
पटना: बिहार लोक सेवा आयोग (BPSC) की 70वीं संयुक्त प्रतियोगिता परीक्षा का अंतिम परिणाम जारी होने के बाद अब चर्चा केवल सफल अभ्यर्थियों तक सीमित नहीं है। हिंदी माध्यम के छात्रों की अपेक्षाकृत कम सफलता को लेकर शिक्षकों, छात्र नेताओं और प्रतियोगी परीक्षा विशेषज्ञों ने मूल्यांकन प्रक्रिया, शिक्षा व्यवस्था और बदलते परीक्षा पैटर्न पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
हालांकि, अब तक बीपीएससी की ओर से इन आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया या पुष्टि नहीं की गई है।
2028 अभ्यर्थी हुए सफल
70वीं बीपीएससी परीक्षा के तहत 2035 पदों पर नियुक्ति प्रक्रिया शुरू हुई थी, जबकि अंतिम परिणाम में 2028 अभ्यर्थियों को सफल घोषित किया गया।
अनारक्षित वर्ग की 549 सीटों में से—
- 216 अभ्यर्थी बिहार के रहे।
- 333 अभ्यर्थी अन्य राज्यों से चयनित हुए।
यानी अनारक्षित वर्ग में लगभग 60 प्रतिशत चयन अन्य राज्यों के उम्मीदवारों का रहा।
हिंदी माध्यम के प्रदर्शन पर उठे सवाल
कई शिक्षकों और छात्र संगठनों का दावा है कि मुख्य परीक्षा के निबंध पत्र के मूल्यांकन के दौरान हिंदी माध्यम के विद्यार्थियों को अपेक्षाकृत कम अंक मिले।
कुछ शिक्षकों का आरोप है कि मूल्यांकनकर्ताओं के बीच यह धारणा थी कि यदि किसी अभ्यर्थी को 300 अंकों के निबंध पत्र में 60 प्रतिशत से अधिक अंक दिए जाते हैं, तो उसका स्पष्टीकरण देना पड़ सकता है। उनका कहना है कि इससे अधिक अंक देने में संकोच की स्थिति बनी।
इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और आयोग ने इस संबंध में कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है।
क्या बोले डॉ. वीसी झा?
प्रतियोगी परीक्षाओं के शिक्षक डॉ. वीसी झा ने कहा कि हिंदी माध्यम के छात्रों की कम सफलता चिंता का विषय है।
उनके अनुसार इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं—
- मूल्यांकन प्रक्रिया को लेकर बनी आशंकाएं
- तकनीकी पृष्ठभूमि वाले छात्रों की बढ़ती सफलता
- वैकल्पिक विषयों की समाप्ति
- ऑनलाइन शिक्षा का बढ़ता प्रभाव
- पारंपरिक अध्ययन संस्कृति में गिरावट
उन्होंने कहा कि कला संकाय के विद्यार्थी विश्लेषणात्मक उत्तर लिखने में सक्षम होते हैं, जबकि इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि के छात्र संक्षिप्त और संरचित उत्तर देने में अधिक दक्ष होते हैं, जिसका लाभ वर्तमान मूल्यांकन प्रणाली में मिल सकता है।
कुमार प्रियांक ने क्या कहा?
प्रतियोगी परीक्षा विशेषज्ञ कुमार प्रियांक का भी मानना है कि इस बार हिंदी माध्यम के छात्रों की सफलता अपेक्षाकृत कम रही।
उन्होंने कहा कि—
- बड़ी संख्या में निकली रिक्तियों के कारण दूसरे राज्यों के गंभीर अभ्यर्थियों ने बड़ी संख्या में परीक्षा दी।
- बिहार की उच्च शिक्षा व्यवस्था में गिरावट भी एक बड़ा कारण हो सकती है।
- ऑनलाइन कोचिंग मॉडल ने गहन अध्ययन की संस्कृति को कमजोर किया है।
छात्र नेता ने की जांच की मांग
छात्र नेता दिलीप कुमार ने आरोप लगाया कि हिंदी माध्यम के अभ्यर्थियों के साथ मूल्यांकन में भेदभाव हुआ है।
उन्होंने सरकार से पूरे मामले की जांच कराने और मूल्यांकन प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने की मांग की।
आयोग की प्रतिक्रिया का इंतजार
फिलहाल बीपीएससी की ओर से इन सभी आरोपों पर कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी नहीं किया गया है।
ऐसे में यह बहस अभी आरोपों और विशेषज्ञों की राय तक सीमित है। यदि आयोग की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया या स्पष्टीकरण आता है, तो स्थिति और स्पष्ट हो सकेगी।
70वीं बीपीएससी का परिणाम अब केवल चयन सूची तक सीमित नहीं रहा, बल्कि भाषा, मूल्यांकन पद्धति, उच्च शिक्षा की गुणवत्ता और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के बदलते स्वरूप पर भी व्यापक चर्चा का विषय बन गया है।


