मुजफ्फरपुर में स्वास्थ्य विभाग की बड़ी चूक: एक्सपायरी दवाओं के साथ पकड़ा गया अवैध नर्सिंग होम संचालक, FIR नहीं होने पर थाने से रिहा

मुजफ्फरपुर। बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में अवैध नर्सिंग होम के खिलाफ की गई बड़ी प्रशासनिक कार्रवाई सवालों के घेरे में आ गई है। स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन की संयुक्त छापेमारी में भारी मात्रा में एक्सपायरी दवाएं बरामद होने तथा संचालक को हिरासत में लेने के बावजूद कुछ ही घंटों बाद उसे निजी मुचलके पर रिहा कर दिया गया। इस पूरे घटनाक्रम ने न केवल स्वास्थ्य विभाग की कार्यशैली पर सवाल खड़े किए हैं बल्कि अवैध स्वास्थ्य कारोबार और प्रशासनिक लापरवाही को लेकर भी गंभीर बहस छेड़ दी है।

सबसे हैरानी की बात यह रही कि जिस मामले में मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़ करने के आरोप सामने आए, उसी मामले में संबंधित विभाग समय पर कानूनी कार्रवाई की प्रक्रिया पूरी नहीं कर सका। परिणामस्वरूप पुलिस के पास आरोपी को हिरासत में रखने का कोई वैधानिक आधार नहीं बचा और उसे छोड़ना पड़ा।

एसकेएमसीएच के आसपास चल रहे अवैध नर्सिंग होम पर छापेमारी

जानकारी के अनुसार शनिवार को अनुमंडल पदाधिकारी (पूर्वी) के नेतृत्व में स्वास्थ्य विभाग की टीम ने श्रीकृष्ण मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (एसकेएमसीएच) के आसपास संचालित निजी नर्सिंग होम और अस्पतालों में व्यापक जांच अभियान चलाया।

जांच का मुख्य उद्देश्य अवैध रूप से संचालित स्वास्थ्य संस्थानों की पहचान करना और वहां मरीजों को दी जा रही सुविधाओं की स्थिति का आकलन करना था। इसी दौरान एसकेएमसीएच के निकट संचालित एक निजी हेल्थ केयर नर्सिंग होम में कई गंभीर अनियमितताएं सामने आईं।

अधिकारियों ने जांच के दौरान बड़ी मात्रा में ऐसी दवाएं बरामद कीं जिनकी वैधता अवधि वर्षों पहले समाप्त हो चुकी थी। बरामद दवाओं में कुछ ऐसी भी थीं जिनकी एक्सपायरी वर्ष 2013 में ही समाप्त हो चुकी थी।

मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़ का मामला

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि एक्सपायरी दवाओं का उपयोग किसी भी मरीज के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकता है। ऐसी दवाएं न केवल अपना प्रभाव खो देती हैं बल्कि कई मामलों में गंभीर दुष्प्रभाव भी उत्पन्न कर सकती हैं।

जांच टीम ने जब भारी मात्रा में पुरानी और एक्सपायरी दवाएं देखीं तो इसे मरीजों की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मामला माना गया। अधिकारियों का कहना था कि इस प्रकार की लापरवाही सीधे तौर पर लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है।

इसी गंभीरता को देखते हुए टीम ने मौके पर मौजूद संचालक सुधीर कुमार को हिरासत में ले लिया और आगे की कानूनी कार्रवाई के लिए पुलिस को सौंप दिया।

कार्रवाई की उम्मीद, लेकिन कुछ घंटों में बदला पूरा घटनाक्रम

छापेमारी के बाद लोगों को उम्मीद थी कि अवैध स्वास्थ्य कारोबार के खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी और दोषियों पर कानूनी शिकंजा कसा जाएगा। लेकिन कुछ ही घंटों के भीतर पूरा मामला अलग दिशा में चला गया।

सूत्रों के अनुसार हिरासत में लिए जाने के बाद न तो स्वास्थ्य विभाग ने और न ही औषधि नियंत्रण विभाग ने संबंधित थाने में कोई लिखित शिकायत दर्ज कराई। जबकि बरामद दवाओं और अन्य अनियमितताओं के आधार पर प्राथमिकी दर्ज कराना अपेक्षित माना जा रहा था।

जब काफी समय तक किसी विभाग की ओर से लिखित आवेदन नहीं मिला तो पुलिस भी आगे की कार्रवाई नहीं कर सकी।

पुलिस ने निजी मुचलके पर किया रिहा

अहियापुर थाना पुलिस के सामने सबसे बड़ी समस्या यह थी कि बिना प्राथमिकी और बिना किसी औपचारिक शिकायत के आरोपी को हिरासत में रखना कानूनी रूप से संभव नहीं था।

पुलिस अधिकारियों ने बताया कि किसी भी विभाग द्वारा लिखित आवेदन नहीं दिए जाने के कारण नियमानुसार कार्रवाई करना मुश्किल हो गया। इसी वजह से हिरासत में लिए गए संचालक को निजी मुचलके यानी पीआर बांड पर रिहा कर दिया गया।

इस फैसले के बाद पूरे मामले ने नया मोड़ ले लिया और स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे।

विभागीय समन्वय की कमी आई सामने

इस मामले ने प्रशासनिक तंत्र के भीतर समन्वय की कमी को भी उजागर कर दिया है। एक ओर जहां छापेमारी टीम ने बड़ी कार्रवाई करते हुए एक्सपायरी दवाएं बरामद कीं, वहीं दूसरी ओर आगे की कानूनी प्रक्रिया समय पर पूरी नहीं की जा सकी।

विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में स्वास्थ्य विभाग, ड्रग विभाग और पुलिस के बीच बेहतर तालमेल बेहद आवश्यक होता है। यदि किसी स्तर पर देरी होती है तो पूरी कार्रवाई का प्रभाव कम हो जाता है।

मुजफ्फरपुर में सामने आया यह मामला इसी तरह की प्रशासनिक कमजोरी का उदाहरण माना जा रहा है।

पुराने मामलों से नहीं लिया गया सबक

यह पहली बार नहीं है जब जिले में स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर गंभीर सवाल उठे हों। इससे पहले भी कई घटनाओं ने स्वास्थ्य व्यवस्था की खामियों को उजागर किया है।

विशेष रूप से अस्पतालों और निजी स्वास्थ्य संस्थानों में सुरक्षा मानकों की अनदेखी को लेकर लगातार शिकायतें सामने आती रही हैं। कई बार प्रशासनिक कार्रवाई भी हुई, लेकिन उसके बाद भी स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं दिखाई दिया।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते सख्त कार्रवाई और नियमित निगरानी की व्यवस्था की जाती तो ऐसी परिस्थितियों से बचा जा सकता था।

अवैध स्वास्थ्य कारोबार पर उठे सवाल

घटना के बाद स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों ने अवैध रूप से संचालित नर्सिंग होमों के खिलाफ व्यापक जांच की मांग की है। उनका कहना है कि यदि एक संस्थान में इतनी बड़ी मात्रा में एक्सपायरी दवाएं मिली हैं तो अन्य संस्थानों की भी जांच की जानी चाहिए।

लोगों का आरोप है कि कई निजी स्वास्थ्य केंद्र नियमों की अनदेखी कर मरीजों का इलाज कर रहे हैं। ऐसे संस्थानों की नियमित जांच और लाइसेंस सत्यापन आवश्यक है ताकि मरीजों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

प्रशासन पर बढ़ा दबाव

पूरा मामला सामने आने के बाद अब प्रशासन पर दबाव बढ़ गया है। लोगों की मांग है कि मामले की निष्पक्ष जांच कर जिम्मेदार अधिकारियों और संबंधित संचालकों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए।

साथ ही यह भी सवाल उठ रहा है कि जब जांच में गंभीर अनियमितताएं सामने आ चुकी थीं तो फिर कानूनी प्रक्रिया को समय पर पूरा क्यों नहीं किया गया। इस चूक की जिम्मेदारी किसकी है, इसका जवाब भी प्रशासन को देना होगा।

स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न

मुजफ्फरपुर की यह घटना केवल एक अवैध नर्सिंग होम तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे स्वास्थ्य तंत्र की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करती है। मरीजों की सुरक्षा से जुड़े मामले में यदि जिम्मेदार विभाग समय पर कार्रवाई नहीं कर पाते तो इसका लाभ अवैध कारोबारियों को मिलता है।

फिलहाल यह मामला जिले में चर्चा का विषय बना हुआ है। लोगों की निगाहें अब इस बात पर टिकी हैं कि प्रशासन आगे क्या कदम उठाता है और क्या एक्सपायरी दवाओं के इस गंभीर मामले में दोषियों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई हो पाती है या नहीं।

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