नवगछिया में काल बना सेफ्टी टैंक: एक-दूसरे की जान बचाने की जद्दोजहद में तीन मजदूरों ने तोड़ा दम, मातम में डूबा खैरपुर कदवा

नवगछिया (भागलपुर)। बिहार के भागलपुर जिला अंतर्गत नवगछिया पुलिस जिले के कदवा थाना क्षेत्र में बुधवार, 22 अप्रैल 2026 को एक ऐसी हृदयविदारक घटना घटी, जिसने मानवीय संवेदनाओं और सुरक्षा मानकों की पोल खोलकर रख दी है। खैरपुर कदवा गांव के चांय टोला में बन रहा एक निर्माणाधीन सेफ्टी टैंक देखते ही देखते ‘मौत का कुआं’ बन गया। इस भीषण हादसे में तीन मजदूरों की जहरीली गैस की चपेट में आने और दम घुटने से दर्दनाक मौत हो गई। मरने वाले तीनों मजदूर एक-दूसरे को बचाने के प्रयास में मौत के उस अंधेरे जाल में उलझते चले गए, जहां से कोई वापस नहीं लौट सका। मृतकों की पहचान बमबम मंडल, जय नंदन मंडल और श्रीलाल मंडल के रूप में हुई है। इस घटना ने पूरे इलाके को झकझोर कर रख दिया है और गांव की गलियों में सन्नाटा पसरा हुआ है।

मौत का सिलसिला: एक को बचाने की कोशिश में जान गंवा बैठे तीन साथी

​यह हादसा बुधवार की सुबह उस वक्त शुरू हुआ जब निर्माणाधीन शौचालय की टंकी में काम करने की प्रक्रिया चल रही थी। प्रत्यक्षदर्शियों और स्थानीय ग्रामीणों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, सबसे पहले श्रीलाल मंडल टंकी के भीतर काम करने के उद्देश्य से नीचे उतरे थे। कुछ ही क्षण बीते थे कि टंकी के भीतर जमा जहरीली गैसों और ऑक्सीजन की भारी कमी के कारण उनकी तबीयत बिगड़ने लगी। उन्हें सांस लेने में तकलीफ हुई और वे बेहोश होकर वहीं गिर पड़े।

​बाहर खड़े जय नंदन मंडल ने जब श्रीलाल की कोई हरकत नहीं देखी, तो वे बिना किसी सुरक्षा उपकरण के अपने साथी की जान बचाने के लिए तुरंत टैंक के भीतर उतर गए। लेकिन विधि का विधान कुछ और ही था। जैसे ही वे नीचे पहुंचे, वहां मौजूद गैसों ने उन्हें भी अपनी चपेट में ले लिया। दो लोगों के भीतर फंसने की खबर मिलते ही बमबम मंडल ने भी हिम्मत दिखाई और यह सोचकर नीचे उतरे कि शायद वे दोनों को बाहर निकाल पाएंगे। विडंबना यह रही कि सुरक्षा साधनों के अभाव में तीसरा मजदूर भी उसी मौत के घेरे में समा गया। देखते ही देखते, कुछ ही मिनटों के भीतर तीन जिंदगियां उस अंधेरे गड्ढे में खामोश हो गईं।

चौथा मजदूर मौत के मुंह से वापस लौटा

​जैसे-जैसे घटनास्थल पर अफरा-तफरी बढ़ी, ग्रामीणों ने बचाव का एक और प्रयास किया। एक चौथे व्यक्ति को कमर में रस्सी बांधकर नीचे उतारने की कोशिश की गई। लेकिन जैसे ही उस व्यक्ति ने टैंक के भीतर कुछ फीट की दूरी तय की, उसे भी घुटन महसूस होने लगी और उसकी तबीयत खराब होने लगी। स्थानीय लोगों ने तुरंत उसे ऊपर खींच लिया, जिससे उसकी जान बच गई। इसके बाद ग्रामीणों को समझ आ गया कि टैंक के भीतर जाना आत्मघाती कदम है। अंततः, स्थिति को भांपते हुए ग्रामीणों ने टैंक की दीवार को तोड़ने का फैसला किया। दीवार तोड़कर काफी मशक्कत के बाद तीनों को बाहर निकाला गया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।

गांव में चीख-पुकार और परिजनों का विलाप

​हादसे की खबर जैसे ही गांव में फैली, सैकड़ों की संख्या में लोग घटनास्थल की ओर दौड़ पड़े। मृतकों के घरों में कोहराम मच गया। श्रीलाल मंडल के पुत्र श्रीराम कुमार ने भर्राई आवाज में बताया कि उनके पिता और अन्य लोग शौचालय की टंकी बनाने के काम में लगे थे। उन्हें अंदाजा भी नहीं था कि जिस काम से घर का चूल्हा जलता है, वही उनकी जान ले लेगा। श्रीराम ने बताया कि टैंक के भीतर भारी मात्रा में गैस बन गई थी, जिसने किसी को संभलने का मौका नहीं दिया।

​वहीं, मृतक के भाई जितेंद्र कुमार ने आंखों में आंसू लिए बताया कि सब कुछ इतनी जल्दी हुआ कि किसी को कुछ समझ नहीं आया। एक को बचाने के चक्कर में दूसरा और दूसरे को बचाने में तीसरा अंदर गया, लेकिन कोई बाहर नहीं निकला। ग्रामीणों द्वारा टैंक की दीवार तोड़कर शवों को बाहर निकालना इस बात का गवाह है कि स्थिति कितनी भयावह रही होगी।

प्रशासनिक पहल और सुरक्षा पर सवाल

​घटना की सूचना मिलते ही कदवा थाना सहित आसपास के तीन थानों की पुलिस मौके पर पहुंची। मामले की गंभीरता को देखते हुए नवगछिया के एसडीपीओ ओम प्रकाश और डीसीएलआर भी घटनास्थल पर पहुंचे। अधिकारियों ने घटनास्थल का मुआयना किया और पीड़ित परिजनों को सांत्वना दी। एसडीपीओ ओम प्रकाश ने घटना की पुष्टि करते हुए कहा कि खैरपुर कदवा चांय टोला में शौचालय टंकी निर्माण के दौरान दम घुटने से तीन लोगों की मृत्यु हुई है। उन्होंने बताया कि तीनों शवों को पोस्टमार्टम के लिए अनुमंडल अस्पताल भेजा गया है। प्रशासन की ओर से जो भी सरकारी सहायता या लाभ अनुमन्य है, वह पीड़ित परिवारों को शीघ्र उपलब्ध कराया जाएगा।

तकनीकी चूक और जागरूकता का अभाव

​यह कोई पहली घटना नहीं है जब सेफ्टी टैंक मजदूरों के लिए जानलेवा साबित हुआ हो। विशेषज्ञों के अनुसार, बंद पड़े या निर्माणाधीन गहरे गड्ढों में सड़न की वजह से हाइड्रोजन सल्फाइड, मीथेन और अमोनिया जैसी गैसें जमा हो जाती हैं। बिना किसी वेंटिलेशन या ऑक्सीजन सिलेंडर के ऐसे गड्ढों में उतरना साक्षात मृत्यु को निमंत्रण देना है। इस मामले में भी मजदूरों के पास न तो कोई मास्क था और न ही कोई सुरक्षा बेल्ट। स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर प्रशासन और ठेकेदारों द्वारा सुरक्षा मानकों को लेकर जागरूकता फैलाई गई होती, तो शायद इन तीन घरों के चिराग न बुझते।

सामाजिक और आर्थिक प्रभाव

​मरने वाले तीनों मजदूर अपने-अपने परिवारों के एकमात्र कमाऊ सदस्य थे। उनकी मौत से न केवल उनके परिवारों पर दुखों का पहाड़ टूटा है, बल्कि उनके सामने रोजी-रोटी का गंभीर संकट भी खड़ा हो गया है। गांव के लोग अब सरकार से मांग कर रहे हैं कि पीड़ित परिवारों को उचित मुआवजा दिया जाए ताकि अनाथ हुए बच्चों और बेसहारा बुजुर्गों का भविष्य सुरक्षित हो सके।

विशेष विश्लेषण: लापरवाही की कीमत और भविष्य की राह

​नवगछिया की यह घटना केवल एक हादसा नहीं है, बल्कि यह हमारे सिस्टम की उस गहरी खामी को उजागर करती है जहाँ इंसानी जान की कीमत चंद रुपयों के निर्माण कार्य से भी कम आँकी जाती है। ग्रामीण इलाकों में सेफ्टी टैंक के निर्माण के दौरान किसी भी प्रकार के सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन नहीं किया जाता। लोग अक्सर यह भूल जाते हैं कि बंद टैंकों के भीतर ‘साइलेंट किलर’ गैसें जमा हो जाती हैं जो ऑक्सीजन को सोख लेती हैं और पलक झपकते ही नर्वस सिस्टम को बेकार कर देती हैं।

​इस घटना में सबसे मार्मिक पहलू ‘बलिदान’ का है। तीनों मजदूरों की मौत किसी व्यक्तिगत लापरवाही से ज्यादा, एक-दूसरे को बचाने की उस अटूट भावना का नतीजा थी जो अक्सर गरीब और मेहनतकश तबके में देखी जाती है। लेकिन यही भावना बिना तकनीकी ज्ञान के आत्मघाती साबित हुई। प्रशासन को चाहिए कि वह पंचायतों के माध्यम से ऐसे निर्माण कार्यों के लिए ‘सुरक्षा गाइडलाइन’ जारी करे और कम से कम मास्क और रस्सी जैसे बुनियादी उपकरणों की उपलब्धता सुनिश्चित कराए।

​खैरपुर कदवा की यह घटना एक सबक है कि विकास और निर्माण की अंधी दौड़ में सुरक्षा को नजरअंदाज करना कितना महंगा पड़ सकता है। आज पूरा गांव इन तीनों मजदूरों की बहादुरी को नमन तो कर रहा है—जिन्होंने एक-दूसरे की जान बचाने के लिए खुद को बलिदान कर दिया—लेकिन साथ ही इस व्यवस्था पर भी सवाल उठा रहा है जिसने उन्हें बिना किसी सुरक्षा के मौत के कुएं में उतरने को मजबूर किया। प्रशासनिक आश्वासन के बीच, अब उम्मीद यही है कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे और सुरक्षा मानकों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित किया जाएगा।

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