्कि उस सिंडिकेट के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचना होगा जो इस काले कारोबार का वित्तपोषण (Funding) कर रहा है।

तकनीकी अनुसंधान और पेशेवर दक्षता की कमी

​आईजी की समीक्षा में एक और बड़ी बात सामने आई कि पुलिस अधिकारी तकनीकी संसाधनों का उपयोग करने में रुचि नहीं दिखा रहे हैं। कॉल डिटेल्स रिकॉर्ड (CDR), मोबाइल लोकेशन और सर्विलांस जैसे साधनों के बावजूद तस्करों का फरार रहना पुलिस की अक्षमता को दर्शाता है। जितेंद्र राणा ने निर्देश दिया कि अनुसंधानकर्ता दारोगा को अपनी डायरी और जांच की गुणवत्ता में सुधार करना होगा। अक्सर देखा जाता है कि कमजोर जांच के कारण अपराधी अदालत से आसानी से जमानत पा लेते हैं।

​आईजी ने सिटी एसपी को भी निर्देश दिया कि वे व्यक्तिगत रूप से ऐसे कांडों की निगरानी करें। उन्होंने कहा कि डीएसपी स्तर के अधिकारियों को केवल दफ्तर में बैठकर रिपोर्ट नहीं देखनी चाहिए, बल्कि उन्हें फील्ड में जाकर यह देखना चाहिए कि छापेमारी की कार्रवाई कितनी ईमानदार है। अगमकुआं थाने की लापरवाही को एक ‘केस स्टडी’ के रूप में लेते हुए आईजी ने पटना के अन्य थानों को भी सचेत किया है कि उनकी नजर हर फाइल पर है।

खाकी की साख पर सवाल और भविष्य की रणनीति

​जितेंद्र राणा का यह कदम पटना पुलिस के लिए एक ‘वेक अप कॉल’ की तरह है। पिछले कुछ समय में राजधानी में अपराध के ग्राफ और शराब तस्करी की घटनाओं ने सरकार की किरकिरी कराई थी। आईजी का यह सख्त तेवर इस बात का संकेत है कि अब ‘ऊपर’ से दबाव बढ़ रहा है। पुलिस मुख्यालय अब उन थानों की सूची तैयार कर रहा है जहाँ कांडों के लंबित रहने की दर सबसे अधिक है।

​अगमकुआं थानाध्यक्ष और संबंधित दारोगा के लिए अगले 15 दिन अग्निपरीक्षा जैसे होंगे। यदि वे वांछित तस्करों को पकड़ने में सफल रहते हैं, तभी वे अपनी साख बचा पाएंगे। आईजी ने यह भी साफ किया कि शराबबंदी कानून की सफलता केवल पुलिस के नंबरों (कितनी शराब पकड़ी गई) से नहीं, बल्कि इस बात से आंकी जाएगी कि कितने मुख्य सरगना सलाखों के पीछे पहुँचे।

​18 अप्रैल की यह कार्रवाई पटना के अन्य थानों के लिए भी एक सबक है। आईजी जितेंद्र राणा ने बैठक का समापन इस संकल्प के साथ किया कि सुशासन में ढिलाई के लिए कोई स्थान नहीं है। अब देखना यह होगा कि 15 दिनों के बाद होने वाली अगली समीक्षा बैठक में पटना पुलिस का रिपोर्ट कार्ड कैसा रहता है और क्या शोकॉज किए गए अधिकारी अपनी जिम्मेदारी को गंभीरता से लेते हैं। फिलहाल, आईजी के इस हंटर ने पटना की पुलिसिंग में एक नई हलचल पैदा कर दी है।

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