
पटना। बिहार की सत्ता में 15 अप्रैल 2026 का दिन केवल एक राजनैतिक बदलाव का गवाह नहीं है, बल्कि यह एक ऐसे व्यक्तित्व के राज्याभिषेक का क्षण है जिसने पिछले आठ वर्षों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के भीतर न केवल अपनी जगह बनाई, बल्कि नेतृत्व के उस शून्य को भी भरा जो दशकों से महसूस किया जा रहा था। पटना के लोकभवन में मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले सम्राट चौधरी बिहार के राजनैतिक इतिहास में भाजपा के पहले ऐसे नेता बन गए हैं जो सीधे तौर पर गठबंधन और सरकार की कमान संभालेंगे। मुंगेर की मिट्टी से निकलकर सत्ता के इस सर्वोच्च शिखर तक पहुँचने की उनकी यह यात्रा संघर्ष, आक्रामकता और सधी हुई राजनैतिक चालों का एक अनूठा संगम है। जिस नेता ने कभी लालू प्रसाद यादव की ‘पाठशाला’ से राजनीति का ककहरा सीखा और राबड़ी देवी सरकार में सबसे कम उम्र के मंत्री बनने का गौरव प्राप्त किया, आज वही नेता भाजपा की उस ‘सोशल इंजीनियरिंग’ का सबसे बड़ा चेहरा बनकर उभरा है जिसने बिहार में ‘सुशासन’ की परिभाषा में अपना रंग भर दिया है।
भाजपा में आठ साल का ‘तूफानी’ सफर: शून्य से शिखर तक
सम्राट चौधरी का भाजपा में उदय किसी राजनैतिक चमत्कार से कम नहीं लगता। साल 2018 में जब उन्होंने भाजपा की सदस्यता ग्रहण की थी, तब वे एक अनुभवी नेता तो थे लेकिन पार्टी के भीतर उन्हें अपनी निष्ठा और कार्यक्षमता साबित करनी थी। दिवंगत नेता सुशील कुमार मोदी उन्हें भाजपा में लेकर आए थे। तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष नित्यानंद राय की टीम में उन्हें प्रदेश उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी मिली, जहाँ से उन्होंने संगठन की नब्ज को पकड़ना शुरू किया।
महज आठ वर्षों के भीतर वे संगठन के प्रदेश अध्यक्ष बने, विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका निभाई, दो बार उपमुख्यमंत्री रहे और आज मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान हैं। राजनैतिक जानकारों का मानना है कि सम्राट चौधरी ने सुशील मोदी के बाद बिहार भाजपा में पैदा हुई नेतृत्व की रिक्तता को बहुत ही कम समय में अपनी आक्रामकता और जमीनी पकड़ से भर दिया। उन्होंने पार्टी को एक ऐसा जुझारू चेहरा दिया जो विरोधियों की आंखों में आंखें डालकर बात कर सकता था।
पारिवारिक विरासत और ‘गुल्लू’ के संघर्ष की कहानी
सम्राट चौधरी का जन्म 16 नवंबर 1968 को मुंगेर जिले के तारापुर अंतर्गत लखनपुर गांव में हुआ था। राजनीति उनके खून में थी। उनके पिता शकुनी चौधरी बिहार के दिग्गज समाजवादी नेताओं में शुमार रहे हैं और सात बार विधायक व सांसद रहे। उनकी माता पार्वती देवी भी विधायक रहीं। लेकिन सम्राट ने केवल विरासत के दम पर अपनी पहचान नहीं बनाई।
बचपन में प्यार से ‘गुल्लू’ कहे जाने वाले सम्राट ने अपनी उच्च शिक्षा के दौरान ही राजनीति के उतार-चढ़ाव को देखना शुरू कर दिया था। उनके पास पीएफसी कामराज विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट की मानद उपाधि है। उनके परिवार में पत्नी कुमारी ममता (अधिवक्ता) और दो बच्चे, बेटी चारू प्रिया और बेटा प्रणय प्रियम चौधरी हैं। सम्राट ने हमेशा यह सुनिश्चित किया कि उनके पिता की समाजवादी विरासत और भाजपा की वैचारिक प्रखरता के बीच एक ऐसा सेतु बने जो बिहार के पिछड़ा और अति-पिछड़ा वर्ग को एक नई राजनैतिक दिशा दे सके।
राजनैतिक कॅरियर: राजद से भाजपा तक का महापरिवर्तन
सम्राट चौधरी का राजनैतिक ग्राफ काफी विविधतापूर्ण रहा है:
- 1990: सक्रिय राजनीति में प्रवेश।
- 1999: राबड़ी देवी सरकार में मात्र 31 वर्ष की उम्र में सबसे युवा राज्य मंत्री बने।
- 2000 और 2010: राजद के टिकट पर परबत्ता विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने गए।
- 2014: राजद छोड़कर जदयू और फिर ‘हम’ (सेकुलर) का हिस्सा बने।
- 2018: भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए, जहाँ से उनके करियर ने नई ऊंचाइयों को छुआ।
- 2020-2025: विधान परिषद सदस्य और पंचायती राज मंत्री के रूप में प्रशासनिक दक्षता दिखाई।
- 2024-2025: दो बार उपमुख्यमंत्री का पदभार संभाला और वित्त, गृह जैसे महत्वपूर्ण विभाग देखे।
- 2025: तारापुर से भाजपा विधायक के रूप में बड़ी जीत हासिल की।
उनका यह सफर यह दर्शाता है कि वे केवल एक दल के नेता नहीं रहे, बल्कि उन्होंने बिहार की बदलती राजनैतिक हवाओं को पहचानकर खुद को ढालने और नेतृत्व करने की अद्भुत क्षमता दिखाई।
विपक्ष के तेवर और ‘मुरेठा’ की वह चर्चित कसम
सम्राट चौधरी की पहचान एक ऐसे नेता के रूप में बनी है जो जनहित के मुद्दों पर सरकार को घेरने में कभी पीछे नहीं रहे। जब 2022 में एनडीए गठबंधन टूटा, तब उन्हें विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष बनाया गया। उस दौरान उन्होंने महागठबंधन सरकार की नाक में दम कर दिया था। उनके इसी तीखे तेवर को देखते हुए मार्च 2023 में उन्हें बिहार भाजपा की कमान सौंपी गई।
सबसे चर्चित वाकया उनके मुरेठा (पगड़ी) बांधने का रहा। उन्होंने नीतीश कुमार को गद्दी से हटाने के लिए प्रतीकात्मक रूप से सिर पर मुरैठा बांध लिया था और कसम खाई थी कि जब तक सत्ता परिवर्तन नहीं होगा, वे इसे नहीं उतारेंगे। हालांकि, जनवरी 2024 में जब राजनैतिक समीकरण बदले और एनडीए की सरकार फिर से बनी, तो उन्होंने अयोध्या जाकर मुंडन कराया और अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर मुरैठा उतारा। यह उनकी प्रतिबद्धता और राजनैतिक प्रतीकों के सही इस्तेमाल की कला को दर्शाता है।
प्रशासनिक अनुभव और ‘गया में पिंडदान’ का हुंकार
एक मंत्री के रूप में सम्राट चौधरी का रिकॉर्ड काफी प्रभावशाली रहा है। उन्होंने नगर विकास, आवास, स्वास्थ्य, वित्त और वाणिज्यकर जैसे भारी-भरकम विभागों को संभाला। लेकिन सबसे अधिक चर्चा उनके गृह मंत्री के कार्यकाल की रही। गृह विभाग की कमान संभालने के बाद उन्होंने अपराधियों को स्पष्ट चेतावनी देते हुए कहा था कि अपराधियों का ‘गया में पिंडदान’ कर दिया जाएगा।
उनके इस बयान ने बिहार में कानून-व्यवस्था को लेकर भाजपा के कड़े रुख को साफ कर दिया था। नौकरशाहों के बीच भी सम्राट चौधरी की छवि एक ऐसे मंत्री की रही जो सीधे दिशा-निर्देश देते थे और फाइलों के निपटारे में देरी पसंद नहीं करते थे। नवंबर 2025 के विधानसभा चुनावों में भाजपा को 89 सीटों के साथ सबसे बड़ा दल बनाने में उनकी रणनीतिक भूमिका सर्वोपरि रही। उनके नेतृत्व में भाजपा ने पहली बार जदयू के दबदबे वाले गठबंधन में ‘बड़े भाई’ की भूमिका को हकीकत में बदला।
बिहार के नए ‘सम्राट’ की अग्निपरीक्षा
आज जब सम्राट चौधरी बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ले रहे हैं, तो उनके सामने चुनौतियों का एक नया पहाड़ है। उन्हें न केवल नीतीश कुमार के साथ अपने संबंधों में संतुलन बनाए रखना है, बल्कि भाजपा की अपनी स्वतंत्र छवि को भी और मजबूत करना है। ‘लालू की पाठशाला’ से निकले सम्राट के पास अब वह मौका है जहाँ वे यह साबित कर सकें कि भाजपा का ‘विकास मॉडल’ बिहार की गरीबी, पलायन और पिछड़ेपन का स्थायी समाधान है।
अग्रवाल, दलित, पिछड़ा और अति-पिछड़ा वर्ग के बीच जो ‘कॉकटेल’ उन्होंने तैयार किया है, उसे आने वाले चार वर्षों तक सहेज कर रखना उनकी सबसे बड़ी राजनैतिक परीक्षा होगी। सम्राट चौधरी अपने बेबाक स्वभाव और आक्रामक राजनीति के लिए जाने जाते हैं, लेकिन अब एक मुख्यमंत्री के रूप में उन्हें अपनी उस आक्रामकता को ‘प्रशासनिक संजीदगी’ में बदलना होगा। बिहार की जनता अब अपने इस नए ‘सरताज’ से उम्मीद कर रही है कि वह राज्य को उन ऊंचाइयों पर ले जाएंगे जहाँ का सपना शकुनी चौधरी जैसे समाजवादी नेताओं ने कभी देखा था।


