Anganwadi Workers Mobile: बिहार की आंगनबाड़ी सेविकाओं और सहायिकाओं को मिलेंगे एंड्रॉइड मोबाइल; मंत्री बिजेंद्र यादव ने किया दिव्यांगता जांच अनुसूची का शुभारंभ

पटना। बिहार के आंगनबाड़ी केंद्रों को अब डिजिटल शक्ति से लैस करने की दिशा में सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है। राज्य की हजारों आंगनबाड़ी सेविकाओं और सहायिकाओं के लिए जल्द ही एक अच्छी खबर आने वाली है। पटना के ज्ञान भवन में आयोजित पोषण पखवाड़ा-2026 के समापन समारोह में यह घोषणा की गई कि आगामी दो महीनों के भीतर राज्य की सभी आंगनबाड़ी सेविकाओं और सहायिकाओं को एंड्रॉइड आधारित नए मोबाइल फोन उपलब्ध कराए जाएंगे। उपमुख्यमंत्री सह समाज कल्याण मंत्री बिजेंद्र प्रसाद यादव की उपस्थिति में आयोजित इस राज्य स्तरीय कार्यशाला में न केवल आंगनबाड़ी कर्मियों के सशक्तिकरण पर जोर दिया गया, बल्कि बच्चों के स्वास्थ्य और विकास को लेकर कई महत्वपूर्ण प्रोटोकॉल भी लॉन्च किए गए। शनिवार, 25 अप्रैल 2026 को संपन्न हुए इस कार्यक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया कि बिहार अब कुपोषण से लड़ने के साथ-साथ जमीनी स्तर पर तकनीकी हस्तक्षेप को भी प्राथमिकता दे रहा है।

स्मार्ट आंगनबाड़ी: दो महीने में मिलेगा तकनीकी उपहार

​समाज कल्याण विभाग की सचिव बंदना प्रेयषी ने कार्यशाला के दौरान एक बड़ा एलान करते हुए कहा कि आंगनबाड़ी व्यवस्था को और अधिक पारदर्शी और प्रभावी बनाने के लिए डिजिटल टूल्स का होना अनिवार्य है। इसी कड़ी में अगले दो महीनों के भीतर सभी सेविकाओं और सहायिकाओं को उच्च क्षमता वाले एंड्रॉइड मोबाइल फोन दिए जाएंगे। इन मोबाइल फोन के माध्यम से ‘पोषण ट्रैकर’ (Poshan Tracker) ऐप का उपयोग करना और भी आसान हो जाएगा, जिससे बच्चों और गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी डेटा की रियल-टाइम मॉनिटरिंग संभव हो सकेगी।

​यह पहल केवल मोबाइल देने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन महिलाओं को तकनीकी रूप से साक्षर बनाने और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में होने वाली कागजी देरी को कम करने का एक बड़ा माध्यम बनेगी। आंगनबाड़ी कर्मियों ने इस घोषणा का स्वागत किया है, क्योंकि इससे उन्हें अपनी रिपोर्टिंग और दैनिक कार्यों को प्रबंधित करने में काफी सुविधा होगी।

दिव्यांगता जांच अनुसूची (DSS) का शुभारंभ: 0-6 वर्ष के बच्चों पर विशेष नजर

​उपमुख्यंत्री बिजेंद्र यादव ने इस अवसर पर दिव्यांगता प्रोटोकॉल तथा दिव्यांगता जांच अनुसूची (DSS) का औपचारिक शुभारंभ किया। यह बिहार के स्वास्थ्य और बाल विकास क्षेत्र में एक मील का पत्थर साबित होने वाला है। मंत्री ने बताया कि ‘डीएसएस’ (Disability Screening Schedule) एक अत्यंत सरल चेकलिस्ट है, जिसे विशेष रूप से आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के लिए डिजाइन किया गया है।

​इस चेकलिस्ट की मदद से आंगनबाड़ी सेविकाएं 0-6 वर्ष तक के बच्चों में निम्नलिखित छह क्षेत्रों में विकासात्मक देरी की पहचान कर सकेंगी:

  1. मोटर विकास (शारीरिक गतिविधियां)
  2. भाषा और संचार कौशल
  3. संज्ञानात्मक विकास (सोचने-समझने की क्षमता)
  4. सामाजिक-भावनात्मक व्यवहार
  5. दृष्टि (Vision)
  6. श्रवण (Hearing)

​मंत्री ने स्पष्ट किया कि समय पर इन विकारों की पहचान होने से बच्चों का इलाज आसान होगा। इसके लिए आंगनबाड़ी कर्मियों, आशा, एएनएम और आरबीएसके (RBSK) टीम के बीच एक मजबूत रेफरल प्रणाली स्थापित की जा रही है, जो सीधे जिला प्रारंभिक हस्तक्षेप केंद्रों (DEIC) से जुड़ी होगी।

डिजिटल संवाद: “हमारे बच्चे, हमारा परिवार” व्हाट्सएप चैनल

​आज के दौर में सूचनाओं का तेजी से पहुँचना बेहद जरूरी है। इसी को ध्यान में रखते हुए विभाग ने “हमारे बच्चे, हमारा परिवार” नाम से एक व्हाट्सएप कम्युनिटी चैनल का लोकार्पण किया। इस चैनल का मुख्य उद्देश्य अभिभावकों को बच्चों के पोषण, प्रारंभिक शिक्षा, मस्तिष्क विकास और देखभाल से जुड़ी सटीक जानकारियां सीधे उनके मोबाइल पर उपलब्ध कराना है।

​सचिव बंदना प्रेयषी ने इस पहल पर प्रकाश डालते हुए बताया कि वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, बच्चे के जीवन के पहले 6 वर्ष उसके भविष्य की सबसे मजबूत नींव होते हैं। लगभग 85 प्रतिशत मस्तिष्क विकास इसी अवधि में पूरा हो जाता है। यदि इस दौरान बच्चों को उचित पोषण, खेल-आधारित शिक्षा और सही संवाद नहीं मिलता, तो उनके बौद्धिक विकास पर स्थायी असर पड़ सकता है। व्हाट्सएप चैनल के माध्यम से परिवारों को खेल-आधारित सीख और स्क्रीन टाइम (मोबाइल देखने की अवधि) कम करने जैसे विषयों पर जागरूक किया जाएगा।

पोषण के मोर्चे पर बिहार की ‘नेशनल हैट्रिक’: देशभर में प्रथम स्थान

​कार्यशाला में बिहार की उपलब्धियों पर गर्व व्यक्त करते हुए बताया गया कि पोषण पखवाड़ा-2026 के दौरान राज्य ने राष्ट्रीय स्तर पर एक बार फिर अपना परचम लहराया है। पूरे बिहार में लगभग 71 लाख से अधिक गतिविधियां आयोजित की गई हैं। यह लगातार दूसरा वर्ष है जब बिहार ने राष्ट्रीय स्तर पर प्रथम स्थान प्राप्त किया है; इससे पहले पोषण माह-2025 में भी बिहार देशभर में अव्वल रहा था।

​बिहार की इस सफलता के पीछे आंगनबाड़ी केंद्रों पर आयोजित गोदभराई, अन्नप्राशन, पोषण रैलियां, और माता समितियों की बैठकों का बड़ा योगदान रहा। पखवाड़े के दौरान मुख्य रूप से पांच क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया गया:

  • ​मातृ एवं शिशु पोषण।
  • ​0-3 वर्ष के बच्चों का मस्तिष्क विकास।
  • ​3-6 वर्ष के बच्चों के लिए खेल-आधारित शिक्षा (ECCE)।
  • ​स्क्रीन टाइम में कमी लाने का अभियान।
  • ​आंगनबाड़ी केंद्रों का भौतिक सुदृढ़ीकरण।

कुपोषण के खिलाफ जंग: क्या कहते हैं मार्च 2026 के आंकड़े?

​बिहार में कुपोषण की स्थिति में क्रांतिकारी सुधार देखा जा रहा है। सरकार द्वारा प्रस्तुत तुलनात्मक आंकड़े बताते हैं कि एनएफएचएस-5 (NFHS-5) की तुलना में मार्च 2026 के ‘पोषण ट्रैकर’ डेटा में भारी गिरावट दर्ज की गई है:

मानक (Category)

एनएफएचएस-5 (NFHS-5)

पोषण ट्रैकर (मार्च 2026)

स्टंटिंग (उम्र के अनुसार कम लंबाई)

42.9%

40.60%

अंडरवेट (उम्र के अनुसार कम वजन)

41.0%

19.2%

वेस्टिंग (लंबाई के अनुसार कम वजन)

22.9%

7.7%

ये आंकड़े गवाह हैं कि आंगनबाड़ी केंद्रों पर दी जा रही पूरक पोषाहार व्यवस्था और स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ अब धरातल पर दिखने लगा है। विशेष रूप से अंडरवेट और वेस्टिंग के आंकड़ों में आई भारी कमी बिहार के स्वास्थ्य भविष्य के लिए सुखद संकेत है।

विद्यारंभ प्रमाण पत्र और कर्मियों की सराहना

​समारोह के दौरान एक भावुक क्षण तब आया जब मंत्री ने प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल एवं शिक्षा (ECCE) के तहत 6 वर्ष की आयु पूर्ण कर चुके बच्चों को ‘विद्यारंभ प्रमाण पत्र’ वितरित किए। यह प्रमाण पत्र इस बात का प्रतीक है कि बच्चे अब औपचारिक स्कूली शिक्षा (पहली कक्षा) के लिए पूरी तरह तैयार हैं।

​मंत्री ने आंगनबाड़ी सेविकाओं, सहायिकाओं और विभाग के अन्य कर्मियों के कठिन परिश्रम की सराहना करते हुए कहा कि वे समाज की असली ‘कोरोना वारियर्स’ और ‘पोषण वारियर्स’ हैं। उनकी मेहनत के कारण ही आज बिहार राष्ट्रीय पटल पर प्रथम स्थान प्राप्त कर सका है। उन्होंने कहा कि विभाग उनके मानदेय और सुविधाओं को लेकर हमेशा संवेदनशील रहा है और मोबाइल देने का फैसला इसी दिशा में एक कदम है।

निष्कर्ष: विकसित बिहार की मजबूत नींव

​अंततः, 25 अप्रैल 2026 का यह कार्यक्रम बिहार के भविष्य के लिए एक नई दिशा तय करने वाला साबित हुआ है। आंगनबाड़ी केंद्रों को केवल भोजन वितरण का केंद्र न मानकर उन्हें बच्चों के सर्वांगीण विकास (शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक) के केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है। दिव्यांगता की प्रारंभिक पहचान के लिए डीएसएस (DSS) का लॉन्च होना यह सुनिश्चित करेगा कि कोई भी बच्चा अपनी शारीरिक या मानसिक बाधाओं के कारण पीछे न छूटे।

​वॉयस ऑफ बिहार (VOB) का मानना है कि मोबाइल वितरण की योजना यदि समय पर पूर्ण होती है, तो यह बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल सशक्तिकरण का सबसे बड़ा उदाहरण होगी। 71 लाख गतिविधियों का सफल संचालन यह साबित करता है कि बिहार में ‘पोषण अभियान’ अब एक जन-आंदोलन का रूप ले चुका है। अब जिम्मेदारी समाज की है कि वे इन सुविधाओं और जानकारियों का लाभ उठाएं ताकि आने वाली पीढ़ी स्वस्थ, बुद्धिमान और समर्थ बन सके। विकसित बिहार का सपना अब आंगनबाड़ी के छोटे-छोटे कमरों से हकीकत बनने की राह पर है।

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