
नई दिल्ली। वैश्विक अर्थव्यवस्था में जारी उथल-पुथल और पश्चिम एशिया के अशांत माहौल के बीच भारत के आम नागरिकों के लिए ईंधन की कीमतों को लेकर एक चिंताजनक खबर सामने आ रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा हाल ही में देशवासियों से पेट्रोल और डीजल की खपत कम करने की अपील किए जाने के बाद, अब केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि आने वाले समय में पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में वृद्धि को टाला नहीं जा सकेगा। भारतीय उद्योग परिसंघ (CII) के वार्षिक व्यापार शिखर सम्मेलन को संबोधित करते हुए हरदीप सिंह पुरी ने दो टूक शब्दों में कहा कि ईंधन के दाम में होने वाली बढ़ोतरी को हमेशा के लिए रोक पाना संभव नहीं है। उनका यह बयान एक ऐसे समय में आया है जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें अस्थिर बनी हुई हैं और घरेलू तेल कंपनियां भारी वित्तीय दबाव का सामना कर रही हैं।
आपूर्ति सुरक्षित पर कीमतों का दबाव बरकरार
हरदीप सिंह पुरी ने उद्योग जगत के दिग्गजों और विशेषज्ञों के बीच देश की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर कुछ महत्वपूर्ण आंकड़े साझा किए। उन्होंने देश को भरोसा दिलाया कि पश्चिम एशिया में जारी संकट के बावजूद भारत में कच्चे तेल, पीएनजी और एलपीजी की आपूर्ति को लेकर फिलहाल कोई बड़ा खतरा नहीं है। उनके अनुसार, भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों को ध्यान में रखते हुए पर्याप्त रणनीतिक भंडार तैयार कर लिया है। वर्तमान में भारत के पास 60 दिनों की खपत के बराबर कच्चा तेल, लगभग दो माह की आवश्यकता के अनुसार एलएनजी और 45 दिनों का एलपीजी भंडार मौजूद है। उन्होंने इस बात पर भी संतोष व्यक्त किया कि एलपीजी के घरेलू उत्पादन में पिछले कुछ समय में काफी वृद्धि हुई है, जिससे विदेशों पर निर्भरता कुछ कम हुई है। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि आपूर्ति की उपलब्धता एक अलग विषय है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ती लागत का असर कीमतों पर पड़ना एक अनिवार्य आर्थिक प्रक्रिया है।
तेल कंपनियों के बढ़ते नुकसान ने बढ़ाई सरकार की चिंता
पेट्रोलियम मंत्री ने तेल विपणन कंपनियों (OMCs) की खस्ताहाल होती वित्तीय स्थिति पर भी विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि कच्चे तेल के दाम अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसी तरह ऊंचे बने रहे और घरेलू स्तर पर कीमतों में आवश्यक बदलाव नहीं किया गया, तो तेल कंपनियों को केवल एक ही तिमाही में एक लाख करोड़ रुपये तक का भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। पुरी ने आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि वर्तमान में तेल कंपनियों को प्रतिदिन लगभग एक हजार करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है। उन्होंने सवाल उठाया कि कोई भी व्यावसायिक इकाई आखिर कब तक अपनी लागत से कम दाम पर उत्पादों को बेचकर अस्तित्व बचाए रख सकती है। पिछले चार वर्षों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इस दौरान पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कोई बहुत बड़ा उछाल नहीं आने दिया गया, जिससे जनता को राहत मिली, लेकिन अब तेल कंपनियों के लिए स्थिति नियंत्रण से बाहर होती दिख रही है।
किमतों में वृद्धि की रणनीति: एक साथ बड़ा झटका या धीरे-धीरे बढ़ोतरी?
यद्यपि हरदीप सिंह पुरी ने कीमतों में वृद्धि की सटीक तारीख या सीमा पर सीधे तौर पर कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया, लेकिन मंत्रालय से जुड़े सूत्रों ने भविष्य की रणनीति का खाका पेश किया है। पेट्रोलियम मंत्रालय के भीतर चल रही चर्चाओं के अनुसार, पेट्रोल और डीजल के दाम में वृद्धि को अब ज्यादा समय तक टालना न तो कंपनियों के हित में है और न ही देश की अर्थव्यवस्था के लिए सही होगा। संकेत यह मिल रहे हैं कि सरकार आम जनता को एक साथ बहुत बड़ा झटका देने के बजाय कीमतों में धीरे-धीरे वृद्धि करने का मार्ग अपना सकती है। इस ‘क्रमिक वृद्धि’ की रणनीति से मुद्रास्फीति पर पड़ने वाले तात्कालिक प्रभाव को संतुलित करने की कोशिश की जाएगी। हालांकि, कीमतों में बढ़ोतरी का अंतिम निर्णय सरकार के उच्च स्तर पर लिया जाना है, लेकिन यह तय माना जा रहा है कि अब ईंधन की महंगाई से राहत के दिन कम ही बचे हैं।
पश्चिम एशिया संकट और वैश्विक समीकरणों का असर
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है। ऐसे में वैश्विक स्तर पर होने वाली कोई भी छोटी हलचल सीधे तौर पर भारतीय पेट्रोल पंपों की कीमतों को प्रभावित करती है। पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव आपूर्ति श्रृंखला को बाधित करने का जोखिम पैदा कर रहा है, जिससे बीमा और परिवहन लागत में भी इजाफा हुआ है। हरदीप सिंह पुरी का बयान इसी वैश्विक वास्तविकता की ओर इशारा करता है कि सरकार वैश्विक कीमतों के विरुद्ध घरेलू बाजार को अनिश्चितकाल तक सुरक्षा कवच प्रदान नहीं कर सकती। तेल कंपनियों के नुकसान का बोझ अंततः राजकोषीय घाटे पर पड़ता है, जिसे कम करने के लिए सरकार को बाजार आधारित मूल्य निर्धारण की दिशा में लौटना ही होगा।
प्रधानमंत्री की पेट्रोल-डीजल की खपत कम करने की अपील अब एक व्यापक संदर्भ में देखी जा रही है। यह न केवल पर्यावरण और कार्बन उत्सर्जन कम करने से जुड़ी है, बल्कि देश के बढ़ते आयात बिल को नियंत्रित करने की एक रणनीतिक जरूरत भी बन गई है। पेट्रोलियम मंत्री के संकेतों के बाद अब बाजार और आम जनता दोनों ही संभावित महंगाई के नए दौर के लिए खुद को मानसिक रूप से तैयार कर रहे हैं। आने वाले हफ्तों में सरकारी तेल कंपनियों की समीक्षा बैठकों के बाद पेट्रोल और डीजल के दाम में बढ़ोतरी की आधिकारिक शुरुआत देखी जा सकती है। यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इस महंगाई को जनता के लिए कितना सहनीय बना पाती है।


