मुजफ्फरपुर की ‘हॉर्स गर्ल’ नीतू: घोड़े की रफ्तार में उड़ान भरते सपने, सोशल मीडिया पर बनीं प्रेरणा

जब रानी लक्ष्मीबाई युद्ध के मैदान में घोड़ा दौड़ाती थीं तो अंग्रेजों के छक्के छूट जाते थे। कुछ वैसा ही नजारा आजकल बिहार के मुजफ्फरपुर में देखने को मिल रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब मैदान एतिहासिक नहीं, बल्कि गांव की सड़कें हैं और योद्धा एक 15 साल की लड़की नीतू है, जिसे लोग आज ‘हॉर्स गर्ल’ के नाम से जानने लगे हैं।

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे घुड़सवारी के वीडियो

मुजफ्फरपुर जिले के सरैया प्रखंड स्थित गंगोलिया गांव की रहने वाली नीतू की घुड़सवारी के वीडियो इन दिनों सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं। सिर पर मुरेठा, हाथ में लगाम और घोड़े की पीठ पर सवार नीतू जब सड़क पर निकलती है, तो देखने वालों की नजरें ठहर जाती हैं।

ग्रामीण समाज की रूढ़ियों को तोड़ती एक पहचान

आज भी ग्रामीण परिवेश में लड़कियों के शौक और सपनों पर कई तरह की बंदिशें होती हैं। कई परिवारों में बेटियों को घर से बाहर निकलने तक की आज़ादी नहीं होती। ऐसे माहौल में नीतू का घुड़सवारी को अपना जुनून बनाना अपने आप में एक मिसाल है।

नीतू की उम्र महज 15 साल है और वह आठवीं कक्षा की छात्रा हैं। पढ़ाई के साथ-साथ घुड़सवारी को वह अपने रोज़मर्रा के जीवन का हिस्सा बना चुकी हैं।

घुड़सवार बनना है सपना

नीतू कहती हैं कि घुड़सवारी सिर्फ शौक नहीं, बल्कि उनका सपना है।

“परिवार का पूरा सहयोग मिलता रहा है। भविष्य में घुड़सवारी को अपना करियर बनाना चाहती हूं। प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेकर अपने जिले और राज्य का नाम रोशन करना चाहती हूं।”
नीतू, हॉर्स गर्ल

पढ़ाई के बाद रोज़ घोड़े के साथ निकलती हैं सड़क पर

स्कूल से लौटने के बाद नीतू रोज़ अपने घोड़े के साथ अभ्यास करती हैं। उनका मानना है कि पढ़ाई के साथ शौक भी जरूरी हैं, क्योंकि इससे अलग पहचान बनती है और आत्मविश्वास बढ़ता है।

गांव की बेटियों के लिए बनी प्रेरणा

नीतू का जुनून अब गांव की दूसरी लड़कियों के लिए भी प्रेरणा बन रहा है। गांव के लोग बताते हैं कि उन्होंने अब तक पुरुषों को ही घोड़ा दौड़ाते देखा था, लेकिन नीतू की घुड़सवारी देखकर वे भी हैरान हैं।

बचपन से घोड़े से रहा है लगाव

नीतू बताती हैं कि उन्हें बचपन से ही घोड़े पसंद रहे हैं और घुड़सवारी की पहली सीख उन्हें अपने दादा से मिली।

“दादा जी घोड़ा रखते थे और दूसरों के घोड़ों की देखभाल भी करते थे। मुझे बचपन से घोड़े के पास रहना अच्छा लगता था। दादा जी ने लगाम पकड़ना और संतुलन बनाना सिखाया, फिर धीरे-धीरे घोड़ा दौड़ाने लगी।”
नीतू, हॉर्स गर्ल

हौसले की रफ्तार, पहचान की उड़ान

आज नीतू पूरे आत्मविश्वास के साथ घोड़े की लगाम थाम सड़कों पर निकलती हैं। लोग मोबाइल से वीडियो बनाते हैं और उसकी चर्चा दूर-दूर तक होती है। नीतू की कहानी बताती है कि अगर हौसला मजबूत हो और परिवार का साथ मिले, तो गांव की बेटियां भी अपनी अलग पहचान बना सकती हैं।


 

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