50 करोड़ का ‘खाकी’ साम्राज्य: ईओयू की रेड में किशनगंज के थानेदार अभिषेक रंजन बेनकाब; मुजफ्फरपुर से सिलीगुड़ी तक काली कमाई के मिले सबूत

किशनगंज/पटना। बिहार पुलिस की वर्दी पर एक बार फिर भ्रष्टाचार की ऐसी कालिख लगी है, जिसकी गूँज उत्तर बिहार से लेकर पश्चिम बंगाल की सीमा तक सुनाई दे रही है। किशनगंज के निवर्तमान नगर थानाध्यक्ष अभिषेक कुमार रंजन ने अपनी 17 साल की पुलिसिया सेवा में कानून की रक्षा कम और ‘धनार्जन’ की साधना ज्यादा की है। आर्थिक अपराध इकाई (EOU) द्वारा मंगलवार को की गई ताबड़तोड़ छापेमारी ने खाकी की आड़ में छिपे एक ऐसे ‘धनकुबेर’ का पर्दाफाश किया है, जिसकी संपत्तियों का अनुमानित मूल्य 50 करोड़ रुपये से भी अधिक बताया जा रहा है। ईओयू की इस कार्रवाई ने यह साफ कर दिया है कि अभिषेक रंजन भ्रष्टाचार के मामले में अपने ही निलंबित एसडीपीओ गौतम कुमार से किसी भी मायने में कम नहीं रहे हैं। पटना, छपरा, मुजफ्फरपुर और पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी तक फैला इनका साम्राज्य अब जांच के घेरे में है।

वर्दी की आड़ में 17 साल का ‘बिजनेस’ मॉडल

​अभिषेक कुमार रंजन का राजनैतिक और प्रशासनिक रसूख ऐसा था कि उन्होंने अपनी पोस्टिंग का इस्तेमाल केवल और केवल जमीन, मकान और ट्रकों के बेड़े बनाने में किया। ईओयू की जांच में जो सबसे चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है, वह है मुजफ्फरपुर के फतेहपुर कांटी में उनका निवेश। यहाँ अकेले एक ही इलाके में थानाध्यक्ष ने 20 करोड़ रुपये से अधिक की चल-अचल संपत्तियों में निवेश कर रखा था। यह एक थानेदार की कानूनी आय से इतना परे है कि ईओयू के अधिकारी भी दस्तावेजों को देखकर दंग रह गए।

​जांच में यह भी पता चला है कि अभिषेक रंजन ने केवल जमीन-मकान ही नहीं, बल्कि परिवहन के व्यवसाय में भी पैर पसार रखे थे। उनके पास छह से सात ट्रकों का एक पूरा बेड़ा होने की सूचना मिली है, जो उनके या उनके करीबियों के नाम पर संचालित हो रहे थे। एक सरकारी सेवक द्वारा आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने का यह ऐसा क्लासिक उदाहरण है, जहाँ वर्दी का रसूख सीधे तौर पर ठेकेदारी और प्रॉपर्टी डीलिंग में बदल गया।

छह ठिकानों पर ईओयू का ‘सर्जिकल स्ट्राइक’

​मंगलवार की सुबह जब पटना से ईओयू की विशेष टीमें रवाना हुईं, तो किसी को अंदाजा नहीं था कि एक साथ तीन जिलों में घेराबंदी की जाएगी। अभिषेक रंजन के विरुद्ध 115.66 प्रतिशत आय से अधिक संपत्ति (DA Case) का मामला दर्ज किया गया है। सरकारी आंकड़ों में यह राशि 1.70 करोड़ रुपये दर्ज है, लेकिन छापेमारी के दौरान मिले दस्तावेजों ने इस आंकड़े को 50 करोड़ के करीब पहुँचा दिया है।

  • पटना और छपरा: छपरा में अभिषेक के दो आलीशान घरों पर दबिश दी गई। प्रभुनाथ नगर टाड़ी और भेल्दी के पैगा स्थित पैतृक आवासों पर ईओयू ने कमरे, आलमारियां और गुप्त लॉकरों को खंगाला।
  • किशनगंज: यहाँ के नगर थाने में उनके दफ्तर और आवास पर भी टीम ने दस्तावेजों की जांच की।
  • मुजफ्फरपुर: कांटी स्थित ठिकानों पर सबसे अधिक निवेश के सबूत मिले हैं।
  • ससुराल में भी रेड: छापेमारी की तपिश अभिषेक रंजन की ससुराल तक भी पहुँची। देर रात चंपारण के सिकटा बाजार स्थित उनके ससुराल में भी ईओयू की टीम ने तलाशी ली, जहाँ कई महत्वपूर्ण कागजात मिलने की खबर है।

निलंबित एसडीपीओ गौतम कुमार से ‘कड़ी टक्कर’

​किशनगंज पुलिस महकमे में अभिषेक रंजन की चर्चा अक्सर उनके वरिष्ठ अधिकारी रहे निलंबित एसडीपीओ गौतम कुमार के साथ की जाती है। गौतम कुमार पहले ही भ्रष्टाचार के आरोपों में निलंबित हो चुके हैं, और अब अभिषेक रंजन ने काली कमाई के मामले में उन्हें भी पीछे छोड़ दिया है। 17 साल के करियर में इतनी संपत्ति बनाना यह दर्शाता है कि भ्रष्टाचार की जड़ें महकमे में कितनी गहरी हैं। ईओयू के सूत्रों का कहना है कि सिलीगुड़ी (पश्चिम बंगाल) में भी अभिषेक रंजन की बेनामी संपत्तियों की जानकारी मिली है, जिसकी जांच के लिए जल्द ही एक टीम वहां भेजी जा सकती है। सिलीगुड़ी का कनेक्शन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि किशनगंज से इसकी भौगोलिक निकटता अवैध धंधों और निवेश के लिए मुफीद रही है।

तबादले की तैयारी और अचानक गिरी ‘गाज’

​राजनैतिक गलियारों और पुलिस महकमे में यह चर्चा आम थी कि अभिषेक रंजन का रसूख उन्हें हर बार बचा लेता है। हालांकि, हाल ही में किशनगंज के एसपी ने उनकी कार्यशैली और संदिग्ध गतिविधियों को देखते हुए उन्हें पद से हटा दिया था। इसके तुरंत बाद उनका तबादला नवगछिया कर दिया गया था। वे नवगछिया में अपना नया पदभार ग्रहण करने की तैयारी में ही थे कि ईओयू ने उनके ‘भविष्य’ पर ताला लगा दिया।

​अभिषेक रंजन ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि जिस खाकी के दम पर वे करोड़ों का साम्राज्य खड़ा कर रहे हैं, वही खाकी एक दिन उनके दरवाजे पर हथकड़ी लेकर खड़ी होगी। ईओयू ने फिलहाल उनके बैंक खातों, निवेश के कागजातों और बीमा पॉलिसी को जब्त कर लिया है। कई बेनामी लेन-देन के भी सबूत मिले हैं, जिनकी कड़ियां अब पटना मुख्यालय में जोड़ी जा रही हैं।

VOB विश्लेषण: भ्रष्टाचार का ‘सिंडिकेट’ और पुलिस की छवि

The Voice of Bihar (VOB) के विश्लेषण के अनुसार, अभिषेक रंजन जैसे अधिकारियों का उदय रातों-रात नहीं होता। यह उस सिस्टम की विफलता है जो 17 साल तक एक थानेदार को बेखौफ होकर संपत्ति बटोरने की अनुमति देता है। जब एक थानेदार 50 करोड़ का मालिक बन जाता है, तो वह आम जनता की फरियाद सुनने के बजाय ‘डील’ करने में व्यस्त रहता है। किशनगंज जैसे सीमावर्ती जिले में थानाध्यक्ष का पद अत्यंत संवेदनशील होता है, जहाँ तस्करी और अवैध घुसपैठ जैसे मुद्दों पर पुलिस की पैनी नजर होनी चाहिए। लेकिन जब थानेदार खुद ही तस्करी की काली कमाई का हिस्सा बन जाए, तो सुरक्षा राम भरोसे ही रहती है।

​अभिषेक रंजन की ससुराल से लेकर उनके पैतृक गांव तक हुई छापेमारी यह संदेश देती है कि अब भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई केवल ‘प्रतीकात्मक’ नहीं रह गई है। ईओयू की इस कार्रवाई से बिहार के उन तमाम ‘धनकुबेर’ पुलिसकर्मियों में खौफ का माहौल है, जो अपनी वर्दी को तिजोरी भरने का साधन समझते हैं।

आगे की कार्रवाई: क्या होगी गिरफ्तारी?

​फिलहाल ईओयू की टीम छापेमारी के दौरान मिले सोने के गहने, जमीन के डीड और बैंक पासबुक का मूल्यांकन कर रही है। पूछताछ के लिए अभिषेक रंजन को पटना मुख्यालय तलब किया जा सकता है। अगर वे अपनी संपत्तियों का वैध स्रोत बताने में विफल रहते हैं, तो उनकी गिरफ्तारी तय मानी जा रही है। इसके साथ ही, उनकी अवैध तरीके से अर्जित संपत्तियों को जब्त करने (Confiscation) की प्रक्रिया भी शुरू की जाएगी।

​बिहार सरकार और पुलिस मुख्यालय ने यह साफ कर दिया है कि ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति केवल कागजों पर नहीं रहेगी। अभिषेक रंजन का मामला अब न केवल विभागीय जांच का हिस्सा है, बल्कि यह एक बड़ा आपराधिक मुकदमा बन चुका है। बिहार की जनता अब यह देख रही है कि क्या यह कार्रवाई केवल एक थानेदार तक सिमट कर रह जाएगी या उन बड़े मगरमच्छों पर भी हाथ डाला जाएगा जिन्होंने इस भ्रष्टाचार के खेल को संरक्षण दिया।

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