
पटना। बिहार की सत्ता में हुए बड़े उलटफेर और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के इस्तीफे के बाद सूबे का सियासी पारा सातवें आसमान पर है। राजभवन से लेकर लोकभवन तक चल रही हलचल के बीच सबसे तीखी और मारक प्रतिक्रिया पूर्व उपमुख्यमंत्री और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के कद्दावर नेता तेजस्वी प्रसाद यादव की ओर से आई है। मंगलवार को राजद कार्यालय में पत्रकारों से रूबरू होते हुए तेजस्वी ने भाजपा की नई रणनीति और सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने की सुगबुगाहट पर जबरदस्त तंज कसा। तेजस्वी ने दो टूक शब्दों में कहा कि भाजपा के पास आज अपना कोई वजूद या नेतृत्व नहीं बचा है, इसलिए उसे उन चेहरों का सहारा लेना पड़ रहा है जिन्होंने राजनीति का ककहरा ‘लालू की पाठशाला’ में सीखा है। सम्राट चौधरी का नाम लिए बिना उन्होंने भाजपा की उस वैचारिक विरोधाभास पर प्रहार किया, जिसमें एक तरफ पार्टी ‘जंगलराज’ को कोसती है और दूसरी तरफ उसी दौर के निकले नेताओं के सिर पर ताज सजाती है। तेजस्वी के इस बयान ने भाजपा की उस ‘नैतिकता’ और ‘परिवारवाद’ वाली थ्योरी को कटघरे में खड़ा कर दिया है, जिसे वे वर्षों से चुनावी हथियार के रूप में इस्तेमाल करते आए हैं।
लालू की विचारधारा का वर्चस्व: तेजस्वी का वैचारिक वार
तेजस्वी यादव ने अपनी प्रतिक्रिया में इसे राजद के लिए गर्व का विषय बताया। उन्होंने कहा कि यह भारतीय जनता पार्टी की सबसे बड़ी हार है कि आज उसे बिहार में टिके रहने के लिए लालू प्रसाद यादव की विचारधारा और उनके द्वारा तैयार किए गए नेताओं के इर्द-गिर्द ही अपनी राजनीति की बिसात बिछानी पड़ रही है। तेजस्वी के अनुसार, सम्राट चौधरी उसी राजद की उपज हैं जहाँ सामाजिक न्याय और पिछड़ों की आवाज को बुलंद करना सिखाया जाता है।
उन्होंने सवाल उठाया कि जो भाजपा खुद को दुनिया की सबसे बड़ी और अनुशासित पार्टी बताती है, क्या उसके पास अपने संगठन का ऐसा कोई एक भी चेहरा नहीं था जिसे वह मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा सके? लालू प्रसाद की पाठशाला से निकले हुए छात्र को अपना ‘कैप्टन’ बनाना यह साबित करता है कि भाजपा के पास ‘होमग्रोन’ (घर में तैयार) नेतृत्व का पूरी तरह अकाल पड़ चुका है। तेजस्वी ने इसे भाजपा का वैचारिक आत्मसमर्पण करार दिया है।
परिवारवाद और योग्यता: भाजपा की कथनी-करनी में अंतर
तेजस्वी यादव ने भाजपा के सबसे पसंदीदा हथियार ‘परिवारवाद’ को उन्हीं के खिलाफ मोड़ दिया। उन्होंने तीखे लहजे में कहा कि जो लोग दिन-रात परिवारवाद की राजनीति पर बड़े-बड़े भाषण देते थे और मुझे निशाने पर लेते थे, आज वे कहाँ छिपे हैं? तेजस्वी का इशारा सम्राट चौधरी की राजनैतिक विरासत की ओर था, जिनके पिता शकुनी चौधरी और माता पार्वती देवी दोनों ही बिहार की सक्रिय राजनीति और विधायकी का हिस्सा रहे हैं।
तेजस्वी ने कहा कि आज उन्हीं लोगों द्वारा ऐसे नेताओं को पुरस्कृत किया जा रहा है जिन्होंने बिना किसी बड़े संघर्ष, जन आंदोलन या जमीनी सामाजिक कार्यों के सीधे मंत्री और मुख्यमंत्री के पद तक का सफर तय किया है। उन्होंने भाजपा से पूछा कि क्या यह ‘परिवारवाद’ की श्रेणी में नहीं आता? तेजस्वी ने यहाँ अपनी योग्यता और संघर्ष का हवाला देते हुए भाजपा के दोहरे चरित्र को बेनकाब करने की कोशिश की है।
शिक्षा पर सवाल उठाने वालों की ‘चुप्पी’ पर तंज
राजद नेता ने अपने व्यक्तिगत अपमान और अतीत में उन पर हुए हमलों का भी हिसाब चुकता किया। तेजस्वी ने कहा कि जो लोग मेरी शिक्षा और डिग्री पर सवाल खड़ा करते थे, वे आज पूरी तरह खामोश क्यों हैं? उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने जा रहे नेता की शैक्षणिक और राजनैतिक पृष्ठभूमि पर अब कोई चर्चा क्यों नहीं हो रही?
तेजस्वी का तर्क था कि भाजपा ने हमेशा उनके खिलाफ एक नकारात्मक विमर्श तैयार किया, लेकिन आज वे खुद उसी रास्ते पर चल रहे हैं जिसे वे ‘अलोकतांत्रिक’ बताते थे। उन्होंने कहा कि शिक्षा केवल किताबों से नहीं आती, बल्कि जनता के बीच रहकर उनके दुख-दर्द को समझने से आती है, और भाजपा ने आज यह मान लिया है कि लालू प्रसाद द्वारा सिखाए गए राजनैतिक पाठ ही बिहार की सत्ता चलाने के लिए अनिवार्य हैं।
नई सरकार की वैधता और जनादेश का अपमान
तेजस्वी यादव ने बनने वाली नई सरकार की संवैधानिक और नैतिक वैधता पर भी गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने इसे पूरी तरह से ‘अलोकतांत्रिक’ करार देते हुए कहा कि जो व्यक्ति अब मुख्यमंत्री बनेगा, वह जनता के सीधे जनादेश से चुनकर नहीं आया है। यह सरकार केवल सत्ता के जोड़-तोड़, विधायकों की खरीद-फरोख्त और बंद कमरों में हुई राजनैतिक सौदेबाजी का नतीजा है।
तेजस्वी के अनुसार, बिहार की जनता ने 2025 के चुनाव में जिस तरह का जनादेश दिया था, यह गठबंधन उसका अपमान है। उन्होंने कहा कि बिहार की जनता ने कभी भी ऐसे ‘अनैतिक गठबंधन’ के लिए वोट नहीं दिया था जहाँ मुख्यमंत्री की कुर्सी किसी ऐसी पार्टी के पास चली जाए जिसे जनता ने उस पद के लिए नहीं चुना था। उन्होंने इसे लोकतंत्र के साथ खिलवाड़ बताते हुए कहा कि सत्ता की यह बंदरबाँट बिहार के विकास को सालों पीछे धकेल देगी।
सत्ता का जोड़-तोड़ और जनता की अदालत
तेजस्वी ने भाजपा और जदयू के इस नए मेल को ‘अवसरवादिता की पराकाष्ठा’ बताया। उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार का इस्तीफा और फिर भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाना, बिहार के राजनैतिक इतिहास का सबसे काला अध्याय है। तेजस्वी ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि भले ही आज ये लोग सत्ता की कुर्सी पर काबिज हो जाएं, लेकिन असली फैसला जनता की अदालत में होगा।
उन्होंने कहा कि राजद अब चुप नहीं बैठने वाली है। वे इस ‘धोखे’ को लेकर गाँव-गाँव जाएंगे और जनता को बताएंगे कि कैसे उनके मतों का सौदा किया गया है। तेजस्वी ने नई सरकार को ‘चोर दरवाजे’ की सरकार बताते हुए कहा कि इसकी उम्र बहुत लंबी नहीं होने वाली है, क्योंकि यह आपसी भरोसे पर नहीं बल्कि केवल सत्ता के स्वार्थ पर टिकी है।
VOB विश्लेषण: तेजस्वी की नई रणनीति का आगाज़
The Voice of Bihar (VOB) के विश्लेषण के अनुसार, तेजस्वी यादव की यह प्रतिक्रिया एक सोची-समझी रणनीतिक चाल है। वे सम्राट चौधरी को ‘लालू का छात्र’ बताकर भाजपा के उन पुराने कार्यकर्ताओं को भी चिढ़ाना चाहते हैं जो सम्राट के राजद अतीत को लेकर आज भी असहज हैं। तेजस्वी जानते हैं कि भाजपा के भीतर एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो दशकों से ‘लालूवाद’ के खिलाफ लड़ता रहा है, और अब उन्हें उसी विचारधारा की उपज को अपना नेता मानना पड़ रहा है।
यह हमला केवल सम्राट चौधरी पर नहीं है, बल्कि भाजपा के उस ‘सनातनी और संगठनवादी’ कैडर को चोट पहुँचाने के लिए है जो खुद को वैचारिक रूप से श्रेष्ठ मानता है। तेजस्वी ने इस एक बयान से भाजपा को बचाव की मुद्रा में ला खड़ा किया है। अब भाजपा के लिए यह साबित करना मुश्किल होगा कि वे ‘परिवारवाद’ के खिलाफ हैं या फिर उनके पास अपना कोई मौलिक नेतृत्व है।
बदलाव की लहर और भविष्य के समीकरण
कुल मिलाकर, 15 अप्रैल की यह सुबह बिहार में केवल मुख्यमंत्री नहीं बदल रही है, बल्कि एक नए राजनैतिक युद्ध की शुरुआत कर रही है। तेजस्वी यादव ने जिस तरह से इस बदलाव को ‘अनैतिक’ और ‘अलोकतांत्रिक’ करार दिया है, उससे यह साफ है कि आने वाले समय में वे सड़क से लेकर सदन तक नई सरकार की नाक में दम करने वाले हैं।
सम्राट चौधरी के लिए शपथ ग्रहण के बाद सबसे बड़ी चुनौती तेजस्वी के इन आरोपों का जवाब देना और खुद को एक ‘विशुद्ध भाजपाई’ मुख्यमंत्री के रूप में स्थापित करना होगा। तेजस्वी का ‘लालू की पाठशाला’ वाला जुमला आने वाले विधानसभा सत्र में भी गूँजेगा। अब देखना यह है कि सम्राट चौधरी इस वैचारिक हमले का क्या तोड़ निकालते हैं और भाजपा अपने इस नए नेतृत्व को लेकर जनता के बीच क्या सफाई देती है। बिहार अब एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ अतीत के संबंध और भविष्य के स्वार्थ एक दूसरे से टकरा रहे हैं।


