
नई दिल्ली। भारतीय लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर यानी संसद के ढांचे में एक युगांतकारी परिवर्तन की तैयारी पूरी कर ली गई है। केंद्र सरकार ने लोकसभा की मौजूदा सदस्य संख्या को 543 से बढ़ाकर अधिकतम 850 करने का एक ऐतिहासिक प्रस्ताव पेश किया है। इस बड़े बदलाव के लिए संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 तैयार किया गया है, जिसे कल यानी गुरुवार को संसद के पटल पर रखा जाएगा। इस प्रस्तावित कानून के केंद्र में न केवल सीटों की संख्या में वृद्धि है, बल्कि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने की दिशा में एक निर्णायक कदम भी शामिल है। सरकारी दस्तावेजों के अनुसार, इस पुनर्गठन के बाद राज्यों के लिए 815 सीटें और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए 35 सीटें आरक्षित की जाएंगी। यह कदम देश की बदलती जनसांख्यिकी और चुनावी प्रतिनिधित्व की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए उठाया जा रहा है। 16 से 18 अप्रैल तक होने वाली संसद की इस विशेष बैठक में इस विधेयक के पारित होने के साथ ही देश की राजनैतिक तस्वीर पूरी तरह बदल जाएगी।
सीटों का गणित और जनसांख्यिकीय संतुलन
पिछले पांच दशकों से लोकसभा की सीटों की संख्या 1971 की जनगणना के आधार पर स्थिर बनी हुई थी। हालांकि, इस दौरान देश की आबादी में भारी इजाफा हुआ है, जिससे एक सांसद के प्रतिनिधित्व वाली जनता की संख्या काफी बढ़ गई है। प्रस्तावित 131वें संविधान संशोधन के माध्यम से सरकार इस विसंगति को दूर करना चाहती है। वर्तमान में 543 निर्वाचित सदस्यों वाली लोकसभा में अब अधिकतम 850 सदस्यों की गुंजाइश होगी। इसमें राज्यों के कोटे से 815 सदस्य चुनकर आएंगे, जबकि केंद्र शासित प्रदेशों का प्रतिनिधित्व करने वाले सांसदों की संख्या 35 होगी।
इस विस्तार के पीछे मुख्य तर्क यह है कि संसद में जनता का प्रतिनिधित्व अधिक सघन और प्रभावी होना चाहिए। जनसंख्या में बढ़ोतरी के कारण निर्वाचन क्षेत्रों का आकार इतना बड़ा हो गया है कि सांसदों के लिए अपने क्षेत्र के विकास और जनसमस्याओं पर ध्यान देना चुनौतीपूर्ण हो गया था। सीटों की संख्या में यह वृद्धि क्षेत्रीय असंतुलन को भी पाटने का प्रयास करेगी। हालांकि, दक्षिण भारत के कुछ राज्यों ने इस पर चिंता जताई है कि जनसंख्या नियंत्रण के उनके सफल प्रयासों के बावजूद उत्तर भारत के अधिक आबादी वाले राज्यों को अधिक सीटें मिल सकती हैं, लेकिन सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह प्रक्रिया पूरी तरह से संवैधानिक मानदंडों और निष्पक्ष परिसीमन पर आधारित होगी।
2011 की जनगणना: परिसीमन का नया आधार
इस विधेयक का एक सबसे महत्वपूर्ण और रणनीतिक पहलू यह है कि इसमें निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण (परिसीमन) के लिए वर्ष 2011 की जनगणना के आंकड़ों को आधार बनाया जाएगा। अब तक के संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार, परिसीमन की प्रक्रिया 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के आंकड़ों के आधार पर होनी थी। लेकिन सरकार ने महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण तुरंत प्रदान करने और निर्वाचन क्षेत्रों के आकार को संतुलित करने के लिए इस ‘फ्रीज’ को हटाने का निर्णय लिया है।
2011 की जनगणना के आंकड़ों का उपयोग करने का उद्देश्य परिसीमन की प्रक्रिया को तेज करना है। अगर सरकार 2026 की जनगणना का इंतजार करती, तो महिला आरक्षण के क्रियान्वयन में कम से कम 2029 या उसके बाद तक की देरी हो सकती थी। 131वें संशोधन विधेयक के माध्यम से परिसीमन के नियमों में बदलाव कर सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि जन प्रतिनिधित्व की यह नई व्यवस्था आगामी चुनावों से पहले ही प्रभावी हो सकती है। परिसीमन आयोग द्वारा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को इस तरह दोबारा तय किया जाएगा कि हर सांसद के पास लगभग समान जनसंख्या का प्रतिनिधित्व हो, जो लोकतंत्र के ‘एक व्यक्ति, एक मूल्य’ के सिद्धांत को मजबूती प्रदान करेगा।
महिला आरक्षण: आधी आबादी को पूर्ण अधिकार
इस समूचे संवैधानिक संशोधन का सबसे बड़ा आकर्षण महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण है। ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को धरातल पर उतारने के लिए यह विस्तार अनिवार्य माना जा रहा है। सीटों की संख्या 850 होने के बाद, महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों की संख्या भी स्वाभाविक रूप से बढ़ जाएगी। आंकड़ों के लिहाज से देखें तो 850 सीटों में से लगभग 283 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी।
यह आरक्षण रोटेशन प्रणाली के आधार पर लागू किया जाएगा, जिससे हर निर्वाचन क्षेत्र को बारी-बारी से महिला प्रतिनिधित्व का अवसर मिलेगा। सरकार का मानना है कि केवल आरक्षण का प्रावधान करना पर्याप्त नहीं था, बल्कि सदन की कुल क्षमता बढ़ाकर इसे लागू करना राजनैतिक संघर्ष को कम करने का एक प्रभावी तरीका है। अगर मौजूदा 543 सीटों में ही 33 फीसदी आरक्षण लागू किया जाता, तो कई मौजूदा पुरुष सांसदों के टिकट कटने का डर था, जिससे राजनैतिक असंतोष पैदा हो सकता था। सीटों की कुल संख्या बढ़ाकर 850 करने से नए चेहरों और विशेषकर महिलाओं को बिना किसी बड़े घर्षण के संसद में प्रवेश का अवसर मिलेगा।
संसद का विशेष सत्र और विधायी प्रक्रिया
सरकार ने इस महत्वपूर्ण विधायी कामकाज के लिए 16 से 18 अप्रैल के बीच संसद की विशेष बैठकें बुलाई हैं। सांसदों को पहले ही विधेयकों की प्रतियां भेज दी गई हैं ताकि वे गहन चर्चा के लिए तैयार रह सकें। गुरुवार को जब यह विधेयक लोकसभा में पेश किया जाएगा, तो इस पर विस्तृत बहस होने की उम्मीद है। विधेयक को पारित करने के लिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी, क्योंकि यह एक संविधान संशोधन विधेयक है।
इस विशेष सत्र के दौरान तीन प्रमुख विधेयक चर्चा के केंद्र में होंगे: पहला, सीटों की संख्या बढ़ाने वाला 131वां संशोधन विधेयक; दूसरा, परिसीमन कानून में बदलाव के लिए लाया जाने वाला विधेयक; और तीसरा, महिलाओं के आरक्षण को क्रियान्वित करने वाला पूरक विधेयक। सरकार ने विपक्षी दलों से भी इस ऐतिहासिक बदलाव में सहयोग की अपील की है। राजनैतिक हलकों में इस सत्र को भारतीय संसदीय इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण सत्रों में से एक माना जा रहा है, क्योंकि यह नई संसद भवन की पूरी क्षमता का उपयोग करने की दिशा में पहला कदम भी है।
भविष्य की राजनीति का रोडमैप
लोकसभा की सीटों को 543 से बढ़ाकर 850 करना केवल एक संख्यात्मक वृद्धि नहीं है, बल्कि यह एक नए भारत के राजनैतिक विजन का हिस्सा है। इससे संसद के भीतर प्रतिनिधित्व का स्वरूप अधिक व्यापक और समावेशी होगा। 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन की मंजूरी देकर सरकार ने प्रशासनिक जटिलताओं को कम करने का प्रयास किया है। हालांकि, राज्यों के बीच सीटों के वितरण को लेकर होने वाली चर्चाओं पर सबकी नजर रहेगी, लेकिन महिला आरक्षण के साथ इस विस्तार को जोड़कर सरकार ने एक मास्टरस्ट्रोक खेला है।
131वां संविधान संशोधन विधेयक भारत की लोकतांत्रिक यात्रा में एक नए अध्याय की शुरुआत करेगा। कल पेश होने वाला यह विधेयक तय करेगा कि आने वाले वर्षों में भारतीय संसद की संरचना और कार्यप्रणाली कैसी होगी। यदि यह पारित होता है, तो 2029 के लोकसभा चुनावों में देशवासी एक नई और विशाल लोकसभा का अनुभव करेंगे, जहाँ महिलाओं की भागीदारी न केवल कागजों पर बल्कि संख्या बल में भी प्रभावी होगी।


