
फतेहपुर (गया)। राजनीति के चुनावी समर में अक्सर बड़ी रैलियां और कड़े भाषण चर्चा बटोरते हैं, लेकिन कभी-कभी एक छोटी सी मुलाकात किसी की किस्मत बदल देती है। ऐसा ही कुछ हुआ है गया जिले के टनकुप्पा प्रखंड के रहने वाले विक्रम साव के साथ। पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस दुकान पर रुककर दस रुपये की झाल-मुड़ी खरीदी और स्वाद लेकर खाया, उसके मालिक बिहार के गया जिले के रहने वाले विक्रम साव हैं। इस साधारण सी मुलाकात और प्रधानमंत्री के साथ बातचीत का एक छोटा वीडियो सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल गया है, जिसने विक्रम को रातों-रात देशभर में मशहूर कर दिया है।
कोलकाता में गया के स्वाद का जादू
विक्रम साव टनकुप्पा प्रखंड की चोवार पंचायत के अंतर्गत आने वाले मनमाधो गांव के निवासी हैं। वे पिछले कई वर्षों से पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में अपनी रोजी-रोटी के लिए ‘भूंजा’ (झाल-मुड़ी) की दुकान चला रहे हैं।
इस पुश्तैनी काम का इतिहास बताते हुए उनके परिजनों ने जानकारी दी:
- पिता का संघर्ष: विक्रम के पिता उत्तम साव पिछले करीब 40 वर्षों से कोलकाता में झाल-मुड़ी बेचकर परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं।
- विक्रम की मेहनत: पिता के पदचिह्नों पर चलते हुए विक्रम ने करीब 10 साल पहले खुद की एक किराये की दुकान ली और इस पुश्तैनी धंधे को नया विस्तार दिया।
जब प्रधानमंत्री ने मांगे ‘₹10 की झाल-मुड़ी’
पश्चिम बंगाल में चुनावी दौरों के बीच प्रधानमंत्री मोदी का काफिला जब विक्रम की दुकान के पास से गुजरा, तो उन्होंने सहजता दिखाते हुए वहां रुककर झाल-मुड़ी खाने की इच्छा जताई। विक्रम ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि देश का सर्वोच्च प्रधान उनकी दुकान पर आकर दस रुपये का नाश्ता मांगेगा।
सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में प्रधानमंत्री और विक्रम के बीच की आत्मीय बातचीत ने लोगों का दिल जीत लिया है। विक्रम के लिए यह पल किसी सपने के सच होने जैसा था, जिसने उनके साधारण जीवन को गौरव के क्षणों से भर दिया है।
गांव मनमाधो में दिवाली जैसा माहौल
जैसे ही विक्रम की तस्वीरें और वीडियो टीवी व मोबाइल स्क्रीन पर सामने आए, गया जिले के टनकुप्पा प्रखंड में खुशी की लहर दौड़ गई।
”विक्रम शुरू से ही बहुत मेहनती रहा है। आज उसकी मेहनत और सादगी की वजह से पूरे क्षेत्र का नाम रोशन हुआ है। हमारे लिए यह गर्व की बात है कि प्रधानमंत्री ने हमारे भाई के हाथों से बनाया हुआ नाश्ता किया।”
— शंकर साव, विक्रम के बड़े भाई
वर्तमान में विक्रम के माता-पिता, पत्नी और बच्चे कोलकाता में ही उनके साथ रहते हैं, जबकि उनके बड़े भाई शंकर साव सपरिवार गांव में रहते हैं। विक्रम की इस उपलब्धि ने यह साबित कर दिया है कि ईमानदारी और लगन से किया गया कोई भी काम छोटा नहीं होता और वह आपको सम्मान के शिखर तक पहुँचा सकता है।
सादगी और मेहनत की जीत
22 अप्रैल 2026 को गया के इस ‘लाल’ की चर्चा न केवल बिहार बल्कि पूरे देश के राजनैतिक और सामाजिक गलियारों में हो रही है। ‘झाल-मुड़ी’ जैसे साधारण नाश्ते के जरिए बिहार के एक युवा ने प्रधानमंत्री का ध्यान अपनी ओर खींचकर यह संदेश दिया है कि भारतीय स्वाद की जड़ें कितनी गहरी हैं। मनमाधो गांव के लोग अब बेसब्री से विक्रम के गांव लौटने का इंतजार कर रहे हैं ताकि वे अपने इस ‘सेलिब्रिटी’ भाई का भव्य स्वागत कर सकें।


